Khoobsurat [part 103]

आज कुमार ने ,फोन करने पर मधुलिका से,बड़ा रुखा व्यवहार किया ,जिसके कारण मधुलिका को कुछ  अनजाने डर सताने लगे। आज उसने मुझे' गंवार 'कहा ,यह शब्द उसने दोहराया। ठीक ही तो कह रहा है ,उसी के कॉलिज में पढ़ी हूँ ,मानती हूँ ,मैंने  आगे बढ़ने और पढ़ने के लिए उससे विवाह किया किन्तु जबसे यहां आई हूँ, अपना सब कुछ भूलाकर उसके परिवार को ही संभाल रही हूँ। 


 यही तो होता है ,घर में काम करते और परिवार संभालते, एक पढ़ी -लिखी औरत भी ,अपने पति को' गंवार' ही नज़र आने लगती है। एक महिला की छठी इंद्री  उसे हमेशा संकेत दे ही देती है,उसे जैसे पूर्वाभास होने लगता है।  व्यवहार से तो कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि इस आदमी का मेरे प्रति क्या व्यवहार रहा है और क्या हो रहा है ?तुलनात्मक नतीजे से कहा जाए तो अब कुमार का व्यवहार मधुलिका के प्रति बदल गया था और मधुलिका को भी लगने लगा था अवश्य ही कोई बात है, जो कुमार मुझसे छुपा रहा है। 

यामिनी, कुमार के बराबर में लेटी हुई, उनकी सारी बातें सुन रही थी और मन ही मन प्रसन्न हो रही थी। फोन कट जाने के पश्चात, कुमार, यामिनी से बोला -कल मुझे जाना ही होगा, ऐसा करता हूं , आज शाम को ही चला जाता हूं। 

यामिनी मदहोश कर देने वाली आवाज में बोली -तुम तो कह रहे थे कि जब तक मैं यहां हूं, तुम यही रहोगे !

तुमने सही सुना, किंतु यहां बात बेटे की आती है, उसके लिए तो मुझे जाना ही होगा, बच्चे  के भविष्य का सवाल है, कहकर कुमार निर्लिप्त भाव से अपनी शर्ट- पैंट जो भी सामान वहां फैला हुआ था उसे समेट कर अपने बैग में रखने लगा।

 यामिनी को यह सब अच्छा नहीं लगा , तब बोली -मधुलिका चली जाएगी, अभी तो तुमने कहा था-' कह देना, कि उसके पिता टूर पर गए हैं। 

हां वह तो कह देगी, किंतु उसके अध्यापक तो यही सोचेंगे,बच्चे का पिता कितना लापरवाह है, और फिर मधुलिका को मुझे कहने का बहाना मिल जाएगा, तुम भी तो, कल तक ही यहां हो। 

नहीं, मैंने सोचा था, कुछ दिन और यहां ठहर जाती हूं किंतु जब तुम ही नहीं होंगे तो मैं यहां क्या करूंगी ?

अबकी बार, मैं तुम्हें इस तरह जाने नहीं दूंगा, तुम अपना फोन नंबर दे दो ! और कहां जा रही हो यह भी बता दो ! मुझे जब भी मौका मिलेगा, मैं तभी तुमसे मिलने चला आऊंगा। 

मैं तुमसे यहां मिलने आई हूं और मुझे ही ,छोड़ कर जा रहे हो ! फिर वहां कैसे आओगे ?

 क्या बात करती हो? हर बार परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं, अपने प्यार के लिए तो मैं समुंदर पार करके भी आ जाऊंगा, कहते हुए उसने यामिनी को अपनी बाहों में भींच लिया। 

उँहहह ! अब छोड़ो भी, यह मस्का लगाना, यामिनी ने मुंह बनाते हुए कहा, लेकिन मन ही मन यामिनी कुछ और ही सोच रही थी ,अभी भी उसके प्यार में कहीं न कहीं, कोई न कोई कमी तो है जो इसे मुझसे  खींच कर ले कर जा रही है, अबकी बार मैं तभी आऊंगी, जब तुम्हारे पास मेरे लिए समय होगा रूठते हुए बोली।  

अभी तो शाम तक के लिए समय है,न...  कहकर कुमार उसे लेकर बिस्तर पर गिर पड़ा।

कुमार शाम में ही , अपने घर के लिए निकल चुका था। यामिनी जानती थी, कि वह जा चुका है किंतु तब भी उसने कुमार को फोन किया -डार्लिंग ! कुमार ,क्या तुम घर समय पर पहुंच गए ? मुझे तुम्हारी बहुत फिक्र हो रही है। 

उधर से किसी महिला की आवाज आई, आप कौन बोल रही हैं ? आपने किसको फोन किया है ?

