Ham gulam nahi

नववर्ष की बहुत -बहुत बधाई ! दिव्या ने अपनी सहेली रेखा को फोन पर एक संदेश भेजा किन्तु उसका कोई जबाब नहीं आया,तब दिव्या ने यह जानने के लिए उसे फोन किया कि क्या वो ठीक है ? या उसका संदेश उसे मिला या नहीं किन्तु उसने जो कहा ,उससे दिव्या को लगा ,उसने ,उसे ''नववर्ष की बधाई ''देकर जैसे बहुत बड़ी गलती कर दी हो। जब दिव्या ने उससे फोन करके पूछा -वो ठीक तो है। 

तब वो बोली - हाँ ,मैं ठीक हूँ ,मुझे क्या हुआ है ?

क्या तूने मेरा संदेश नहीं पढ़ा ?


पढ़ा था ,रूखे से स्वर में रेखा बोली। 

तब क्या तू मुझे जबाब नहीं दे सकती थी ,मैंने तुझे' नववर्ष की शुभकामनायें' भेजी थीं। 

नहीं देनी थी, इसीलिए जबाब नहीं दिया ,क्या तू जानती नहीं है ?ये' नया साल' हमारा नहीं है ,हमारा नया साल ''चैत्र मास'' में आएगा ,तब बधाई देना ,तब मैं भी तुझे जबाब दूंगी। 

किन्तु हमारा कलेंडर भी तो इसी महीने से आरम्भ होता है ,तब नए साल की बधाई देने में क्या जा रहा था ? 

बचपन से ही ,हम ऐसे स्कूलों में पढ़े हैं ,जब नया साल' जनवरी' से शुरू हुआ है ,''चैत्र मॉस'' से नहीं, क्या तू स्वयं' पंचांग' जानती है ,अपने हिन्दी महीने में कितनी तिथि आती हैं , कितने पक्ष होते हैं ? जानती भी है। एकादशी ,द्वादशी क्या होता है ? या फिर उन बारहों महीनों के नाम क्या हैं ? कुछ पता है ,या फिर कुछ लोगों से सुन लिया ,ये'' नया साल'' हिन्दू धर्म के अनुसार नहीं है। तू मुझे बता हिन्दू संस्कृति के अनुसार तू अब तक कितनी चीजें मानती आई है ? तुझे तो हिंदी महीनों के नाम भी याद  नहीं होंगे। 

मैं, ये सब नहीं जानती तो क्या ? आज तक तूने देखा या सुना है ,किसी भी ''ईसाई धर्म'' में हमारा 'नया साल 'मनाया गया हो ,या फिर हमारे होली -दीवाली जैसे त्योहारों में शामिल हुए हों ,फिर हम ही क्यों ?जब हम लोगों में से भी चंद लोग उनका विरोध करते हैं ,तो तुम जैसे' अंग्रेजी के ग़ुलाम' हमें समझाने बैठ जाते हैं। मेरी दादी सही कह रहीं थीं -''अंग्रेज चले गए ,किन्तु अपनी अंग्रेजी और हमारी गुलाम मानसिकता को यहीं छोड़ गए। ''

 मैं मानती हूँ,  हमारी सभ्यता किसी से कम नहीं, किंतु हर कहानी में कुछ ना कुछ कमी तो रह ही जाती है, आगे बढ़ने के लिए आज अंग्रेजी भी चाहिए। ज्यादातर कार्य अंग्रेजी में ही होते हैं किंतु इसका अर्थ यह तो नहीं की अपनी संस्कृति को भुला दें। पहले समय में लोग आजीविका के लिए खेती पर निर्भर थे, किंतु आज गांव से बाहर जाकर कमा रहे हैं या फिर मजबूरी में घर से दूर हैं ,हमारा देश बहुभाषी देश है , तुम कितनी भाषाएँ सीख़ लोगी ?और अंग्रेजी हर जगह बोली जाती है। चलो ! ये सब छोडो ! तुम मुझे ये बताओ !क्या तुम उनकी सभ्यता की ग़ुलाम नहीं हो। 

कैसे ?

