Mysterious nights [part 136]

आज पारो को भी ,रूही की पिछली ज़िंदगी के विषय में पता चल गया वो उसके दुःख से दुखी तो थी किन्तु दूसरे ही पल वो कुछ और ही सोच रही थी। तब वो अपनी मौसी से जानना चाहती है , हमारी रूही ,जब शिखा थी और गर्वित उसी हवेली का बेटा था ,तब वो इसे पहचान क्यों नहीं पाया ?

 हां, यह बात मैंने  शायद तुम्हें नहीं बताई , वह, उसे इसलिए नहीं पहचान पाया क्योंकि जब रूही तेरे मौसाजी को मिली थी, इसकी हालत बहुत खराब थी और इसका चेहरा आधे से ज्यादा जल चुका था, तब तुम्हारे मौसा जी ने ही, इसके होश में आने पर इसके चेहरे पर प्लास्टिक सर्जरी करवाई थी।पहले शिखा का क्या रूप था ,वो तो हमने भी नहीं देखा। जैसी शिखा पहले थी, ये उससे काफी अलग है , वह इसीलिए इसे नहीं पहचान पाया वरना पहले वाली शिखा  होती, तो शायद वे लोग, फिर से इसकी जान के पीछे पड़ जाते, इसीलिए यह बच भी गई। 


मौसा जी ! क्या आपको वह लड़का पसंद है, अचानक ही पारो ने डॉ अनंत से पूछा। 

समाचार- पत्र से नजरें हटाते हुए डॉक्टर अनंत ने पार्वती की तरफ देखा, हालाँकि कि वे भी इन दोनों की बातें सुन रहे थे किन्तु इतना ध्यान भी नहीं था ,जैसे ही पारो ने उन्हें पुकारा तो हड़बड़ा गए ,वह नहीं जान पाए थे, कि तारा  ने पार्वती को रूही की संपूर्ण सच्चाई बता दी है, तब उन्होंने पूछा -कौन लड़का ?

वही जो, मेरी बहन रूही को पसंद करता है - गर्वित !

डॉक्टर अनंत ने तारा जी की तरफ देखा, वह जैसे पूछना चाह रहे थे, कि क्या तुमने पार्वती को संपूर्ण सच्चाई बता दी ? उनके इशारों को ताराजी ने समझा और उन्होंने भी आँखों से इशारों में उन्हें बता दिया कि यह रूही की संपूर्ण सच्चाई जान गई है। तब नाराज होते हुए बोले -नाम मत लो! उस लड़के का..... मुझे तो ऐसी उम्मीद भी नहीं थी कि इस दुनिया में ऐसे लोग भी होंगे। जो इंसान को इंसान नहीं समझते, एक बेचारी भोली- भाली लड़की के साथ कितना अत्याचार किया ? मेरा काम लोगों को बचाने का है क्योंकि मैं एक डॉक्टर हूं लेकिन, यदि मेरा बस चलता तो मैं उनके संपूर्ण खानदान को गोली मार देता। 

तो मारिए न....  किसने रोका है ? अचानक से पार्वती बोली। 

ये तुम क्या कह रही हो ?मेरा मतलब है ,कहते हुए उन्होंने समाचार -पत्र बराबरवाली  मेज पर रख दिया।   तुम, कहना क्या चाहती हो ? हमारे पास उनके विरुद्ध कोई सबूत भी नहीं है जो पुलिस से हम उन्हें पकड़वा दें, जी में तो आ रहा है कि उस पूरे खानदान को जेल में डलवा दें  लेकिन क्या किया जा सकता है ? वर्षों पुरानी बात हो गई, और हमारे पास कोई सबूत भी नहीं है। 

आपके पास तो यह सबूत भी नहीं है, कि यह 'रूही' नहीं' शिल्पा' है। 

दोनों पति-पत्नी ने एक साथ पार्वती की तरफ देखा, और पूछा -तुम कहना क्या चाहती हो ?

आपने बताया था कि इसकी हालत बहुत खराब थी, एक तरीके से मर ही चुकी थी, आप लोगों ने इसे बचाया ,या फिर यह भी कह सकते हैं ,ये मौत के मुँह से बाहर आई है ,अब आप लोग ही इसके माता -पिता हो।  आप लोग इसके बचने का कारण बने क्योंकि ईश्वर कुछ और ही चाहता था। तभी सीढ़ियों से नीचे आते हुए, रूही को तीनों ने देखा, दोनों पति-पत्नी, शांत होकर ,अपनी जगह पर बैठ गए किंतु पार्वती बोली -इस पर इतना अत्याचार हुआ , अब इसके कातिलों को सजा तो मिलनी ही चाहिए।  उनको, उनके किए का परिणाम तो भुगतना ही होगा। कहते हुए  रूही का हाथ पकड़ कर ले आई और उसे, सोफे पर बैठाते  हुए उससे पूछा -क्या तुम अपने कातिलों से, अपने मुजरिमों से बदला लेना नहीं चाहोगी। 

