Qabr ki chitthiyan [part 64]

अभी कबीर, अनाया और रिद्धिमा हवेली के रहस्य को समझने का प्रयास कर ही रहे थे ,तभी हवेली की दरारों से एक काला धुंआ निकलता है और वो बिना चेहरे वाला शैतानी आकार ले लेता है  और उसी बिना-मुँह वाले चेहरे से आवाज़ आई—“अनाया—तू मेरी है।”अनाया की आँखें आश्चर्य और ड़र से फैल गईं।

“मैंने… मैंने तुझे कभी नहीं बुलाया…”“पर तूने ही मुझ पर अपना अधिकार जतलाया था।”अनाया का दिमाग घूम गया।


 और तभी—कबीर चीखा-अनाया भागो ! और अनाया को पकड़कर अपनी ओर खींचता है, दोनों बाहर की ओर दौड़ पड़ते हैं लेकिन जैसे ही वे दरवाज़े के करीब पहुँचे—हवेली ने साँस ली।

हाँ—हवेली ने एक असली साँस ली,ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई प्राचीन दैत्य फिर से जन्म ले रहा हो और इसी के साथ, दरवाज़ा ज़ोर से—धड़ाआआअम!!की आवाज के साथ बंद हो गया।

कबीर चिल्लाया,“ये दरवाज़ा बेजान नहीं… ये जिंदा है!”

अनाया की छाती की जलन और बढ़ गई,अब वह दर्द उसके पूरे शरीर में घूम रहा था।

“कबीर… मुझे लगता है… ये मुझे अंदर खींच रहा है… मेरे अंदर कुछ जाग रहा है…”

कबीर उसकी बाँह पकड़कर बोला -“नहीं! तू घबरा मत ,तू अकेली नहीं है, हम साथ में बाहर निकलेंगे!”

लेकिन वह आकार—वह काला, अनंत-सा प्राणी—उनके रास्ते में आ खड़ा हुआ और उसकी आवाज़ पूरे हवेली में गूँज उठी—“भागने की कोशिश मत करना , कबीर ! जिसे मैं चुनूँ… उसे दुनिया की कोई ताकत नहीं बचा सकती ,उसने न जाने क्या किया ?अनाया की धड़कनें एकदम से धीमी होने लगीं ,ऐसी धीमी कि कबीर को लगा, कि वह बेहोश हो जाएगी ,और फिर—अनाया के दिल की धड़कनें पूरी तरह रुक गईं।

कबीर घबरा गया,और उसे पुकारा -“अनाया ! अनाया… सांस ले !”लेकिन अनाया शायद जा चुकी थी ,कबीर अभी भी प्रयास कर रहा था। एकदम से अनाया की आँखें खुलीं…किन्तु अब अनाया पहले वाली अनाया नहीं थीं। उसकी उन आँखों में वही खाली, काला साया था जो उस प्राणी की आँखों में था।

कबीर पीछे हट गया “ये… ये क्या—”अनाया ! अनाया चुपचाप दो कदम आगे बढ़ी, कुछ देर आगे बढ़ने के पश्चात उसकी आवाज़ कबीर ने सुनी किन्तु …ये अनाया की आवाज नहीं थी ,उसके अंदर कोई ओर भी था जिसने उसकी आवाज पर भी अधिकार कर लिया था ,वह अनाया के अंदर से बोला -“मैं यहाँ का अकेला स्वामी नहीं हूँ…”वह प्राणी बहुत ही ड़रावनी हंसी हँसा—एक ऐसी हँसी जो इंसान के ''कानों से खून निकाल दे।''अनाया की आवाज़ जारी रही—“मैं उस काली शक्ति को इस दुनिया में लाने का द्वार हूँ।

अनाया को देख..... कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया,“न… नहीं… अनाया, प्लीज़… वापस आ जाओ !”

लेकिन अनाया अब एक ऐसी शक्ति के साथ, उसके सामने खड़ी थी, जो इंसान को राख बना दे  और उसने वही शब्द दोहराए ,जो हवेली बार-बार कह रही थी—“जिसने मुझे जगाया… वह मेरा होता है।”

कबीर रो पड़ा,“अनाया !मैं तुझे छोड़कर नहीं जाऊँगा ! मैं तुझे बचाऊँगा !”लेकिन उस प्राणी ने अपना हाथ उठाया, इतना बड़ा… इतना लंबा…हाथ ,जैसे वो परछाई खुद उसका हथियार बन गई हो ,उसने कबीर के सीने को अपना  निशाना बनाया —“तू उससे लड़ा है, जिसे देवता भी छूने से डरते हैं।”और अब तू मेरी राह में खड़ा है…”

तभी जैसे हवा स्थिर हो गई ,समय जैसे थम सा गया,कबीर ने डरकर अपनी आँखें बंद कर लीं ,लेकिन तभी—तभी ऐसा कुछ हुआ ,जो हवेली ने भी नहीं सोचा था ,अनाया ने झटके से उस प्राणी का हाथ पकड़ लिया।हाँ—अनाया ने और उसकी आवाज़ भी अचानक बदल गई—उसके अंदर दो आवाज़ें थीं,जो  लड़ती हुई प्रतीत हो रहीं थीं —एक अनाया की ,एक उस प्राणी की।

अनाया तेजी से चिल्लाई—“मैं… इसकी… नहीं… हूँ!!”न ही मैं इसके वश में रहूंगी ,उस धुएं जैसे बिना चेहरे वाला प्राणी पहली बार  झटके से पीछे की तरफ हट गया ,पूरी हवेली काँप उठी।

कबीर ने दंग होकर देखा—अनाया…उस शक्ति से लड़ रही थी, जिसने सदियों से किसी को नहीं छोड़ा था।

अनाया के हाथों से हल्की रोशनी-सी फूटने लगी— लेकिन साफ़ और सफ़ेद थी ,जैसे उसके भीतर कोई पवित्र चीज़ जाग रही हो।

प्राणी दहाड़ा—“नहीं!!! तू काली शक्तियों का द्वार है—द्वार का विरोध नहीं!”