हमारे यहाँ पालती लगाकर, नीचे बैठकर भोजन करते थे किन्तु क्या तुम ऐसा करती हो ,तुम्हारा डिनर'' डाइनिंग टेबल'' पर क्यों होता है ? क्या तुम भोजन से पहले मंत्र पढ़ती या जानती हो ? क्या तुम चाय या कॉफी नहीं पीती हो ?  क्या तुम जींस न पहनकर, धोती -साड़ी पहनकर अपने दफ़्तर जाती हो ,दफ्तर शब्द तो तुम्हें अज़ीब ही लगेगा ,तुम तो ''ऑफिस ''जाती हो। आजकल तो हर जगह ''वेस्टर्न टॉयलेट ''लग चुके हैं ,उसी में जाती हो न.... ऐसी न जाने तुम्हें मैं कितनी चीजें गिना सकती हूँ ,जो हमारे लिए अंग्रेज छोड़कर चले गए। हम लोग ही ,कोई यदि हिंदी में बात करता है तो उसे कितनी हेय दृष्टि से देखते हैं ,किसी ने धोती -कुरता पहना है, तो उसे गंवार समझते हैं। किसी को जनेऊ धारण करते देख लिया तो समझने प्रयास नहीं करेंगे इसका क्या महत्व है ,ये क्यों धारण किया जाता है ? बल्कि उसको देखकर हंसेगे। क्या तुम जानती हो अंग्रेजी सभ्यता हमारे अंदर कितनी रच -बस गयी है। तब एक ''नववर्ष की बधाई ''देने में क्या जा रहा है ?

हमारी सम्पूर्ण शिक्षा ,रहन -सहन ,खानपीन ,उनकी तरह ही हो रहा है ,किसी भी कारोबार के लिए अंग्रेजी कलेंडर पर ही निर्भर रहते हैं। अब ऐसे में,हमारा  समय के साथ न चलना भी तो मूर्खता होगी किंतु हमारे यहां अच्छी आदतें लोग कम ही ग्रहण करते हैं। बुरी आदतें जल्दी सीख़ जाते हैं। मेरा तो यही विचार है - ,''सभ्यता कोई भी हो ,जो चीजें अच्छी हों ,उन्हें मान लो ! वैसे हमारी संस्कृति भी किसी से कम नहीं है। हम ही अपने बच्चों को अपने देश के प्रति सम्मान और संस्कृति के विषय में बताएं , यह तो हम पर निर्भर करता है, हम अपने बच्चों को कैसे संस्कार देते हैं ? वरना सिगरेट पीना, शराब पीना, देर रात पार्टियों में जाना, जंक फूड खाना,रिलेशन में रहना , यह चीजें तो बच्चे वैसे ही सीख जाते हैं, उन्हें सीखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। हमें समय के साथ भी चलना है और अपनी संस्कृति का सम्मान भी करना है किन्तु किसी  सभ्यता का ग़ुलाम नहीं बनना है। 

हमारा देश पहले'' कृषि प्रधान'' देश रहा है किन्तु आज का किसान अपनी भूमि से वंचित हो खुश हो रहा है ,किसान बनना कोई नहीं चाहता ,जो किसान हैं ,उनका कोई सम्मान नहीं करता। 

यह बात नहीं है ,आज भी हमारे देश में ''जय जवान ,जय किसान ''का नारा लगाया जाता है ,रेखा तपाक से बोली। 

बस यह नारा ही है ,वास्तविकता नहीं ,जो किसान अन्न उपजाता है ,फिर उसे आत्महत्या क्यों करनी पड़ी ?वो आज जमीन बेचकर खुश क्यों है ?जो कभी मालिक था ,अब समय को देखते हुए मजदूरी करने को तैयार है और कभी विवश भी होगा। जो लोग अपनी सभ्यता, संस्कृति से जुड़े रहना चाहते हैं ,उन्हें समझता ही कौन है ?उन्हें असभ्य ,गंवार ,ओढ़ने -पहनने की तहज़ीब नहीं इत्यादि नामों से पुकारा जाता है। बड़ी आई ,नववर्ष का विरोध करने ,पहले जो अन्य चीजें मैंने गिनाई हैं ,उनको ही ठीक कर लो !किसी के कहे सुने से नहीं ,अपने व्यवहार और सोच को बदलने से होता है। तब हम इस ग़ुलामी से आज़ाद होंगे। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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