यह सब तो, रूही ने सोचा ही नहीं था, वह तो अपनी पुरानी यादों को सोचकर, इस दर्द को जी रही थी, सोच -सोच कर रो रही थी कि इनका अत्याचार कितना असहनीय था? ऐसे लोग, इस दुनिया में रहते हैं ? तभी वह अचानक से बोली -तुम उन्हें नहीं जानती हो, ये लोग बहुत ही खतरनाक हैं, उनके सामने तो गांव के लोग भी चुप रहते हैं। वे जुर्म करते हैं, और किसी को पता भी नहीं चलता और जिसको पता चल जाता है ,वो बोल नहीं सकता। 

तो क्या, सारे अत्याचारों का ठेका उन्होंने ही ले रखा है ? अब उन्हें उनके कर्मों का दंड भी तो भुगतना होगा।

 कहने और करने में बहुत अंतर होता है , मैं भला, क्या कर पाऊंगी ? कम से कम उस हवेली में नौ -दस लोग हैं और नौकर अलग ,वो एक दहशत भरी बंद हवेली है ,तुम एक बार वहां चले गए तो निकलना जैसे नामुमकिन है और जब उन्हें पता चले कि कोई उनका विद्रोही है ,तो ये लोग,उन महात्मा  उसे आसानी से नहीं छोड़ते। ये तो हवेली का ही किस्सा है। उनका वो होटल ,उसकी रातें इतनी रहस्यमयी हैं ,जो गया है ,वापस नहीं आया और जो आया वो कुछ बोल न सका। पैसेवाले लोग हैं ,वो ! पैसे की भी कोई कमी नहीं है, उनके नौकर- चाकर भी इतने हट्टे -कट्टे हैं ,आप वहां कुछ नहीं कर सकते ,मैं तो अकेली और एक औरत !उन्होंने तो मेरे परिवार को भी भनक नहीं लगने दी कि मैं कहाँ हूँ और मेरे साथ क्या हो रहा है? कहते हुए रूही रोने लगी। 

 जब तुम इतना सब जानती थी, तो उस हवेली में दुबारा क्यों गई ? पार्वती ने पूछा। 

हवेली में जाकर ही तो मेरी स्मृति वापस आई और जीवन के जिस हिस्से से मैं अनजान थी ,वो स्मरण हुआ  कि मेरे साथ क्या हुआ था। तभी उसे उन महात्मा की बातें स्मरण हो आईं और बोली -उन महात्मा ! उन्होंने सच ही कहा था कि जैसे ही ये हवेली की दहलीज़ पर क़दम रखेगी ,इसे सब स्मरण हो जायेगा। 

अब ये कौन से महात्मा आ गए ? उसने पूछा। 

एक गांव में हमें एक महात्मा मिले थे ,उन्होंने ही कहा था और साथ ही उन्होंने ये भी तो कहा था -इसका एक तरह से दूसरा जन्म हुआ है ,उसका भी ईश्वर ने कुछ सोचा ही होगा ,मरकर जिन्दा हुई है। 

यही बात तो मैं भी, आप लोगों से कहना चाहती हूँ ,यदि रूही की ये हालत हो गयी थी और आज ये जिन्दा है ,अपने बदले हुए रूप में है ,तो इसके जीवन का उद्देश्य इसको समझ जाना चाहिए। 

 उस हवेली को देखकर ही मेरी मिटी हुईं यादें वापस आ गईं , मम्मी ने ठीक ही कहा था- इन यादों को ढूंढने से दुख ही प्राप्त होगा, किंतु मेरी भी जिद थी, मैं जानना चाहती थी मैं किसकी बेटी हूं मेरे साथ आखिर क्या हुआ था ? कहते हुए वह रूही रोने लगी। 

शिखा तो मर चुकी है, फिर तुम क्यों रो रही हो ? तुम तो रूही हो, डॉक्टर साहब की बेटी ! उसके आंसू पोंछते हुए पारो ने कहा - मैं मानती हूं, हमें सच्चाई से नहीं भागना चाहिए, किंतु आज तुम्हारी सच्चाई यह है कि तुम डॉक्टर साहब की बेटी हो और तुम्हारा नाम 'रुही' है फिर तुम उस दर्द और परेशानी को क्यों जी रही हो ?जो शिखा ने झेला, तुम्हें अब जीवन में आगे बढ़ जाना चाहिए। 

प्रिय पाठकों ! रूही की ज़िंदगी में कितने भूचाल आये, जिनको स्मरण कर रूही आज भी काँप रही है। ऐसे में पारो उससे क्या कहने लगी ?क्या आपको भी लगता है पारो यानि पार्वती सही है ,अपने विचार समीक्षा के माध्यम से दीजिये ! और मुझे फॉलो और सब्स्क्राइब भी करिये ताकि आपको ऐसी अद्भुत जीवन से जुडी रचनाएँ पढ़ने को मिलती रहें ,धन्यवाद !

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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