Khoobsurat [part 104]

 यामिनी को न जाने क्या सूझा ? जब उसे, कुमार छोड़कर चला गया, तब उसने ,कुमार के जाने के पश्चात उसके घर के नंबर पर फोन किया। यह बात भी ठीक ही है, जब उसने ,कुमार के  घर पर फोन किया तो मधुलिका ही फोन उठाएगी, और किसी के फोन उठाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि उसके घर में ,उसके बुजुर्ग बीमार ससुर थे और एक छोटा बेटा ! उसकी सोच के अनुसार , मधुलिका ने ही फोन उठाया। तब वह किसी अंग्रेज की तरह बोलते हुए , मधुलिका से जानना चाहती है- कि कुमार घर पहुंचा है या नहीं क्योंकि उसे, कुमार की बहुत फिक्र हो रही है।


 मधुलिका को समझ नहीं आता कि यह महिला कौन है ? और वह उससे,कुमार के विषय में क्यों जानना चाहती है ?तब मधुलिका उससे पूछती है - आप कौन बोल रही हैं ? तब भी ''यामिनी''उसे  अपना नाम नहीं बताती है। इस बात से मधुलिका को बहुत क्रोध आता है और वह गुस्से में फोन काट देती है। 

अब मधुलिका सोचने पर मजबूर हो जाती है ,आखिर इतने दिनों से कुमार का व्यवहार, उसे बदला हुआ तो लग रहा था, लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि वह किसी लड़की के प्यार में आ चुका है या उससे मिलने भी जाता है, आज इस फोन ने, यह भी साबित कर ही दिया कि कुमार दिल्ली में, काम के बहाने से, किसी लड़की से मिलने गया था। अब तक मधुलिका निश्चिंत होकर, अपने घर -गृहस्थी में रमी हुई थी, उसे अपने कुमार पर विश्वास था और उसने कुमार की गृहस्थी  में अपने को रचा- बसा लिया था।

 उसके पास इतना समय ही नहीं था कि यह फालतू की बातें सोचे। उसे अपने कुमार पर पूर्ण विश्वास था किंतु जैसे ही किसी लड़की का फोन उसके लिए आया। मधुलिका तो जैसे सोते से जागी हो, उसका संपूर्ण अस्तित्व हिल गया ,जीवन में ऐसा मोड़ भी आ सकता है। एक सुकून भरे जीवन से उसका भ्रम टूट गया। उसे महसूस तो हो रहा था, कि कुछ दिनों से कुमार का व्यवहार उसके  प्रति बदल रहा है लेकिन जीवन में और भी परेशानियां है ,यही सोचकर वह शांत थी किंतु आज उसे एहसास हो रहा है ,वो कितनी बड़ी मूर्ख थी ,उसने कभी कुमार से यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि उसके व्यवहार में आये परिवर्तन का क्या कारण हो सकता है ?

कभी बैठकर उससे पूछा ही नहीं, कि वो ऐसा क्यों कर रहा है ? क्या कोई परेशानी है ?अब उसके मन में अंतर्द्वंद चल रहा था। कभी लगता, उसी की गलती रही है,उसने स्वयं ही अपने हँसते -खेलते घर में अपनी ही लापरवाही से आग लगा दी। ऐसा कैसे हो सकता है ?मेरा कुमार ऐसा नहीं हो सकता। शायद  किसी ने मज़ाक किया होगा। यदि ऐसा हुआ तो.... क्या कुमार मुझे सब सच बता देता ? जिसके कदम बहकने होते हैं ,वो बहक ही जाता है ,मैं तब भी क्या कर लेती ? निराशा से वह बिस्तर पर औंधे मुँह लेट गयी। मन ही मन सोच रही थी ,'क्या मैं इतनी लाचार हो गयी हूँ ? कि कुमार कुछ भी कहेगा या करेगा ,मैं चुपचाप उसे गलत करते देखती रहूंगी।'एकाएक वो बिस्तर से उठी और मन ही मन निश्चय किया 'नहीं ,मैं ऐसा कदापि होने नहीं दूंगी।'  

