Mysterious nights [part 144]

पारो और रूही दोनों खेड़ा गांव में तो पहुंच गई, किंतु वहां जाकर उन्हें पता चला , कि जब सरपंच जी अपनी बेटी से मिलने के लिए गए थे, तब उसकी ससुराल वालों ने, उन्हें बताया -'कि वह तो किसी लड़के के साथ भाग गई है, इस बात से वो दोनों पति -पत्नी अत्यधिक परेशान थे और साथ ही अपनी बेटी से नाराज़ भी थे। 

तब पारो उनसे कहती है -यह बात उन्होंने कही है, आपकी बेटी ने तो नहीं कही , हो सकता है, उसकी ससुराल वाले ही, झूठ बोल रहे हों, बात कुछ और ही हो,आपको अपनी बेटी पर विश्वास रखना चाहिए और पहले आपकी बेटी मिल जाये ,उससे बात करके निर्णय लीजिये। 


 

तब शिखा की माँ सरला जी ,जो अपने नाम की तरह ही सरल स्वभाव की भी हैं ,उन्हें पारो की बात जंचती है ,तब वे कहती हैं -' अब उसके ससुराल वालों ने उस बेचारी पर यह तोहमत लगाई है, एक बार हमारी बेटी भी हमें मिल जाती तो पता चल जाता कि उसके साथ क्या हुआ है ? जब से वह यहां से गई है, हम तो उसका चेहरा देखने के लिए ही तरस गए। आज तुम्हें देखकर उसकी याद आ गई, तुम तो शहरी लड़की हो, किंतु उसका डील -डोल ऐसा ही था ,वे रूही को देखकर कहती हैं। 

 शिखा भी, जैसे अपने चेहरे को भूल गई थी , उसने सरला जी से कहा -आप हमें, अपनी बेटी की कोई तस्वीर दिखलाइए ! ताकि हम, उसे ढूंढ सके या कभी हमें मिल जाए तो आपको बता दें  !

इतनी बड़ी दुनिया है, मेरी बच्ची न जाने कहां खो गई ? अब तो हमने, उससे मिलने की जैसे उम्मीद ही छोड़ दी है। उसके बाबूजी, तो जैसे टूट ही गए हैं। हमारी एक ही औलाद तो थी, उसको भी देखने के लिए तरस गए, जब भी यह हवेली पर गए, हवेली वालों ने अंदर ही आने नहीं दिया, न ही हमारी बेटी से हमें मिलने दिया, और न ही उसे यहां भेजा , उससे मिले हुए हमें ,बरसों हो गए निराशा से गहरी स्वांस लेते हुए कहती हैं।  अब तो किसी काम में दिल ही नहीं लगता, बस जी रहे हैं। कहते हुए ,उन्होंने अंदर से एक तस्वीर लाकर उन्हें दिखाई। 

 रूही ने महसूस किया उसके माता-पिता, उससे मिलने के लिए तरस रहे थे, और हवेली वालो ने उन्हें मिलने ही नहीं दिया मिलवाते भी कैसे ? उस पर तो अत्याचार कर रहे थे, और फिर उसे मार भी दिया। और यहां इस गांव में न जाने, मुझे लेकर कितनी बातें हो रही हैं ? 

तब सरला जी काज़ल से बोलीं -ये गांव देखने के लिए, शहर से आई है,काज़ल बेटा !जा इन्हें गांव दिखा ला ! 

 तब काज़ल बोली -आओ !दीदी आपको गांव दिखाकर लाती हूँ । 

रूही और पारो ने एक -दूसरे की तरफ देखा ,तब रूही ने पारो से पूछा -क्या तुम घूमना चाहोगी ?मुझे नहीं जाना ,मैं यहीं इनके साथ बैठकर, बातें करूंगी फिर हमें वापस जाना भी तो है। वो शायद, अकेले में अपनी माँ से बात करना चाहती थी। तब वो काज़ल से बोली - इन दीदी को पीपल के पेड़ और पंडित के यहां तक घुमा लाओ ! इतने मैं यहां आराम करती हूँ हमें वापस भी तो जाना है, यह कहकर वो वहीं चारपाई पर लेट गयी। 

काजल, पारो को अपने साथ लेकर, गांव में टहलने के लिए चली गई। पारो ने ही जाने से पहले, रूही को इशारा किया था कि कोई भी बात मत बताना। पारो और काजल के चले जाने के पश्चात, रूही सोचने लगी -मेरे पिता कितने बूढ़े लग रहे हैं ?उन्हें उमर ने नहीं, उन्हें उनकी बेटी की बातों ने बूढ़ा किया होगा ,कोइ भी बाप यदि अपनी बेटी के लिए ऐसे अपमान भरे शब्द सुनेगा तो उस पर क्या बीतेगी ? उसका जी चाहा ,वो अपने घरवालों को बताये ,वही उनकी शिखा है ,उन हैवानों तो उसे मार ही दिया था किन्तु न जाने कैसे बच गयी ?