ओह ! रोंग नंबर लग गया है, मैंने तो कुमार को फोन किया था,यामिनी ये सब बातें अंग्रेजी लहज़े में कर रही थी।  

आप कौन बोल रही हैं ? उधर से तीखी आवाज आई। 

क्या आप कुमार को जानती हैं ? मिश्री सी आवाज मधुलिका के कानों में पड़ी। 

जी, मैं कुमार को बहुत अच्छे तरीके से जानती हूं , मन ही मन क्रोधित होते हुए मधुलिका ने कहा। 

अच्छा, तो आप यह जानती होंगी कि वो घर पर ठीक-ठाक पहुंच गए हैं या नहीं। 

जी नहीं, अभी वह घर पर नहीं पहुंचे हैं, अब आप मुझे बताएंगीं कि आप कौन बोल रही हैं ? दांत पीसते हुए मधुलिका ने पूछा। 

आप मुझे नहीं जानती हैं, वह अक्सर मेरे पास मिलने आते रहते हैं, बहुत ही अच्छे इंसान हैं, मुझे बहुत प्यार करते हैं , मैं उनसे ही बात कर लूंगी , तुम उन्हें बताना मत ! कि मुझे उनकी फिक्र हो रही थी, वह घर पर ठीक. सही- सलामत पहुंच गए हैं या नहीं। वैसे आपने बताया नहीं, आप कौन बोल रही हैं ? जानबूझकर यामिनी ने मधुलिका को छेड़ा और बोली - अभी दिल्ली में मेरे साथ ही तो थे , अचानक ही उनका काम आ गया इसलिए यहां से चले गए, वैसे कौन बोल रही हैं ?

मैं कोई भी हूं, तुम्हें इससे क्या ? कहते हुए क्रोध में मधुलिका ने फोन पटक दिया। 

फोन कटते ही यामिनी मुस्कुराई और अपने आप से ही बोली -मेरे डार्लिंग चले गए हैं, तब उनकी यह डार्लिंग भी जा रही है। मुस्कुराते हुए वह भी अपने  जाने की तैयारी करने लगी। 

मधुलिका के मन में, जो उसे शक का बीज बोना था ,वह यामिनी बो चुकी थी, अपनी सफलता पर अत्यंत प्रसन्न हुई थी।

 कुमार, गाड़ी में बैठा हुआ खुश हो रहा था, यामिनी मेरी जिंदगी में एक बहार बनकर आई है, देश-विदेश घूमती है, मैं तो यह भी नहीं जानता, कहां से आती है और कहां को चली जाती है ? बस किसी खुशनुमा झोंकें  की तरह मेरे इस नीरस भरे जीवन में खुशियां बिखेर जाती है।

मधुलिका क्रोध से तमतमा गई, मन ही मन सोच रही थी -वही मैं सोचूं, पहले तो दो-तीन दिन के लिए बात कहकर जाते थे और वह भी महीने दो महीने में और अब तो बिना बताए ही, चले जाते हैं और यह भी पता नहीं रहता कि कहाँ गए हैं ? मैं भी फोन करती हूं , तो रुखा सा जवाब मिलता है। क्या इस दिन के लिए मैंने मैंने ,इससे विवाह किया था ? ये, मुझे एक दिन इस तरह से धोखा देगा। अरे धोखा देना तो इसकी फितरत ही है, इसने शिल्पा को भी तो धोखा दिया था किंतु यह तो कह रहा था -''मैं शिल्पा से प्रेम ही नहीं करता।

अचानक ही ,मधुलिका को शिल्पा की याद हो आई , वह भी न जाने आज कहां होगी ? मेरी अच्छी दोस्त थी , इसी[कुमार ] के कारण मेरी दोस्ती टूटी और आज यह ही मुझे धोखा दे रहा है। न जाने मन में मधुलिका ने क्या सोचा ? कबसे कुमार के व्यवहार में बदलाव आया है , वह उस तारीख को देख रही थी, उन दिनों यह जयपुर गया हुआ था। क्या जयपुर में कुछ ऐसी बात हुई थी, बिना जाने समझे ही, वह' गूगल' पर जयपुर के विषय में  खंगाल रही थी। वह स्वयं ही नहीं जानती कि वह क्या जानना चाहती है ? मन , बेचैनियों से परेशानियों से घिरा हुआ था। तभी उसकी दृष्टि , उन्हीं दिनों की एक'' कला प्रदर्शनी'' पर पड़ी। 

और वह, उसे देखने लगी, उसके कुछ चित्र उसे दिखाई दे रहे थे , उसे देखते हुए मधुलिका को, शिल्पा की याद हो आई। फिर सोचने लगी -कुमार को भी तो, कला से बहुत लगाव है , हो सकता है ,यह प्रदर्शनी देखने गया हो ,यह भी हो सकता है , मैं उससे नाराज होंउंगी कि मुझे अपने साथ क्यों नहीं ले गया इसलिए मुझे नहीं बताया होगा ? 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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