Qabr ki chitthiyan [part 65]

रिद्धिमा को एक चिट्ठियों का पुलिंदा मिलता है ,उनमें से एक चिट्ठी को पढ़कर उन्हें पता चलता है कि ये किसी के पछतावे की चिट्ठी है और इन चिट्ठियों का संबंध हवेली से नहीं वरन हवेली के पीछे जो जंगल है ,उसकी क़ब्र से है। तब वे सभी उस क़ब्र के समीप जाते हैं। तब उन्हें पता चलता है कि इस क़ब्र का साया [आत्मा ]अनाया की सच्चाई को सामने लाना चाहता था। बहुत पहले एक चिट्ठी इन बच्चों को वहां मिली थी किन्तु  उस रात सबने सोचा था—यह कोई मज़ाक कर रहा है ,फिर कोई चेतावनी आई ,हम सबने सोचा था -ये सब हवेली से आ रहा है ,पर असल में—“हवेली सिर्फ़ एक बहाना थी,”


रिद्धिमा बोली -“असल शुरुआत तो यहां से हुई थी ”वे दोनों अब उसी कब्र के सामने खड़े थे,हवा में भारीपन  था ,पर अब उन्हें कोई डर नहीं था ,सिर्फ़… इंतज़ार था किसी नई चिट्ठी या फिर चेतावनी का..... 

तभी उस स्थान की मिट्टी पहली बार अपने स्थान से हिली ,कोई अट्ठाहस नहीं ,न कोई राक्षसी गर्जना ,न कोई भयानक  विस्फोट !बस—एक थकी हुई आह !और फिर…कुछ ही देर में एक साया उनके सामने खड़ा दिखलाई दिया।इस बार वहाँ न कोई परछाईं ,न डरावनी आकृति दिखलाई दे रही थी। वह एक साधारण आदमी ,जिसकी झुकी हुई आँखें ,एक पिता का थका हुआ चेहरा नजर आ रहा था। 

कबीर के होंठ हिले—“आप…?”

उस आत्मा  ने सिर झुकाया और बोला  -“हाँ,”उसकी आवाज़ में वर्षों की चुप्पी थी,“मैंने ही वो चिट्ठियाँ लिखीं थीं ।”

रिद्धिमा की आँखें भर आईं।“अब अनाया वहां नहीं…थी ?”तब उस साया ने कहा -नहीं ,“वह तो सिर्फ़ गुस्सा थी ,उसका वो दर्द भरा रूप था ।”

तब साया ने एक कब्र की ओर देखा और बोला -“मैंने अपराध तो किया था,किन्तु “किसी की हत्या नहीं की ।”

कबीर सन्न रह गया ,वो सोच रहा था -शायद इन्होंने ही अनाया को मारा होगा ,“तो फिर—?”

मुझे “सच को दफ़न करने की सजा मिली ”उसने गहरी साँस ली और बोला -“अनाया को हमने नहीं मारा।हमने उसे उस कमरे में अकेला छोड़ा था ”तभी हवा ठंडी हो गई ,“अब सच जो सामने आने वाला था—हम सभी  डर गए थे। 

और वो हवेली... , नाम.... , विरासत…”कबीर की आवाज़ टूट गई।

साया बोला —मैंने उसे वहाँ छोड़ दिया,जहाँ कोई आवाज़ नहीं सुन सकता था।”

रिद्धिमा फुसफुसाई—यानि..... “कब्र…”

साया ने हाँ में सिर हिलाया ,दरअसल वह मरी नहीं थी ,वह भुला दी गई थी।”

“अनाया ने बदला नहीं लिया,”साया बोला- “वह बस हमारे लिए सवाल बन गई थी। ”

कबीर की आँखों में आँसू थे,“तो यह सब—हवेली, श्राप, राक्षस…?”

“यह मानव के अंदर का डर था, जो विभिन्न  रूपों में नजर आ रहा था ,”साया ने कहा।“जब इंसान अपने अपराध से भागता है—तो वह कहानी बन जाता है और कहानी… राक्षस।

चिट्ठियाँ इसलिए थीं,क्योंकि मैं सच लिखना चाहता था,”साया बोला।“लेकिन जो ज़िंदा होकर नहीं कर सका ”उसको चिट्ठियों के माध्यम से मरकर करने का प्रयास कर रहा था।  उसने कबीर की ओर देखा “इसलिए तुम्हें चुना क्योंकि तुम सच्चाई से कभी भागते नहीं हो ।”साया ने ज़मीन से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ उठाया और बोला -“मैंने यह चिट्ठी कभी नहीं भेजी।

 उसने रिद्धिमा को वो चिट्ठी दी ,उस पर लिखा था—‘अनाया !अगर तुम यह चिट्ठी पढ़ रही हो,तो जान लो—तुम कोई राक्षस नहीं  हो , किन्तु हम  ही कायर थे।’उस चिट्ठी को पढ़ते हुए रिद्धिमा की उँगलियाँ काँप गईं।

कबीर ने आँखें बंद कर लीं और पूछा -“फिर वो  हवेली !

