घर पहुंच कर कुमार ने देखा, सभी बड़े परेशान थे, उसने सामने खड़ी मधुलिका को देखा ,जो परेशान दिख रही थी और उसके जाते ही रोने लगी ,उसने जाते ही उससे पूछा- अचानक पापा को क्या हुआ ? पापा तो ठीक थे।
होना क्या था ? बुजुर्ग है, भोजन कर रहे थे, उसके बाद जैसे ही उठकर जाने लगे, अचानक ही उन्हें चक्कर आ गया और वहीँ गिर पड़े ,ऐसे समय में यहां कोई नहीं था ,तब गाड़ी से मैं ही पापा को लेकर, अस्पताल गयी और उन्हें भर्ती कराकर तुम्हें फोन किया ,कुछ देर के लिए घर आई हूँ क्योकि पड़ोसन से मैंने कुछ नहीं बताया और न ही उससे कहा था -' कि कबीर को स्कूल से घर ले आये।'
अब पापा कैसे हैं ?कहते हुए उसने अपना सामान कमरे में रखा।
अभी अस्पताल में ही हैं ,डॉक्टर जांच कर रहे हैं।
क्या डॉक्टर ने उनकी बिमारी विषय में कुछ नहीं बताया ,उन्हें चक्कर क्यों आया था ?
अभी तो कुछ नहीं बताया है, तब मैंने आपको फोन किया, आप तो दो दिन में आने वाले थे, फिर इतना समय क्यों लगा दिया ?
काम था, मैं क्या बेवज़ह वहां घूमने,मस्ती करने गया था ,वहीं पर और काम निकल आया झल्लाते हुए कुमार ने मधुलिका से कहा।
इस तरह झल्ला क्यों रहे हैं ? मैं तो ऐसे ही पूछ रही थी ,यदि आपको और समय लगता तो आप हमें फोन करके बता भी तो सकते थे, हमें भी तो चिंता हो जाती है, पता नहीं क्या हुआ होगा , कहां पर हैं, ठीक से तो है या नहीं, मधुलिका तो पहले ही, अपने ससुर की बीमारी के कारण घबराई हुई थी कुमार को झल्लाते हुए देखकर उसका मन रोने का किया। कैसा इंसान है ? खैर खबर पूछने पर भी ,इन्हें बताने में परेशानी हो रही है। समय ही कुछ ऐसा है, उसने ज्यादा कुछ नहीं कहा ,सोचा -''अपने पिता की बिमारी का सुनकर ये भी तो परेशान हो गए होंगे,इनका अपना कारोबार है ,चार लोगों से मिलना पड़ता है ,तब ऐसे में मेरा फोन चला गया ये भी तो घबरा गए होंगे यही सब सोचकर शांत हो गयी'' और कुमार को अस्पताल का नाम और कमरा नंबर बता दिया।
कुमार जब अस्पताल पहुंचा,तब उसके पिता के सिर का ''सिटी स्कैन''कराने के लिए उन्हें ले जाया गया था। कुमार वहीं अस्पताल में बैठा हुआ था, मन ही मन सोच रहा था - मधुलिका की भी क्या गलती है ? अकेली औरत है, घर का काम है, डॉक्टर के यहां अस्पताल में भी आना था, अकेली घबरा गई होगी , कुछ देर पश्चात डॉक्टर की रिपोर्ट आ गई थी, डॉक्टर ने उसे अपने कैबिन में बुलाया और बताया -आपके पिता को'' ''ब्रेन ट्यूमर'' है।
क्या !! कुमार को जैसे शॉक लगा। डॉक्टर साहब ! पापा, तो बिल्कुल ठीक थे ,अचानक ये.... पापा ठीक तो हो जाएंगे।
हम उनका इलाज कर रहे हैं , वैसे उनके ट्यूमर को काफी समय हो चुका है। उनके पास कम से कम 1 वर्ष का समय है, बाकी भगवान की इच्छा है।
डॉक्टर साहब !मेरे पापा को ठीक कर दीजिए ! उन्हें अच्छी से अच्छी दवाई, और जो आप कहेंगे वह हम सब करने को तैयार हैं। क्या' ट्यूमर' का कोई ऑपरेशन नहीं होता है।
होता है, किंतु इसमें रिस्क है वह ठीक भी हो सकते हैं, और उनकी जान को खतरा भी हो सकता है। हमारी सलाह मानिये तो हम उन्हें दवाई देते रहेंगे। जितने दिन भी दवाइयां असर करती हैं, वही ठीक रहेगा और उनकी सेवा कीजिए।
डॉक्टर की बातचीत से, कुमार समझ गया था, पापा के पास ज्यादा समय नहीं है, मन ही मन वह बहुत दुखी हुआ ,मम्मी को गए हुए , महज 5 वर्ष ही हुए हैं, अब पापा भी चले जाएंगे , मैं तो अनाथ ही हो जाऊंगा। व्यापार के सिलसिले में बाहर चला जाता हूं, बच्चों के पास तो, पापा ही रहते हैं ,यह साया भी हमारे सिर से उठ जाएगा, सोच कर ही रोने लगा उसे यह भी याद नहीं रहा वो इस समय डॉक्टर के सामने बैठा हुआ है।
डॉक्टर ने सोचा - अपने पिता की बीमारी के कारण सोच कर रो रहा है, तब वह बोले -हमारा प्रयास यही रहेगा कि आपके पापा जल्दी से जल्दी ठीक हो जाए ,हम भी प्रयास ही कर सकते हैं , जब तक आपके पापा के पास जितना भी समय है आप उनकी खूब सेवा करिए ,उन्हें खुश रखिए !
