Khoobsurat [part 102]

 हो सकता है, जो हालात आज तुम्हारी बीवी के हैं  , वो शायद मेरे भी हो सकते थे, कहकर यामिनी हंसने लगी। 

ये तुम क्या कह रही हो ? कुछ भी न समझते हुए कुमार ने, उसकी हंसी का कारण जानना चाहा। 

यामिनी, महसूस कर रही थी ,आज कुमार को, उसका साथ इतना सुहाना लगने लगा है ,कि वो तमन्ना कर रहा है ,काश !तुम मेरी जिंदगी में पहले आई होतीं। ''इस बात पर उसका कुमार के प्यार पर उसका विश्वास तो बढ़ा ही, किन्तु मन ही मन वो ,सोच रही थी -'आज ये मेरा दीवाना हो गया ,कल यदि इसकी बीवी के स्थान पर मैं होती और इसकी ज़िंदगी में कोई और मुझसे भी सुंदर आती ,तब ये उसका भी दीवाना हो जाता।'' तब वो कुमार से बोली -ज़िंदगी की  एक सच्चाई यह भी है , जिस समय तुमने, अपनी पत्नी से विवाह किया होगा, उस समय भी, तुमने उसे अपने प्यार का एहसास दिलाया होगा। 



यामिनी की बात समझकर कुमार, थोड़ा शर्मिंदा हुआ किन्तु अपनी बात को बड़ी करते हुए बोला -नहीं, ऐसा कुछ नहीं है, मेरे पास पैसा था और उसे [मधुलिका को ] पैसे वाले लड़के की जरूरत थी, जो उसकी जरूरतों  को पूरा कर सके। हमारे रिश्ते का संबंध प्यार से नहीं, पैसे से जुड़ा है। 

इसका अर्थ तो यही हुआ, जब तक तुम्हारे पास पैसा है, तब तक तुम्हारा रिश्ता है ,तुम दोनों के बीच कभी प्यार रहा ही नहीं ,स्वार्थ और आवश्यकताओं से जुड़ा था।  

पूल के पानी की लहरों में, किसी को उन लहरों से खेलते हुए देखकर कुमार बोला -यह भी कह सकते हैं  कि तुम्हारा और हमारा रिश्ता, प्यार से बनता, तुम्हारी कोमल भावनाएँ, मेरे प्रेम की कूची में डूबकर ,एक सुंदर चित्र का निर्माण करतीं क्योंकि हमारे मध्य प्रेम ही होता ,स्वार्थ नहीं ,जरूरत नहीं ,अब तुम और हम एक -दूसरे के प्यार में खोने को तैयार रहते हैं। हमारे इस प्यार में किसी भी तरह  का कोई स्वार्थ नहीं ,बस प्यार ही प्यार है। न तुम्हें , मुझसे कुछ पाने का लालच और न ही मैं, अपने किसी स्वार्थ से जुड़ा हूँ ,बस हम दोनों के मध्य जो भी है ,प्यार ही प्यार है। कहते हुए कुमार ने भावुक होकर ,यामिनी को अपनी बाँहों में भर लिया। 

कैसे मतवाले हुए जा रहे हो ?आओ ! अपने कमरे में चलते हैं। 

वैसे यहाँ भी, हमें कोई जानता नहीं है, यामिनी के गालों पर  चुंबन करते हुए बोला। 

जानता भी होता, तो क्या तुम, अपने प्रेम से इंकार कर देते ?यामिनी ने उसकी तरफ देखा ,वो जैसे उसके जबाब की प्रतीक्षा में थी। 

इंकार कौन कर रहा है ? मैं क्या किसी से डरता हूँ ? अकड़ते हुए कुमार बोला। 

यदि तुम्हारे घरवालों ने देखा तो..... 

तो क्या ?पापा से कह देता -''मुझसे पहले जो गलती हुई ,उसका क्या कोई सुधार है ?अब मुझे इस कलाकार के सिवा कोई नहीं भाता किन्तु तुम भी तो बंधनमुक्त ही रहना चाहती हो। तुम्हें कोई  रिश्ता नहीं चाहिए।''तुरंत ही अपने शब्दों को उसने, जैसे एक सहारा दे दिया।  

तुम ऐसा कैसे कह सकते हो ?हमारे मध्य एक रिश्ता बन चुका है ,हम सोचते हैं ',कि हम किसी रिश्ते में नहीं बंधेंगे किन्तु मुझे लगता है, बिना बंधे कोई रिश्ता बन ही नहीं सकता। क्या तुम और मैं प्रेम के रिश्ते में बंध चुके हैं या नहीं।''अपनी भौंहों को हिलाते हुए जैसे कुमार की सहमति चाहती थी।  

