मधुलिका सोच रही थी ,मैं कुमार से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा रखने लगी हूँ ,मुझे इनकी परेशानी को भी तो समझना चाहिए ,यही सोचकर उसे, कुमार पर प्यार आया,इनकी परेशानी को मैं नहीं समझूंगी तो और कौन समझेगा ? तब वो अपनी वाणी में मधुरता घोलते हुए बोली - अब तो पापा जी को नर्स देख रही है, आप तो जैसे पहले कार्य कर रहे थे वैसे ही करते रहिए ! कहकर वह कुमार के करीब आई , कुमार ने मधुलिका को ध्यान से देखा, पता नहीं क्यों ? उसका पास आना, कुमार को अच्छा नहीं लगा और किसी बहाने से उठकर वहां से चला गया।
नारी मन उसके इस व्यवहार से आहत हुआ ,वो व्यवहार को समझती है, यह बात वो तुरंत ही ताड़ गई,मेरा संदेह गलत नहीं था ,कुमार को अब मुझमें दिलचस्पी नहीं रही है। अवश्य ही कोई बात तो है। उसने कुमार से कुछ नहीं कहा, उसे अपने आने वाले जीवन से भय सा लगने लगा, कुमार के बदले व्यवहार को तो है पहले भी समझ रही थी। किंतु आज जो व्यवहार कुमार ने उसके साथ किया था उसकी आंखों को नम कर गया, एक तरह से देखा जाए तो कुमार ने उसके प्यार का तिरस्कार किया था। नम आंखों को लेकर चुपचाप बिस्तर पर लेट गई और उसने ऐसा दिखलाया जैसे वह सो गई है।
जब कुमार कमरे में आया तो वह चुपचाप लेटी रही, वह सोच रही थी,' एक बार तो कुमार उसे पुकारेगा ,उसे उठाने का प्रयास करेगा, किंतु कुमार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया।' कमरे की लाइट बंद की और सो गया।
अब मधुलिका के आंसू बांध तोड़ बह निकले। उसे आज वो दिन याद आ रहे थे ,जब कुमार उसके बिना एक पल भी जीने का सोच भी नहीं सकता था। कुमार जब भी सोता ,उसको अपनी बाँहों में भरकर सोता ,कई बार वो ,उसकी बाँहों से निकलने का प्रयास करती किन्तु वो तुरंत ही खींचकर अपने करीब ले आता ,तब कहता -''मुझसे बचकर जाना मुश्किल ही नहीं ,नामुमकिन है।''
मधु भी ,शरमा कर उसके सीने में अपना चेहरा छुपा, किसी बच्चे की तरह उससे लिपट जाती और आज वो स्वयं दिनभर की थकान के पश्चात, उसकी प्यार भरी बाँहों में, अपने दिनभर की थकन उतार ,उसकी परेशानियों को बाँट लेना चाहती है ,तब वो, उससे दूर जा रहा है। उसके मन में प्रश्न उठा -'क्या वो पापा की बीमारी से परेशान है या फिर कुछ और ही बात है ?
जो स्त्री, सारा दिन अपने पति के लिए, सोचती है ,उसके कार्य करती है, सुख- दुख में उसका साथ निभाने का प्रयास करती है। अपने पति की हर ख्वाहिश का ख्याल रखती है। बरसों से उसके साथ रह रही है, तो क्या अपने पति के उस बदले व्यवहार को पहचान नहीं पाएगी। मन तो कह रहा था -'अवश्य ही जयपुर में कुछ हुआ है, एक अनदेखा सा डर उसे सता रहा था।
कुमार तो दो दिन के लिए गए थे, और ये चार दिन में आए, इस बीच अवश्य ही कुछ तो हुआ होगा। पापा की बीमारी का तो सिर्फ बहाना ही है। उनकी बीमारी क्या हमें एक दूसरे से बात करने से, एक दूसरे से सुख-दुख बांटने से मना करती है। यह तो जीवन के हिस्से हैं, सुख-दुख तो आएंगे ही.... किंतु क्या हर बार इसी तरह कुमार का व्यवहार बदला है। जब उसकी मम्मी गई थी, तब भी उसमें इतना बदलाव नहीं आया था सोचते- सोचते मधुलिका न जाने कब सो गई ?
जयपुर से आए हुए, कुमार को लगभग 1 महीना बीत चुका था,एक दिन अचानक ही एक फोन आया , कुमार अपने काम में व्यस्त था, उसने फोन उठाया , और जैसे ही उसने'' हेलो'' किया।
उधर से बड़ी सुरीली सी आवाज आई- हैलो ! क्या कर रहे हैं आप ? कहीं मैंने आपको डिस्टर्ब तो नहीं कर दिया।
उस आवाज को सुनकर कुमार में, जैसे चेतना लौट आई,अपना काम छोड़कर सीधा बैठ गया और बोला -तुम ! तुम 'यामिनी !
