Mysterious nights [part 119]

तारा जी ,पारो के सामने ,रूही की प्रशंसा कर रहीं थीं  ,पारो को लगता है ,ये मेरे अपने हैं ,मेरे मौसा -मौसी हैं ,इनका ध्यान, विशेष कर मुझ पर ही होना चाहिए न कि उस अजनबी लड़की पर, किन्तु रूही की आदतें उसका व्यवहार उन्हें उसकी प्रशंसा करने पर विवश कर देता है। यही बात वो अभी भी, पारो से कह रहीं थीं। पारो ,उन्हें बनावटी क्रोध दिखलाते हुए कहती है -आप मुझे ,उसके सामने ,अशुद्ध ,अस्वच्छ कहना चाहती हैं ।

 हंसते हुए वो बोलीं -कहना नहीं चाहती हूं ,कह रही हूं ,जब तक वह नहाकर आती है ,तुम अपना नाश्ता समाप्त करो ! तब  पारो के करीब कुर्सी खिसकाते हुए, पारो के समीप बैठकर, तारा जी ने पारो से, बड़े ही रहस्यमई तरीक़े से पूछा -यह परिवर्तन कैसे हुआ ? क्या कोई बात है ?


अभी तक तो, मुझे भी मालूम नहीं है, कि वह क्या चाहती है और क्यों जा रही है ? क्योंकि कल तो वह , मुझसे भी मना कर रही थी। तभी सोचते हुए बोली -हाँ ,कल उससे एक लड़का बातें कर रहा था ,यह बात उसने जानबूझकर उन्हें बताई। 

कौन लड़का था ?देखने में, कैसा दिखता था उन्होंने आश्चर्य से पूछा। 

क्या आप, उसके लिए रिश्ता लेकर जाएँगी ?हँसते हुए पारो ने पूछा । 

किसका ?तुम्हारा या रूही का ,वो तो अभी विवाह के लिए तैयार नहीं होगी ,वो अभी तक, अपनी समस्याओं में ही उलझी हुई है। 

अच्छा ,उस अनजान लड़के से मेरा रिश्ता करा देंगी ,आँखें तरेरते हुए पारो बोली -मैं आपको ये बात बता दूँ ,वो मुझसे नहीं, रूही से बातें कर रहा था।

 वो चुपचाप बैठकर सोचने लगीं और चिंतित स्वर में बोलीं - क्या बातें कर रहा होगा ?आज तक तो रूही ने इस  तरह किसी से बात नहीं की ,कौन हो सकता है ?

आज तक बातें नहीं की, तो क्या कभी बात करेगी ही नहीं ?जवान लड़की है। 

उसकी बातों का अर्थ समझते हुए कि वो क्या कहने वाली है ? तारा जी ने पारो को धिक्कारा ,बोलने से पहले कुछ सोच -समझ तो लिया करो ! तुम अपनी छोटी बहन के लिए, क्या कहने जा रही हो ?

वो इतनी छोटी भी नहीं है,आपने बेवज़ह ही उसको, मुझसे छोटा बना दिया है ,क्या आप उसकी उम्र जानती हैं ? उसने भी मुझे दीदी कहकर, अपने से न जाने, कितना बड़ा बना दिया है ? 

वो तुम्हें बड़ा सोचकर नहीं बल्कि तुम्हें सम्मान देने के लिए ,ऐसा बोलती है फिर भी मुझे लगता है ,तुम दोनों उम्र में चाहे समान ही हो किन्तु तुम उससे ज्यादा पढ़ी -लिखी और समझदार हो। 

क्या ??आप मुझे समझदार समझती हैं ,मैंने तो जैसे ऐसे शब्द सुनने की उम्मीद ही छोड़ दी थी ,नाश्ता करके हाथ धोते हुए वो बोली -मुझे लगता है ,उन दोनों के मध्य ऐसा तो कुछ हुआ होगा ,जिसके कारण रूही ने घर आने के पश्चात सोचा हो कि मुझे दुबारा उससे मिलना चाहिए और ये भी हो सकता है ,उसे वहां का वातावरण अच्छा लगा हो ,इसीलिए सोचा ,आज भी जाना चाहिए ,पारो ने संभावनाएं व्यक्त कीं।  

 शाम को,' रूही' अपने आप ही तैयार हो गई थी, उसने अपने को अच्छे से सजाया था।  न जाने, उसके मन में क्या चल रहा था किंतु उसके चेहरे पर एक दृढ़ता थी, उसके गंभीर चेहरे को देखकर लग रहा था अवश्य ही, इसके मन में कुछ तो चल रहा है, किंतु उसने अपने विचार को किसी से भी बांटना नहीं चाहा। 