अनाया चीखी—“मैं तेरी राह नहीं… तेरी कैदी अवश्य हूँ!!!”और उसी क्षण—पूरी हवेली की दरारें… दीवारों में, जमीन में, स्तंभों में…हर तरफ से काला धुआँ निकलने लगा ।

कबीर चिल्लाया—“अनाया, अपने को संभाल ! ये शक्ति छोड़ दे ! तू जल जाएगी!”

लेकिन अनाया चिल्लाई—“कबीर तू भागना मत ! अगर तू भाग गया —तो ये मुझे पूरा खा जाएगा!!”अनाया की आँखों से खून की बूंदें बहने लगीं, लेकिन वह डटी रही और पहली बार—उस प्राणी ने अपने कदम पीछे खींचे और अंत में… सब कुछ शांत हो गया ,हवेली ने चुप्पी साध ली ,धुआँ सिकुड़ने लगा,दीवारें फिर स्थिर होने लगीं ,आँखें—जो ऊपर नीले अँधेरे में तैर रही थीं—धीमी पड़ गईं।उस प्राणी की आवाज़ अब धीमी, कमजोर,किन्तु नफ़रत भरी थी —“तू खुद को बचा नहीं रही…”“तू उसे बुला रही है…वह… जो मुझसे भी पुराना है।”

अनाया का चेहरा पीला पड़ गया,कबीर ने उसे थाम लिया।“कौन? किसे बुला रही है?”अंधेरे की गूँज फुसफुसाई—“…तेरा असली स्वामी।”“जो न हवेली का है…न मेरा…न इस दुनिया का।”

पंडित शिवानंद, जो अभी तक मुश्किल से होश में आए थे, घुटनों पर गिरते हुए बोले—“हे भगवान… इसका मतलब… असली खेल तो अब शुरू होगा…”

हवेली की दीवारों से अंतिम फुसफुसाहट निकली—“भागो मत !”“उसे रास्ता चाहिए… और रास्ता… खुल चुका है।”

और अचानक—पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

 अचानक आज हवेली पहली बार चुप थी ,न कोई फुसफुसाहट,न दीवारों में सरसराहट,न किसी कमरे से आती साँसों की गंध,जैसे वह खुद जानती हो—अब उसकी कोई कहानी नहीं, क्योंकि किसी और की कहानी जो सुनी जाने वाली है।

कबीर पत्थर की सीढ़ियों पर बैठा था।उसके हाथों में अब कोई शक्ति काँप नहीं रही थी।आँखों में नीली-सफेद रोशनी बुझ चुकी थी ,अब सिर्फ़ थकान थी और बहुत से सवाल।

रिद्धिमा उसके सामने खड़ी थी—हाथ में वही पुराना, मटमैला लिफ़ाफ़ा !वही चिट्ठियाँ ,जिन्होंने यह सब शुरू किया था। चिट्ठियाँ जो हवेली से नहीं आई थीं “अब समझ में आ रहा है?”रिद्धिमा की आवाज़ धीमी थी।

कबीर ने सिर उठाया और अविश्वास से पूछा -“क्या ?”

रिद्धिमा ने चिट्ठियों को हवा में हिलाया—“ये ,चिट्ठियां !”उसने, उनमें से एक चिट्ठी खोली ,काग़ज़ पुराना था,स्याही फीकी,पर लिखावट अब साफ़ दिख रही थी।उनमें कोई डर नहीं था,न ही हुक्म देने वाली,न चेतावनी बल्कि… पछतावे से भरी “ये तो हवेली की भाषा नहीं है,”रिद्धिमा बोली -“और न ही अनाया की।”

कबीर ने पहली बार ध्यान से पढ़ा -‘अगर तुम यह चिट्ठी पढ़ रहे हो,तो समझो ,मैं बहुत देर कर चुका हूँ'' ,’उसकी उँगलियाँ काँप गईं।यह स्वर…यह लहजा…उसकी आवाज़ फँस गई—“और बोला -ये पत्र किसी पिता का है। 

 कब्र — जहाँ कहानी शुरू हुई थी,वैसे तो ये हवेली भी क़ब्रिस्तान के क़रीब ही है किन्तु हवेली के पीछे,जंगल से सटी ज़मीन में एक पुरानी कब्र थी,बिना नाम के,बिना पत्थर के,सिर्फ़ मिट्टी की क़ब्र !

कबीर को याद आया—हाँ ,पहली चिट्ठी वहीं मिली थी,ना हवेली के कमरे में ,न हवेली के दक्षिणी हिस्से में ,ये उसी ,कब्र के पास थी।  


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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