Khoobsurat [part 92]

कुमार अच्छे से तैयार होकर, 'यामिनी मैडम' से मिलने के लिए चल दिया। उसे मन ही मन प्रसन्नता हो रही थी, जिसके लिए वह तीन दिन से यहां इस होटल में रुका हुआ था ,आज उससे मुलाकात होगी। वह स्वयं भी नहीं समझ पा रहा था कि यामिनी में ऐसा कौन सा आकर्षण है? जो उसे, अपनी ओर खींच रहा है। उसने घड़ी में समय देखा अभी 4:00 बजने में आधा घंटा बाकी है। बेचैनी से, वह अपने पांव हिला रहा था। मन ही मन सोच रहा था - क्या मुझे थोड़ा पहले पहुंच जाना चाहिए या फिर 4:00 बजे ही पहुंचना चाहिए।


वक़्त की पाबंदी के कारण वो झुंझलाया - यह भी क्या बात हुई ? क्या मेरी मुलाकात 4:00 बजे से पहले नहीं हो सकती ? फिर मन ही मन अपने आप को समझाया, इतना उतावलापन भी उचित नहीं ,बड़े लोग समय के बड़े पाबंद होते हैं। धीरे-धीरे चलता हूं, बाहर बैठकर, एक कप चाय पी लेता हूं, चार तो यूं ही बज जाएंगे। ये क्या कम बड़ी बात है ? कि वो इतनी बड़ी कलाकार होने के बावजूद भी मिलने के लिए तैयार हो गयी। 

तभी उसके फोन की घंटी घनघना उठी ,' उस पर गाना बज रहा था -''आज से तेरी, सारी खुशियां मेरी हो गई, आज से तेरे, सारे सपने मेरे हो गए। '' यह गाना कुमार ने उन दिनों लगाया था जब वह मधुलिका से मिला था , और धीरे-धीरे उन दोनों में प्यार हो गया था उन्हीं दिनों यह गाना बड़े जोर- शोर से चल रहा था। तब कुमार ने यही गाना लगाया था किंतु इस समय फोन का आना और इस गाने का बजना कुमार को अच्छा नहीं लगा। किसका फोन है ? यह जानने के लिए, उसने फोन में देखा, मधुलिका का ही फोन था मन तो किया ,फोन काट दे किंतु वह यह भी जानता था कि जब तक मधुलिका को उसके सवालों का जवाब नहीं मिलेगा वह बार-बार, लगातार फोन करती रहेगी।

 इसलिए उसने फोन उठा लिया, फोन उठाते ही, उधर से आवाज आई - कुमार !तुम कहां हो ? तुम तो दो दिन पहले आने वाले थे और आज तुम्हें तीन दिन हो गए हैं। 

यह क्या बचपना है ?नाराज होते हुए, कुमार ने, मधुलिका से पूछा -क्या तुम जानती नहीं हो, कि मैं अपने कारोबार के सिलसिले में यहां आया हुआ हूं। अभी मुझे, कुछ लोगों से अभी और मिलना है इसलिए यहां रुका हुआ हूँ। 

कुमार का जवाब सुनकर, मधुलिका थोड़ी शांत हो गई और बोली- कम से कम फोन करके मुझे बता तो सकते थे, कि मैं कब आ रहा हूं ,मुझे चिंता हो रही थी।

 हां मैं, जानता हूं, किंतु यहां पर आकर ऐसा फंस गया, तुम्हें फोन करने का मौका ही नहीं मिला।सॉरी बाबा ! गलती हो गयी।  अच्छा अभी मुझे एक मीटिंग में जाना है, मैं ,तुमसे बाद में आकर मिलता हूं।

 ठीक है, अपना ख्याल रखना ! मधुलिका ने कुमार पर विश्वास करके फोन रख दिया। 

 मधुलिका ने, जब से कुमार से विवाह किया है, उसे अपने आप पर ही नहीं ,कुमार पर भी पूर्ण विश्वास है कि वह उसे कभी धोखा नहीं देगा। दोनों ही एक- दूसरे से बहुत प्रेम करते हैं , अपने प्यार पर उसका ऐसा विश्वास, बना हुआ है।  बाहर जाकर वह जो भी कुछ करता है, वह नहीं जानती है ,न ही जानना चाहती है लेकिन उसे इतना विश्वास है कि वह कहीं भी भटकेगा लेकिन अंत में उसे वापस यहीं आना होगा।

मधुलिका जानती है, जानती ही नहीं उसे पूर्ण विश्वास है कि कुमार सिर्फ उसी से प्यार करता है और वह भी उसे ही प्यार करती है , उसमें क्या कमी है ? जो कुमार इधर-उधर भटकेगा किंतु कई बार ऐसा होता है, व्यापार के सिलसिले में, कभी-कभी देर -सवेर हो जाने पर उसे घबराहट होती है, कहीं ,कोई हादसा तो नहीं हो गया इसलिए फोन करके अपने को आश्वस्त कर लेती है , आज भी उसने इसीलिए फोन किया था। 