जब वे लोग, गाड़ी से उतरीं, कल ही की तरह, वहां तो भीड़ थी किन्तु आज वहां दोगुनी भीड़ थी। तब पारो ने पूछा -आज तो तू डांस करेगी या नहीं या इसी तरह कोने में बैठी रहेगी, और किसी लड़के की प्रतीक्षा करेगी या फिर वही आने वाला है,कहते हुए उसने अपनी भौंहें चलाई और मुस्कुरा दी।  

 उसके किसी भी सवाल का जवाब, रूही ने देना उचित नहीं समझा।

 पारो, फिर से उस ''डांडिया रास'' भीड़ में, गुम होती चली गई, वह तो स्वयं ही चाहती थी, कि रूही इसी भीड़ में ,कहीं गुम हो जाए और मिले ही न..... रूही उसी स्थान को ढूंढते हुए, वहीं पर पहुंच गई, जहाँ कल 'गर्वित 'मिला था। मन ही मन में, परेशान भी थी, यदि वह नहीं आया तो मेरा आना व्यर्थ हो जाएगा। उसको आना चाहिए , अबकी बार स्वयं ही, उसने डांडिया की छड़ियाँ अपने हाथों में ले ली थीं ,जैसे देखने वाले को लगे कि वह डांडिया के लिए, किसी साथी को ढूंढ रही है।

 पारो ने, एक बार रूही की तरफ पलट कर देखा था, उसके चेहरे का आत्मविश्वास देखते ही बन रहा था, पारो के चेहरे पर एक मुस्कुराहट आई, यह बात पारो के लिए भी, रहस्यमयी हो गई थी कि आज की रात्रि कुछ तो अलग होने वाला है। लगभग आधा घंटे की प्रतिक्षा के पश्चात, रूही को, गर्वित दिखलाई दिया किंतु उसने ऐसा दिखलाया जैसे, वह उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रही थी। अभी तक' गर्वित' ने 'रूही' को नहीं देखा था इसीलिए बीच-बीच में वह घूम कर देख लेती थी कि वह आ रहा है या नहीं। कुछ देर तक तो वो, उसे दि खता रहा फिर वह भी भीड़ में, न जाने कहाँ खो गया ?

रूही की नजरें तीव्र गति से उस भीड़ में ,गर्वित को ढूंढने का असफ़ल  प्रयास करने लगीं। तब उसे लगा अब मुझे ही कुछ करना होगा ,यह सोचते हुए ,वो उस भीड़ की ओर बढ़ चली ,जहाँ बहुत सारे लड़के -लड़कियां नृत्य करने में मग्न थे ,कुछ प्रयास कर रहे थे तो कुछ अच्छा नृत्य कर रहे थे।

 तभी एक गाना बदला -''सांसों की माला पे ,सिमरु मैं तेरा का नाम ''

अचानक ही न जाने, रूही को क्या हुआ ?और वो अकेली ही बड़े जोरों से संगीत की धुन पर थिरकने लगी और अकेली ही डांडिया लेकर नृत्य करते हुए, झूमने लगी। आसपास के सभी लड़के -लड़की उसकी इस गतिविधि को देखकर, हतप्रभ रह गए ,बिना किसी की परवाह किये रूही ने, उस स्थान को अपना बना लिया। अब वो अकेली ही ,वहां नृत्य करती नजर आ रही थी ,वहां पर अच्छी -ख़ासी भीड़ उसे देखने के लिए ही उमड़ पड़ी। पारो को भी पता चला कोई लड़की अकेली ही ,वहां बहुत सुंदर नृत्य कर रही है। 

ठीक है ,अभी आती हूँ ,कहकर रूही को ढूंढने लगी किन्तु उसे रूही कहीं भी दिखलाई नहीं दी। तब सोचा ,कभी वो भी, उस लड़की को देखने चली गयी हो ,यही सोचकर भीड़ की और बढ़ी किन्तु वहां उसे निकलने के लिए जगह ही नहीं मिल रही थी। तभी उसे लगा ,जैसे उसे कोई उसे इशारा कर रहा है ,वो इधर -उधर देखने लगी ,तब उसने देखा, एक ऊँचे स्थान से ,गर्वित हाथों के इशारे से उसे बुला रहा था। 

उस भीड़ से निकल कर, बाहर की तरफ दौड़ी और गर्वित की तरफ जाने लगी, किंतु वहां भी, पहले से ही काफी भीड़ थी लोगों को हटाते हुए, वह आगे बढ़ रही थी। जैसे ही उसने उस रिक्त स्थान को देखा जिस पर एक अकेली लड़की नृत्य  कर रही थी , वह आश्चर्य चकित रह गई, इतने शोर में वह चिल्लाते हुए गर्वित से बोली -इसे तो नृत्य आता ही नहीं, आज यह क्या कर रही है ?




laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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