 किंतु यदि इन्होंने मुझ पर विश्वास नहीं किया, यदि इन लोगों ने मुझसे पूछा -कि मेरे चेहरे को क्या हुआ , क्यों बदला हुआ है ? तब मुझे इन्हें सारी बातें बतानी पड़ेगी और हो सकता है ,अपनी बेटी का दर्द जानकर, मेरे पिता हवेली वालों  से लड़ने के लिए पहुंच जाए। इससे उन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, किंतु मेरे पिता की बेइज्जती अवश्य हो जाएगी और उन्हें भी पता चल जायेगा,कि '' मैं जिन्दा हूँ।'   जब रूही चारपाई पर लेटी हुई, यही सब सोच रही थी। 

 तब न जाने क्यों सरला जी को अचानक विचार आया,ये लड़की तो पहली बार इस गांव में आई है ?तब  यह कैसे जानती है ?कि गांव में एक पीपल का पेड़ भी है और पंडित जी का घर भी है, यही बात सोचते हुए वो रूही के पास आई , और उससे पूछा -तुम कैसे जानती हो ?हमारे  गांव में एक पीपल का पेड़ भी है और एक पंडित जी का घर भी है। सच-सच बताओ ! तुम कौन हो ? क्या तुम गांव ही घूमने आई थीं  ?संदेह से उन्होंने रूही से पूछा। 

हां, हम गांव ही घूमने आए थे किंतु मैं एक दो बार गांवों में जा चुकी हूं ,रह चुकी हूं इसलिए मुझे कोई घूमने की इच्छा नहीं थी , भोजन करने के पश्चात मुझे आलस्य आता है इसलिए मैं यहां रुक गई और एक पीपल का पेड़, पंडित जी का घर तो गांवों में होता ही है यह कोई नई बात नहीं है, रूही लापरवाही से बोली। 

मुझे लगता है- तुम, मुझसे कुछ छुपा रही हो जब से तुम आई हो, हमारे घर में दिलचस्पी दिखा रही हो, मेरी बेटी के विषय में पूछ रही हो, क्या तुम मेरी बेटी को जानती हो ? यदि थोड़ा सा भी उसके विषय में कुछ जानती हो तो मुझे बता दो ! कहते हुए वे रोने लगीं।

लगभग 1 घंटे टहलने के पश्चात , पारो, काजल के साथ घर वापस आ गई और बोली -अब हमें घर चलना चाहिए, उसने इशारे से रूही से पूछा - उसने,उन्हें  कुछ बताया तो नहीं। जब वे लोग चलने के लिए तैयार हो रही थी तभी सरपंच जी दोबारा देखने के लिए आए कि वो लड़कियां अभी यहां है या नहीं ताकि उन्हें समय से इस गांव से निकलने के लिए कह दें।

 चलते समय रूही एकदम भावुक हो गई और अपनी मां के गले लगी, उसकी आंखों में आंसू आ गए गला भर आया  और तब उसने अपनी मां के कान में कहा -यदि आपकी बेटी मुझे मिली तो मैं उसे, आपसे अवश्य मिलवाउंगी। 

तब,आगे बढ़कर अपने पिता के पैर छूते हुए कहती है- सरपंच जी नमस्ते ! किंतु उन्होंने रूही को पहले ही रोक दिया और बोले -''हमारे यहां बेटियां पांव नहीं छूती हैं , तुम भी हमारी बेटी की तरह ही हो।'' गांव में तुम्हारा मन तो लग गया ,दोनों ने हाँ में गर्दन हिलाई ,तब वो बोले - अब गांवों में रखा ही क्या है ?जो गांव के लोग हैं ,वे ही बाहर भागने का प्रयास करते हैं ,चलो !अच्छा हुआ ,तुम लोग आ गयीं ,इस बहाने हमें भी लगा जैसे हमें हमारी बेटी मिलकर जा रही हो। 

  हमें अपने गांवों  पर गर्व है,भले ही शहरों वाली सुविधाएँ नहीं हैं किन्तु शहरों वाली भागमभाग भी तो नहीं है ,एक सुकून है, शहरों वाली  छल- कपट भी तो नहीं है।  रूही और पारो दोनों गाड़ी में बैठे और अपने शहर की ओर चल दीं , रूही की आंखों में आंसू थे। उसने बार-बार पीछे मुड़कर अपने माता-पिता को दे खा।

 उन्होंने भी कहा-'' बिटिया !फिर आना '' 

हम फिर आएंगे, यह कहकर पारो ने उन्हें आश्वासन दिया।                                     

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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