कोई शक़..... कहते हुए उसकी खनकती सी हंसी कुमार के कानों में गूँजी ,क्या और किसी के फोन की भी उम्मीद लगाए हुए थे, यामिनी की हंसी उसके हृदय के सभी तारों को झिंझौड़ गई।
यार ! तुम कैसी बातें करती हो ? किसी से और क्या उम्मीद करुंगा ? तुम मुझे इतना बड़ा धोखा देकर चली गई, एक बार मुझसे मिलना भी उचित नहीं समझा,नाराज होते हुए कुमार ने कहा - मैं तुम्हें ढूंढ रहा था, परेशान हो गया था , तुम्हारा नंबर भी नहीं लग रहा था , कितनी बार तुम्हें फोन किया ?
ओह !! सॉरी !सॉरी !कान पकड़ती हूँ ,बाबा ! दरअसल बात यह है, मैंने वह नंबर बदल दिया है , मेरा फोन ही कहीं खो गया था। तुम्हारा नंबर भी मुझे याद नहीं रहा था, बहुत मुश्किल से तुम्हारा नंबर ढूंढा, तब जाकर यह नंबर लगा।
कुमार ने जैसे यामिनी की परेशानी को समझा और बोला -एक बार मुझसे मिलकर चली जाती, मुझे भी पता चल जाता तुम कहां जा रही हो? तो मुझे सुकून तो मिल जाता,तुमने मेरा वो अधिकार भी छीन लिया।
तुम्हें , मैंने अभी कोई अधिकार दिया ही कहाँ है ?'' देर आए, दुरुस्त आए '', अब तुम्हारा नंबर तो मिल ही गया है न..... अब तो हमारी बातें होती ही रहेगी। जब मेरा फोन खो गया था, तो मैं वापस होटल में आई थी , मैंने पूछा भी था -'कि वो कहां गए ?' किंतु काउंटर पर बैठी लड़की ने बताया -''वो तो बड़ी तेजी से बाहर की तरफ गए हैं।''
ओह !हाँ मुझे, मेरे घर से फोन आया था -''पापा की तबीयत खराब है, उनको'' ब्रेन ट्यूमर'' हो गया है , इसलिए मुझे वापस आना पड़ा वरना मैं, तुम्हें ढूंढ कर ही, वापस आता।
तुम तो, हमें नहीं ढूंढ पाए और हमने, तुम्हें ढूंढ लिया,'' दिल से दिल को राहत होती है'' ,ज़नाब ! कहकर वह फिर से खिलखिला कर हंस दी और गंभीर होकर पूछा -अब पापा कैसे हैं ?
ठीक हैं , उनकी दवाइयां चल रही हैं लेकिन लगता है, उनके पास ज्यादा समय नहीं है।
तब तो हम लोग शायद नहीं मिल पाएंगे, क्योंकि आपके पापा को भी तो परेशानी होगी , आप उनकी सेवा में जो लगे होंगे।
नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, पापा की सेवा तो नर्स करती है न....
फिर इधर कब आ रहे हैं ?सुकून से जीने का अधिकार चाहते हैं ,तो आ जाइये ! यामिनी ने रसभरे शब्दों में कहा ।
तुम कहां हो ?तुम जहाँ भी होंगी ,मैं वहीं पहुंच जाऊंगा ,एक बार बताकर तो देखो !
मैं आजकल दिल्ली में आई हुई हूं, यहीं पर मेरी ''कला प्रदर्शनी'' लगी हुई है।
क्या.... ?आश्चर्य से कुमार बोला ,तुम मेरे इतने करीब हो और मुझे मालूम ही नहीं। कहां ठहरी हो ? मैं अभी मिलने आ जाता हूं उत्साहित होते हुए कुमार कहता है।
तुम कैसे आ पाओगे ? तुम्हारे तो पापा की तबीयत ठीक नहीं है , अपनी आवाज में मिश्री घोलते हुए, यामिनी ने जानबूझकर कहा।
तुमसे कहा न..... पापा ठीक हैं , तुमसे मिलने की बहुत इच्छा हो रही है ,लगभग गिड़गिड़ाते हुए कुमार बोला - तुमसे बात भी नहीं कर पा रहा था , बहुत परेशान था किंतु तुमने आज फोन करके,'' तपते रेगिस्तान में जैसे बरसात कर दी हो।''
दूसरी तरफ से खिलखिलाने की आवाज आई, तब वह बोली -अपनी बीवी से क्या कहोगे ?
कह दूंगा,' क्लाइंट से मिलने जा रहा हूं,'जल्दबाज़ी में बोला - तुम उसकी फिक्र ना करो ! मैं उसे संभाल लूंगा, वो कुछ नहीं कहेगी।