वह जानना चाहती थी, यह जो फोन आया है ,इसमें कितनी सच्चाई है ?क्या सच में ही, कुमार किसी से मिलने के लिए दिल्ली गया था ?तब वह उसके व्यवहार के परिवर्तन के विषय में सोचने लगी और तब उसे स्मरण हुआ कि जयपुर जाने के पश्चात, उसके  व्यवहार में परिवर्तन आया है, यही सब सोचते हुए अनजाने ही जयपुर के विषय में ''गूगल'' में खंगालने  लगती है, वह स्वयं ही नहीं जानती कि वह इस तरह क्यों कर रही है, तब उन्हीं दिनों की एक' कला प्रदर्शनी' के विषय में ' जयपुर' में उसने उसके विषय में पढ़ा। तब अचानक ही उसे शिल्पा की याद हो आई और उसने शिल्पा को फोन लगा दिया।भावावेश में यह भी भूल गयी वो उसे फोन क्यों कर रही है ?वो उससे क्या चाहती है ?यदि शिल्पा ने पूछा -' इतने दिनों के पश्चात, उसने, शिल्पा को केेसे याद किया,तब क्या जबाब देगी ?''यह सोचकर उसके हाथ रुक गए ,आज भी अपने लिए ही, उसे फोन कर रही है ,उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी ,उसे ऐसा लग रहा था ,यह जिसका भी फोन आया है ,जिसने भी फोन किया है, वो क्या जानना चाहती थी ,उसका कुमार से क्या संबंध है ?वो कुमार को कैसे जानती है ? किसी भी तरीके से मुझे, कुछ  जानकारी तो मिलेगी। अचानक ही विचार आया -जो भी होगा, देखा जायेगा ,यही सोचते हुए, किसी भी बात की परवाह किये बग़ैर,वो फोन करती है।    

पहले जिस नंबर पर फोन लगाया था, उस पर तो, फोन ही नहीं लग रहा था। तब उसके घर के नंबर पर फोन लगाया। बड़ी देर तक घंटी बजती रही किंतु किसी ने भी फोन नहीं उठाया।क्या मुसीबत है ,जरूरत के समय ये फोन भी नहीं लगता,न जाने  क्या बात है ?सब लोग न जाने कहां चले गए हैं ? मन ही मन सोच रही थी -एक बार शिल्पा से बात हो जाती तो शायद मैं कुछ सोच पाती।

 हो सकता है, शिल्पा इस कलाकार को जानती हो क्योंकि वह भी तो एक पेंटर ही है।  इसी सोच के साथ उसने, उसकी मम्मी को फिर से फोन कर दिया किंतु उन्होंने फोन उठाया ही नहीं, मन में अजीब सी बेचैनी होने लगी ,वो  सोच रही थी -आखिर इस समय शिल्पा कहां होगी ? उसका तो विवाह हो गया होगा ,कोई और समय होता तो वो अपने घर के किसी न किसी कार्य में व्यस्त रहती किन्तु आज जैसे उसके पास कोई काम ही नहीं रहा गया है ,जब उसका किसी ने फोन नहीं उठाया, तो उसकी बेचैनी बढ़ने लगी।

क्या कारण हो सकता है ?जो उसका या उसके घर का कोई भी नंबर लग ही नहीं रहा है ?हो सकता है ,उसने अपना नंबर बदल दिया हो। उसे अपनी परेशानियों में ,यह भी याद नहीं रहा, कि बेटे का घर आने का समय हो गया है ,और आकर वो भोजन करेगा ,ससुर को दवाई भी देनी है। दरवाजे पर किसी के आने की आहट सुनकर ,वो अपने विचारों की शृंखला से जैसे बाहर आई और उसने दरवाजा खोला ,सामने अपने बेटे को देखकर ,बोली -अरे ,तुम ![इतनी जल्दी ]शब्द उसके मुँह में ही अटक गए , जब उसने घड़ी में समय देखा,घड़ी में दो बजने में दस मिनट ही थे। अरे !आज समय इतनी जल्दी बीत गया और मुझे पता ही नहीं चला। कुछ पलों के लिए वो सब भूलकर बच्चे के कपड़े उसे बदलने के लिए देती है और तुरंत ही रसोईघर की तरफ कदम बढ़ाती है।

 आज देरी हो जाने से उसे मन ही मन पछतावा हो रहा था ,आज मैंने बड़ी देर कर दी ,पापा भी भूखे होंगे ,यही सोचकर फुर्ती से वह अपने कार्य में व्यस्त हो गई।


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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