Khoobsurat [part 90]

 नित्या को जब पता चलता है ,उसकी बुआ के यहाँ हादसा हो गया है ,यह उसी के परिवार का ही मामला है। विचारों में मतभेद आने के पश्चात भी, उसने अपनी बुआ से मिलना उचित समझा। बात भी सही है ,ऐसे हालातों में तो दुश्मन भी साथ खड़े हो जाते हैं। ये तो रिश्तों की बात है ,अपनी सगी बुआ ही तो है किन्तु जब वो वहां गयी तो बुआ के'' कोप का भाजन'' बनना पड़ा। वह वहां बैठी, अपने को अपमानित महसूस कर रही थी और सोच रही थी - वह यहां आई ही क्यों ?ऐसे समय में ,मैं भी तो सभी बातों को भूलकर यहाँ आ गयी, तो क्या इन्हें नहीं भूल जाना चाहिए था ? जिसको भी इस हादसे के विषय में पता चलता,वही मिलने चला आता, कल्याणी जी और उनके पति से मिलकर जा रहे थे। आज नित्या का ये साहस भी नहीं हो रहा था कि वह उठकर बुआ के कामों में हाथ बंटा दे अथवा घर के अंदर जाये।  


जो लोग नित्या को पहले से ही जानते थे ,उसे देखकर कहते - बहुत दिनों में आई हो ,ठीक तो हो।

उन्हें झूठी मुस्कान के साथ नित्या जबाब दे देती,' हाँ' सब ठीक है ,किन्तु कल्याणी जी की अवहेलना के कारण ह्रदय द्रवित हो उठा था। मन ही मन सोच रही थी -मैं ,यहाँ अपना अपमान करवाने के लिए आई हूँ।  अब तक इन्होंने मेरे साथ किया ही क्या है ? इनके लिए इतना काम किया, इनकी बेटी की अच्छी -बुरी बातों में भी उसका समर्थन किया। जब अपने लिए कुछ सोचा और करना चाहा तो इन्हें ख़ुशी नहीं हुई ये तो चाहती ही थीं ,मैं और मेरा पूरा परिवार इनकी जी हुजूरी में ही लगा रहे।

हो सकता है ,कल्याणी जी के व्यवहार के कारण उसके मन में ऐसे विचार आ रहे थे,यदि उसे देखकर वो शांत रहतीं तो शायद ऐसे दुःख भरे वातावरण में ऐसी सोच न आती। मेरा एहसान मानना तो दूर..... मैं इनकी दुश्मन और बन गई हूं , समझाने पर समझती नहीं हैं ,इतना सब होने पर भी इनके दुःख में शामिल होने के लिए आई तो अब भी मेरा अपमान कर रहीं हैं।

तभी घर के मुख्य द्वार पर उसे कुछ जाने- पहचाने से चेहरे नजर आये ,जिन्हें देखकर, नित्या अपना दुःख ,अपमान सभी भूलकर वह उनका स्वागत करने आगे बढ़ी और आगे बढ़कर अपने पिता और माँ के गले लग गयी। तू आ गयी सही किया ,क्या दामाद जी भी आये हैं ?

नहीं ,वो तो अपने काम पर गए हैं ,लौटते समय मुझे लेने आएंगे ,सभी आगे बढ़े ,अपने भाई को देखकर कल्याणी जी आगे बढ़कर उनके गले लगीं और रोने लगी -भइया ! मेरा तो घर बिखर गया।

उन्हें सांत्वना देते हुए वे आगे बढ़े ,सब ठीक हो जायेगा। 

कुछ ठीक नहीं होगा ,न जाने मेरी बेटी को किसकी नजर लग गयी ?उसका आदमी मारा गया गया और वो भी न जाने कहाँ गयी ? कहते हुए दहाड़े मारकर रोने लगीं। नित्या देख रही थी ,बुआ जी अभी तो धीमे -धीमे रो रहीं थीं पापा के आने पर इतनी तेज रोने लगीं फिर सोचा,' अपने भाई को देखकर शायद इनके ''सब्र का बांध'' टूट गया।' 

इतना तो वो समझती है , कल्याणी जी को और इनकी बेटी को, यही बात हज़म नहीं हो रही कि प्रमोद ,रंजन के बॉस थे । ईर्ष्यां में शिल्पा ने अपने पति की नौकरी भी छुड़वा दी, उसे बेरोज़गार बनाकर घर में बैठा दिया। अब मुझे दोष दे रहीं हैं। इनकी बेटी ,इन पर ही गई है। ऐसे एहसान फ़रामोश लोगों से अपनी बेइज्जती करवाने से तो अच्छा है, मैं अपने घर चली जाऊं अभी वह  यही सब सोच रही थी फिर सोचा ,अब यहाँ मेरे माता -पिता हैं ,अब तो कुछ नहीं कहेंगी ,सोचकर स्वयं रसोईघर में गयी और उनके लिए ट्रे में पानी लेकर आ गयी।

 नित्या ने कभी भी अपने माता -पिता से, बुआ के किसी भी व्यवहार के विषय में कुछ नहीं बताया था, उनका आपस में ही शीत युद्ध चल रहा था ,स्वयं वो नहीं चाहती थी कि मेरे कारण या फिर हमारी आपसी गलतफ़हमी के कारण दोनों बहन -भाइयों के आपस के प्रेम में कोई कमी आये।   