कुछ दिनों तक कुमार के पापा अस्पताल में रहे फिर डॉक्टर ने उन्हें घर भेज दिया, कुमार और मधुलिका को भी अस्पताल में आने- जाने में बार-बार परेशानी हो रही थी हालांकि वह अपनी जिम्मेदारी को, बखूबी निभाना चाहते थे किंतु उधर घर में मधुलिका घर संभालती और बच्चों को संभालती जब थोड़ा, खाली समय होता तो अस्पताल आ जाती। कुमार भी, अपने व्यापार को संभाल रहा था, और कभी-कभी पापा के पास आकर बैठ जाता था, उनसे बातें करता था।
कुमार के पिता के घर पर आ जाने से मधुलिका का काम ज्यादा बढ़ गया था , कुमार अब थोड़ा बेफिक्र हो गया था,उसके पिता को देखने कई बार, कभी पड़ोसी या फिर रिश्तेदार आ ही जाते। मधुलिका ने उससे कई बार कहा - घर के काम में थोड़ी सहायता तो करवा ही सकते हो ,काम में नहीं तो बच्चे की पढ़ाई पर तो ध्यान दे सकते हो ,इन्हीं बातों को लेकर अक़्सर मधुलिका के साथ तू -तू ,मैं -मैं भी हो जाती क्योंकि वह उससे कहती थी -इनकी जिम्मेदारी मुझ पर ही नहीं है, तुम पर भी है, यह तुम्हारे भी पिता है।
मैं उनकी देखभाल कर तो रहा हूं, मुझे बाहर के भी चार काम होते हैं।
क्या मैं खाली बैठी रहती हूं ? तुम्हें काम है, तो मुझे काम नहीं है। दोनों अपनी-अपनी जगह सही थे , तब कुमार ने सोचा-पिता के लिए एक नर्स रख लेते हैं , वह पापा की देखभाल अच्छे से कर लिया करेगी। समय पर दवाई, इंजेक्शन जो भी होगा, सब समय पर हो जाएगा।
अब कुमार नर्स को रखकर ,अपने पापा की तरफ से वह निश्चित हो गया था, उनकी दवाई उनका खानपीन सबका नर्स ख़्याल रख रही थी, जिम्मेदारी तो अब मधुलिका की भी नहीं रह गई थी , अपने प्रतिदिन के कार्य वो उसी तरीके से कर रही थी।
इन दिनों में कुमार तो जैसे, खुश रहना ही भूल गया था अक्सर उसे' यामिनी' की याद आती, तो चेहरा एकदम से खिल उठता, दिन भर की परेशानियों को पल भर में ही भूल जाता। जैसे बुझी हुई मुरझाई पत्तियों पर, एक ओस की बूंद गिर जाए तो कुछ पल के लिए, फिर से चमकने लगती हैं। अब वह मधुलिका के साथ तो रहता, किंतु उसका ध्यान अक्सर यामिनी की तरफ चला जाता मधुलिका के साथ रहकर भी, उसमें यामिनी को देखने का प्रयास करता। मधुलिका ने उसके बदले हुए व्यवहार को महसूस किया और पूछा -क्या कुछ हुआ है ?
नहीं तो, तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो ?
क्योंकि मैं देख रही हूं जब से आप जयपुर से आए हैं, तब से कुछ बदले -बदले से लग रहे हैं।
बदलाव कैसा ? जीवन में परिवर्तन तो होते ही रहते हैं किंतु तुम देख नहीं रही हो, पापा कितने बीमार हैं ? उनकी दवाई- गोली चल रही है, उनकी चिंता है, व्यापार की चिंता है, सब कुछ अब मुझे ही तो संभालना है।