हाँ ,वो तो है, कहकर कुमार ने उसे हाथ पकड़कर उठाया और अपनी गोद में उठा लिया और उसे लेकर अपने कमरे की तरफ बढ़ चला। तुम सच ही कह रही हो , कुछ दिन पहले तो हम, एक- दूसरे को जानते भी नहीं थे और जब मिले हैं, तो लगता है, जैसे बरसों के बिछड़े मिले हों। मेरा तुमसे इतना गहरा रिश्ता हो गया है ऐसा लगता है, अब मैं तुम्हारे बिना जैसे जी ही  नहीं पाऊंगा। कहते हुए उसने यामिनी के आधारों को चूम लिया। 

धत...  यह क्या कर रहे हो ? मेरी स्थिति का लाभ उठा रहे हो कहते हुए यामिनी ने भी उसके गले में अपनी बाहें डाल दीं। दोनों कमरे में पहुंचकर उन्मुक्त होकर, अपने प्यार में आलिंगनबद्ध हो गए। कुमार को भी यह एहसास नहीं रहा कि उसका पिता बीमार है या फिर उसकी बीवी है और बच्चा है।

 इस समय उसकी दुनिया बहुत छोटी हो गई थी, जो सिर्फ यामिनी तक ही सीमित थी। सबसे बड़ी बात तो यह है, यामिनी उससे कोई अपेक्षा नहीं रखती थी, न ही उसने कुमार से कोई शर्त रखी थी। वह भी उन्मुक्त होकर, उसके प्यार में खो गई  थी। प्रेम की चरम सीमा को पार कर, दोनों अभी भी एक- दूसरे की बाहों में लिपटे हुए थे तभी मधुलिका का फोन आया।

  फोन में मधुलिका का नाम देखकर कुमार को कोफ़्त  हुई और मन ही मन भर बुदबुदाया -यह भी न....  कभी भी फोन कर देती है कोई समय भी नहीं देखती , मुस्कुरा कर यामिनी को चूमा और फोन उठाया -गुस्से से बोला - अब क्या है ? क्या परेशानी आ गई है ? क्या तुम मुझे काम भी नहीं करने दोगी ? देखा नहीं मैं मीटिंग में कितना व्यस्त था ? बीच में से ही आना पड़ा। 

कुमार की डांट सुनकर मधुलिका, थोड़ी घबरा गई और बोली -सॉरी ! मैंने यह कहने के लिए फोन किया था कल आपके बेटे की'' पेरेंट्स मीटिंग'' है,आप कब आ रहे हैं ?

तुम्हें कुछ काम भी है या नहीं, जब भी फोन करती हो, दिमाग खराब कर देती हो , मैं यहां काम में व्यस्त रहता हूं तुम क्या मीटिंग में भी नहीं जा सकतीं । पढ़ी- लिखी हो, गंवार की तरह व्यवहार करती हो। 

कुमार की यह बात सुनकर मधुलिका को थोड़ा क्रोध आया और वह बोली- पढ़ी लिखी हूं -तभी तो बता रही हूं'' पेरेंट्स मीटिंग ''है, उसमें माता-पिता दोनों को जाना होता है दोनों को ही बुलाया गया है। 

कह देना, वे कारोबार के सिलसिले में  बाहर गए हैं। 

वह तो मैं जानती हूं, पर कहां गए हैं ?यह नहीं जानती। कम से कम एक पत्नी को इतना तो पता होना ही चाहिए कि उसका पति क्या व्यापार कर रहा है और कारोबार के सिलसिले में कहां गया है ?

 यह सब जानकर तुम क्या करोगी ? तुम अपनी घर- गृहस्थी संभालो ! तुम्हारे लिए यही सही है।

 मेरे लिए क्या सही है, क्या नहीं है ? यह मैं बखूबी जानती हूं , किंतु इन दिनों में महसूस कर रही हूं, कि तुम कुछ ज्यादा ही लापरवाह और ज्यादा ही कारोबारी हो गए हो। यह परिवार मेरा ही नहीं, तुम्हारा भी है , और तुम यह भी भूल रहे हो, कि मैं तुम्हारी पत्नी हूं। 

मन ही मन कुमार बुदबुदाया, यही तो गलती हो गई। 

क्या कुछ कह रहे हो ? मधुलिका ने जानना चाहा, किंतु उसके व्यवहार से मधुलिका इतना तो जान गई थी कि कुमार उसकी उपेक्षा कर रहा है। अब पहले जैसा लगाव, उसके साथ नहीं रहा लेकिन इतना भी जानती है या तो इसके कारोबार में कोई बात है या फिर इसके जीवन में कोई और लड़की आ गई है। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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