साया ने हल्की मुस्कान दी ,“हवेली ने कुछ नहीं किया ,वह बस देखती रहती थी।”“जब घर और घर के लोग टूटते हैं ,जैसे दीवारें देखती हैं उसी प्रकार हवेली की दीवारें भी बहुत कुछ देख रहीं थीं। वैसे वे हमारे कर्मो और हमारे अतीत की गवाह हैं। चारों ओर सन्नाटा छा गया ,किन्तु अब कोई डर नहीं था, सिर्फ़ अपने कर्मों पर अफ़सोस था।

साया अब धीरे-धीरे परछाई बनने लगा और बोला -“मेरा काम पूरा हो गया 

कबीर आगे बढ़ा—“अब मैं क्या करूँ?”

साया ने कब्र की ओर देखा,“जो हम नहीं कर सके—उसे याद रखना ”और वह धुएं में बदल गायब हो गया।अगली रात वे सभी फिर से कब्र के पास गए —लेकिन इस बार अँधेरे से उन्हें कोई डर नहीं था,बस सच था।हवा स्थिर थी,जैसे खुद साँस रोककर कुछ सुनना चाहती हो।

कबीर और रिद्धिमा कब्र के सामने खड़े थे,दोनों जानते थे—अब जो कहा जाएगा,उसके बाद कुछ भी वैसा नहीं रहेगा। मिट्टी फिर हिली।धीरे…बहुत धीरे…साया प्रकट हुआ।इस बार वह धुंधला नहीं था,ना अधूरा,पूरी तरह स्पष्ट,पूरी तरह इंसान लग रहा था ,उसकी आँखों में डर नहीं—शर्म थी “यह मेरी आख़िरी बार है,”साया ने कहा।“और इस बार—मैं, तुम लोगों से कुछ नहीं छुपाऊँगा।”

कबीर ने कुछ नहीं कहा,उसने बस सिर हिलाया।

“सबसे पहले—अनाया !”हवा में नाम गूँजा।“वह राक्षस नहीं बनी थी,”साया बोला।“उसे बनाया गया था ।”

रिद्धिमा चौंक पड़ी और जिज्ञाशावश पूछ बैठी —“उसे किसने राक्षस बनाया ?”

अभी भी सच बोलते हुए ,साया की आवाज़ काँप गई—“हमने !

वो द्वार क्या था ?— जिसका अनाया को माध्यम बनाया गया था ?

“हवेली में ऐसा कुछ भी नहीं था,”साया बोला।“ न ही कोई आत्मा थी ,न कोई श्राप था ।”“बस एक चीज़ थी—लालच !”उसने कबीर की आँखों में देखा और बोला- “हवेली के नीचे ज़मीन थी—ऐसी ज़मीन जो हर डर, हर पछतावे को जिंदा रख सकती थी,क़ब्रिस्तान !”“हम उसे ही ‘द्वार’ कहते थे।”

रिद्धिमा की साँस अटक गई—“द्वार… किसका?”

“मानव मन का,”साया ने कहा।“जहाँ अपराध बोध मरता नहीं—बस बदलता है।”

अनाया को वहाँ भेजा गया,“उससे कहा गया—‘तुम हमारी रक्षा करोगी’”उसकी मुट्ठियाँ भींच गईं।“पर सच यह था—हमें एक ढाल चाहिए थी,एक ऐसा चेहरा,जिसके पीछे हम छुप सकें।”

“उसका अपराध क्या था?”कबीर ने पहली बार पूछा।

साया की आँखें झुक गईं ,“हमने एक लड़की को अपने पाप का दरवाज़ा बना दिया।”

“उसे भूखा अकेला छोड़ा ,वो डरी  हुई थी ।”“और जब वह बदलने लगी—हमने कहा—‘देखो ! राक्षस पैदा हो गया उसको एहसास दिलाया कि वो राक्षस बन गयी है ”

रिद्धिमा की आँखों से आँसू बह निकले।

“हमने उसे नहीं मारा,”साया बोला।“हमने उससे मानवता छीन ली।”

तब , कबीर को क्यों चुना गया ?रिद्धिमा गुस्से से बोली। 

साया ने गहरी साँस ली ,“अब तुम !”कबीर का दिल ज़ोर से धड़का “तुम्हारे भीतर द्वार नहीं था,”साया बोला -“तुम्हारे भीतर सवाल था।”

“बाक़ी सब सच से भागे किन्तु तुम—उसे देखने के लिए लौटे,”उसने हल्की मुस्कान दी।“इसलिए तुम्हें ताक़त मिली।”“हवेली की नहीं,सच की ”वह बोला। हवेली, श्राप, राक्षस —सब  झूठे खोल थे “हवेली सिर्फ़ एक जगह थी। साया बोला -“जहाँ इंसान ने अपने डर को कहानी बना दिया।”“श्राप—एक बहाना।”“राक्षस—एक मुखौटा !”

कबीर की आँखों में अब कोई डर नहीं था -“तो जो हमने देखा—वह क्या था?”

“अपराधबोध का आकार,”साया ने जबाब दिया।“जब बहुत से लोग एक ही झूठ को बार -बार देखें ,महसूस करने लगें ,तब वह सच ही लगने लगता है। —

मुझे एक बात समझ में नहीं आई, आख़िर में अनाया क्यों हँसी थी ?”रिद्धिमा ने पूछा।

साया की आवाज़ भर्रा गई और वो बोला -क्योंकि उसे सच्चाई का एहसास हो गया था ,उसका भ्रम ,जो हमने बनाया था टूट गया था कि वो राक्षस नहीं थी।”

“वो तो ,'हम' थे।”

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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