चाय पीते हुए, कुमार ने घड़ी में समय देखा,चार बजने में  5 मिनट बाकी हैं। होटल में तो वह पहले से ही प्रवेश कर चुका था अब तो उसे कमरा नंबर 212 में पहुंचना था। जैसे-जैसे वह कमरे की और बढ़ रहा था, उसके दिल की धड़कनें तीव्र होती जा रही थीं। उसके मन ने स्वयं उससे प्रश्न किया, आखिर वह ' यामिनी 'से क्यों मिलना चाहता है ? अपने आप को ही उसने समझाया -वह बहुत अच्छी कलाकार है,अब यहाँ आया हूँ तो मिलने में क्या बुराई है ?

 नहीं, यहां तू गलत है, वह एक अच्छी कलाकार होने के साथ-साथ एक खूबसूरत औरत भी है ,उसकी अंतर्रात्मा ने उसे सच्चाई से रूबरू कराना चाहा। 

हाँ ,यह बात तो है ,उसमें एक अजीब सा आकर्षण है ,मुझे तो लगता है ,वो भी मुझे पसंद करने लगी है,देखा नहीं ,उसने मुझसे कैसे हाथ मिलाया था ,सोचते हुए ,अपने उसी हाथ को बड़े प्यार से देखा। वैसे ऐसा नहीं है ,यदि वो'' खूबसूरत'' है तो मैं भी तो कुछ कम नहीं ,सोचकर ही उसकी आँखों में चमक आई किन्तु यह पूर्णतः सत्य नहीं है ,उसने अपने ही शब्दों को झुठलाया,''  ऐसा भी नहीं है, मैं कला प्रेमी भी हूं '', मैं कलाकारों की कद्र करता हूं,' यामिनी' जितनी बेहतरीन कलाकार हैं, उतनी ही सुंदर वह स्वयं भी है , और साथ ही उनका व्यवहार भी बहुत अच्छा है। जब से यामिनी ने कुमार से हाथ मिलाया था तब से कुमार को लगने लगा था कि शायद वह मुझ में दिलचस्पी ले रही है। विचारों से जुझते हुए ,कमरा नंबर 212 के करीब पहुंचकर, उसने दरवाजा खटखटाया। 

अंदर से आवाज आई, आ जाइए ! दरवाजा खुला है। कुमार में दरवाजा खोला और कमरे में प्रवेश किया, कमरे में बहुत अच्छी खुशबू आ रही थी। उसने इधर-उधर देखा, कमरे में एक बेड था, और वहीं पर पास में, एक सोफा भी रखा हुआ था जिस पर ''यामिनी जी'' बैठी हुई थीं, कुमार को देखते ही खड़े होकर बोलीं  -आईये ! आपका स्वागत है। 

अपनी धड़कनों को नियंत्रित करके कुमार खुशी से मुस्कुराते हुए आगे बढ़ा -और अपने हाथ का गुलदस्ता यामिनी जी को थमा दिया, कैसी हैं ? आप ! 

यामिनी ने वह गुलदस्ता अपने हाथों में लेते हुए कहा - मैं ठीक हूँ  - धन्यवाद ! बैठिए ! क्या मैं आपका नाम जान सकती हूं ?

हां हां क्यों नहीं ? कुमार !नाम है ,मेरा कहते हुए कुमार सोफे पर बैठ गया। 

 तभी यामिनी ने पूछा -आप मुझसे क्यों मिलना चाहते थे ?

जब से मैंने आपकी कलाकृतियां देखीं हैं, मैं तो आपका जबरदस्त फैन हो गया हूं। आपकी कला में वो  बारीकियां, रंगों का संयोजन बहुत ही' खूबसूरत' है , मानव मन को आप बहुत ही बारीकी से परख लेती हैं और उनको अपने रंगों से, उकेरना....  मुझे लगता है, आपके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। 

यामिनी, धीमे से मुस्कुराई और बोली -अच्छा कलाकार वही होता है, जो मन ही नहीं, आत्मा  को भी पढ़ ले चेहरे के भाव तो बहुत से लोग पढ़ सकते हैं, लेकिन मन और आत्मा को समझना भी बहुत कठिन है। उनको मैं अपनी कलाकृतियों में उकेरना चाहती हूं। 

वैसे आपने कला की बारीकियां कहां से सीखी ?

''कला को सीखना नहीं पड़ता ,कलाकार तो, पैदा होते हैं ,बनाये नहीं जा सकते, बस...  उनकी उस कुदरती प्रतिभा को निखारना होता है। 

यह अपने बहुत ही 'खूबसूरत' बात कही है , सच में कलाकार भी ,कुदरत की देन होते हैं , उनके भेजे हुए कला के दूत जो, कुदरत की उस कलाकृति को अपने रंगों में, ब्रश के माध्यम से पुनर्जीवित कर देते हैं। 



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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