Mysterious nights [part 158]

 दमयंती। आज बहुत दिनों के पश्चात, छत पर आई है। उम्र भी तो ढलने लगी है, नीचे ही बहुत काम हो जाता है किंतु आज बच्चों के कारण, उसे ऊपर आना पड़ गया। रूही उसे बताती है - कि दोनों भाई आपस में लड़ रहे हैं, यह कहकर वह रसोई घर की तरफ चली जाती है।

 छत पर पहुंच कर दमयंती उनसे पूछती है - यहाँ क्या हो रहा है ? मां को देखकर दोनों शांत हो जाते हैं।

 तब गौरव माँ से शिकायत करता है, मम्मी ! उस लड़की को यहां रहते 3 दिन हो गए हैं और यह आज तक उसके साथ संबंध ही नहीं बन पाया, हमारा नंबर कब आएगा ?


क्या? तुझे, मम्मी से इस तरह की बातें करते हुए शर्म नहीं आती गर्वित ने उसे डांटते हुए कहा। मम्मी ये हमारा आपस का मामला है ,हम सुलझा लेंगे। 

इसमें शर्माना कैसा ? जब तू कुछ नहीं कर पाएगा , तब हमें तो कुछ न कुछ करना ही होगा,उस पर व्यंग्य करते हुए,गौरव हंसकर बोला। 

क्या, तुझे तनिक भी शर्म नहीं है? अपने बड़े भाई से इस तरह से बातें करते हैं, दमयंती ने गौरव को डांटते  हुए कहा। 

बड़ा भाई है, तो क्या हुआ ? इसके कर्म तो बड़ों जैसे नहीं है, आप इससे ही पूछ लीजिए ! यह तीन दिन से क्या कर रहा है ? आज तक क्या कर रहा है ? वह [ रूही] छत पर आ गई  थी, मुझे देखकर मुझ पर रीझ गई थी, अब मैं क्या कर सकता हूं ? 

ऐसा कुछ भी नहीं है, यह झूठ बोल रहा है , वह ऐसी लड़की है, ही नहीं गर्वित चिल्लाते हुए बोला।

तो क्या, मैं झूठ बोल रहा हूँ ?वो मेरी बांहों में आकर गिरी ,उसके हाव भाव बतला रहे थे ,ये कुछ नहीं कर पाया ,वो इससे खुश नहीं है।

तब उसने, तेरे मुँह पर तमाचा कैसे मारा ?गर्वित ने अपना पक्ष रखा। 

कहीं उसकी ये सोच पकड़ी न जाये ,तब उसने ये तमाशा कर दिया ,मैं तो चुपचाप कसरत करके यहां बैठा  हुआ ,समाचार -पत्र पढ़ रहा था।वो ही यहाँ आई और मुझसे बातें करने लगी और कह रही थी ,वो तो मेरे साथ सोने के लिए तैयार है किन्तु तुम्हारे भाई नहीं मानेंगे। 

यदि वो अपनी इच्छा से आती है ,तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है ?अपना पक्ष रखते हुए गर्वित ने जबाब  दिया।     

मां उन दोनों की बातें ध्यान से सुन रही थी,वो सोच रही थीं -रूही ,कपड़े तो  बगीचे में भी सुखा सकती थी, फिर उसे छत पर आने की क्या आवश्यकता थी ?शिखा ही , छत पर ही कपड़े सुखाने आती थी। वैसे तो उसे भोजन भी बनाना नहीं आता ,कपड़े तो नौकरानी भी सुखा सकती थी।  तब दमयंती ने, गर्वित से पूछा -तुम दोनों तीन दिन से साथ हो, क्या तुम्हारी उससे कुछ बात हुई है ?

कुछ भी तो नहीं, उसका जी ठीक नहीं था , दिन में तो ठीक -ठाक लगती है किन्तु रात्रि में न जाने कैसी -कैसी अज़ीब हरकतें करने लगती है। मैं  उससे कोई जोर जबरदस्ती नहीं करना चाहता , मुझे लगता है, शिखा का साया, आज भी इस हवेली  पर मंडरा रहा है। मैंने कई बार उसके अंदर शिखा के छाया को देखा है , एकाएक उसका जैसे रूप और व्यवहार ही बदल जाता है। उसे छूने का साहस नहीं होता, डर लगता है, गर्वित ने अपनी गर्दन नीचे करके अपनी सच्चाई साबित करनी चाही । 

इस तरह डरेगा तो कैसे काम चलेगा ? वह इतनी सीधी भी नहीं है , मुझे लगता है ,वह तेरा बेवकूफ बना रही है या फिर तुझ में ही औरत को नियंत्रित करने का बल नहीं रहा , गौरव ने अपनी बाजुओं को दिखाते हुए कहा। 