तीन -चार घंटे ठहरने के पश्चात ,नित्या के माता -पिता वहां से चले गए और साथ ही नित्या से कहकर गए ,-अपनी बुआ का ख़्याल रखना ,यदि दामाद जी तुम्हें यहां छोड़ दें तो कुछ दिन अपनी बुआ के साथ रहना। जब वे ये बात अपनी बेटी से कह रहे थे ,तब कल्याणी जी भी वहीं खड़ी थीं। नित्या ने एक नजर उनकी तरफ देखा और' हाँ 'में गर्दन हिलाई। 

जो लोग उनके दुःख में शामिल होने के लिए आये थे उनके चले जाने के पश्चात, तभी कल्याणी देवी ,नित्या से बोलीं  - उसका घर को बर्बाद कर ही दिया, अब यहां क्या लेने आई है ,क्या तुम्हारे लिए चाय -नाश्ता लगवाऊँ ? उन्होंने व्यंग्य कसा। 

नहीं, मुझे चाय- नाश्ते की कोई आवश्यकता नहीं है , मैं तो उनकी प्रतीक्षा कर रही हूँ  और आपका हाल पूछने आई थी। 

वो तो पूछ लिया ,देख तो रही है ,हम कितने खुश हैं ? 

मन ही मन सोचा ,जैसा किसी के लिए सोचती हैं ,वैसा ही हो रहा है ,ऐसे वातावरण में भी ये नहीं कि अपने मन की कलुषता को भुला दें ,इनका स्वभाव तो ऐसा ही है ,मेरा तो नहीं,मुझे प्रमोद के आने का इंतजार करना ही होगा ,तब बोली - जब वे आएंगे..... तभी बाहर किसी की मोटरसाइकिल आकर रुकी,प्रसन्न होते हुए नित्या बाहर की तरफ चल दी , प्रमोद ने घर के अंदर प्रवेश किया और नित्या को देख चलने का इशारा किया। तब नित्या ने इशारे से कहा - बुआ जी से तो मिल लो ! 

प्रमोद , कल्याणी और उनके पति के करीब आकर बैठ गया ,प्रमोद को देखकर कल्याणी को अपने दामाद की याद हो आई और वो रोने लगी। तब प्रमोद ने पूछा -कुछ पता चला ,क्या हुआ था ,ये सब किसने किया ? 

कुछ भी पता नहीं चल पा रहा है ,पुलिस अपनी तहक़ीक़ात कर रही है ,उदास स्वर में कल्याणी जी के पति ने जबाब दिया। 

चाय लेंगे ,नित्या जानती थी कि प्रमोद सीधे अपने दफ़्तर से यहीं आ रहे हैं ,सुबह की थकान होगी यही सोचकर चाय के लिए पूछा। प्रमोद के इंकार करने पर भी नित्या ने नौकर से न कह, स्वयं चाय बनाने के लिए रसोईघर में गयी।

 तभी उसके पीछे कल्याणी जी आईं और बोलीं -उसका हाल पूछने आई थी, या यह जानने आई थी, अब वह कहां है ?ताकि तू पुलिस को बता सके, तुझसे एक जगह बैठा नहीं जाता। 

मैं भला, पुलिस को,क्या और क्यों बताऊंगी ? क्या आप जानती हैं ? शिल्पा कहाँ है ? 

मुझे क्या मालूम, शिल्पा कहाँ है ?यहाँ होती तो तुम्हारे सामने ही होती ,चाय पीकर दोनों आदमी अब यहाँ से जाओ !उसकी जिंदगी तो अब बर्बाद ही हो गई ,उनकी बातों से लग रहा था ,बेटी को लेकर अब वे पूरी तरह निराश हो चुकी हैं ,बाहर आकर कल्याणी जी रोने लगीं और बोलीं - पुलिस को शिल्पा पर शक है, कि उसी ने अपने पति की हत्या की है। 

क्या ??आश्चर्य से प्रमोद ने पूछा ,चाय लेकर आते हुए नित्या भी उछल गई, क्या उन दोनों बीच कोई  अनबन थी ?प्रमोद ने पूछा। 

तभी आगे आकर नित्या बोली -इन्हें क्या मालूम होगा ?वे दोनों तो बहुत दिनों से इस घर से दूर रह रहे थे ,आपने भी तो समाचार- पत्र में पढ़ा था।

 हम्म्म्म कहते हुए प्रमोद ने चाय के घूंट भरे और नित्या  से बोला -चलो !देरी हो रही है ,औपचारिकतावश नित्या ने बुआ से कहा -अच्छा बुआजी !चलती हूँ ,जब भी कभी आवश्यकता हो मुझे फोन कर लीजियेगा ,कहते हुए बाहर आकर प्रमोद के पीछे बैठ गयी मन ही मन सोच रही थी ,वो तो अच्छा हुआ ,मैंने बात बीच में ही काट दी ,बुआजी, न जाने क्या कह देतीं ?उन्हें तो वैसे ही हमारे रिश्ते से जलन हो रही है ,सोचते हुए उसने प्रमोद का स्पर्श किया और उसकी पीठ से अपने चेहरे को सटा लिया ,चलती हवा ,उसके चेहरे पर  उड़ती ज़ुल्फ़ें उसके प्यार की गवाही दे रहे थे। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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