ज्यादा मत बोल ! आज तू बहुत कुछ बोल चुका है, इससे ज्यादा मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा। 

 दमयंती ने देखा और महसूस किया -मेरे पति भी आपस में भाई हैं किंतु आज तक उनमें इस तरह का किसी भी तरह का भेदभाव ,और न हीं कोई झगड़ा हुआ , सब कुछ सरलता से हो गया फिर इन बच्चों में क्या दिक्कतें आ रही हैं ? दमयंती दोनों से बोली -तुम्हारे पिता भी भाई हैं , आज तक उन भाइयों में ऐसा झगड़ा कभी भी नहीं हुआ , जो कुछ भी था आपसी सहमति से हुआ था ,किसी ने भी अपने बल का दुरुपयोग नहीं किया। किंतु अब हमारे घर में ऐसा हो रहा है जैसे तुम एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हुए हो।

 तब वो गौरव की तरफ देखते हुए बोली -तुम इसके छोटे भाई हो, तुम्हें इसकी स्थिति को समझना चाहिए और तुम इसका दूसरे घर की  लड़की के सामने, मजाक बना रहे हो, क्या यह उचित लगता है ? यदि उसे कोई परेशानी भी है, तुम इससे एकांत में बात कर सकते थे। उसके सामने अपने भाई का मजाक उड़ाने की क्या आवश्यकता थी ?मैं तुम्हारे हर अच्छे -बुरे फ़ैसलों में तुम्हारे साथ रही हूँ ,क्यों ? उसने दोनों की तरफ देखा,क्योंकि हम सभी साथ थे।   इस तरह से तो वह तुम दोनों पर हावी हो जाएगी, तुम दोनों पर ही नहीं चारों पर हावी हो जाएगी। वह घर में फूट भी डलवा सकती है, तब तुम क्या करोगे ? क्या तुमने अपने पिता से कुछ नहीं सीखा, कितनी शांति और सरलता से सभी कार्य हो जाते हैं ?फिर चाहे वे गलत ही क्यों न हों ?

 तभी उसे सुनयना देवी की याद आई, और बोली - तुम्हारी दादी, हमारे लिए यह श्राप छोड़कर गई है, सोचा तो उन्होंने यही होगा कि यह घर टूटे नहीं किंतु आज, उनकी यही सोच हमारे लिए एक श्राप बन गई है। एक ही लड़की चार पतियों के साथ रहना नहीं चाहती और ऐसी लड़की ढूंढना मुश्किल है।

 पता नहीं, आजकल की लड़कियों को क्या हो गया है ? गौरव बोला -उन्हें तो खुश होना चाहिए, एक साथ चार-चार पति जो मिल रहे हैं। 

तुम चुप करो! सभी की एक जैसी सोच नहीं होती, क्रोध से डांटते हुए गर्वित बोला -और रुही भी इस तरह की लड़की नहीं है। मम्मी! क्या आपने उससे इस विषय पर बात की थी। 

मेरी तो अभी तक उससे कोई बात ही नहीं हुई , दमयंती में स्पष्ट किया। 

यह आप क्या कह रही हैं ? यह बात सुनकर गर्वित जैसे उछल पड़ा।

 क्यों तुम कहना क्या चाहते हो ? तुम्हें इस बात में आश्चर्य क्यों हो रहा है ?मैं सोच रही थी, अभी तो आई है धीरे-धीरे उससे बात भी कर लूंगी।

 लेकिन उसने तो मुझसे  इस विषय पर बात की है, और वही मुझे वायदा ले रही थी तभी मैंने उसे यह वादा भी किया था कि यदि उसकी इच्छा नहीं होगी, तो और कोई भी उसके समीप नहीं आएगा। 

तुम तो उसे ब्याह कर लाये हो, क्या तुम भी उसकी इच्छा के बगैर उसके करीब नहीं जाओगे ! गौरव ने व्यंग्य किया।

 देख !तू, अब बहुत ज्यादा बोल रहा है , मैंने उसमें रात्रि में शिखा की छाया देखी  है और वह मुझसे शिखा के रूप में ही बातें करती है वह तो यहां पहली बार आई है फिर उसे कैसे मालूम ? कि हमारे परिवार की कोई  रस्म है।

 कहीं ऐसा तो नहीं, वह पहले ही सब कुछ जान गई हो, और हमें भी' फूट डालना' चाहती है ,गौरव ने संदेह जतलाया।  


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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