मोहिनी, भानु के साथ सुरंग में घूम रही थी। तभी उसे लगता है ,जैसे अंधेरे में कोई उसके साथ है। तब वह डर कर भानु से पूछती है - क्या तुम्हें कुछ दिख रहा है ?
भानु ने जवाब दिया ,नहीं !
तब वो कहां गई ?कुछ सेकंड तक दोनों चुप रहे ,फिर मोहिनी ने महसूस किया...उसका हाथ अब भी भानु के हाथ में था लेकिन दूसरी तरफ़ से...किसी और का हाथ उसकी कलाई को छू रहा था ,जो बेहद ठंडा लग रहा था। मोहिनी का दिल तेजी से धड़कने लगा। वो धीरे से बोली —"भानु !..."
"हाँ?"
"तुम मेरा कौन-सा हाथ पकड़े हुए हो?"
दांया !भानु ने तुरंत कहा—
मोहिनी को ' काटो तो खून नहीं ' जैसी हालत हो गयी ,जैसे उसकी साँस ही अटक गई ,क्योंकि उसका दायाँ हाथ भानु के हाथ में था और...उसका बायाँ हाथ किसी और ने पकड़ रखा था।
तब साथ चलते इंसान की आवाज़ फिर आई—"बेटी...!जरा अपनी आँखें तो खोलो !
इस बार मोहिनी ने अपनी आँखें खोल दीं ,अंधेरे में उसे एक धुँधली सी आकृति दिखलाई दी।ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सफेद कपड़ों में कोई महिला सामने खड़ी है ,उसके बाल लम्बे हैं। उसने अपना चेहरा उस अँधेरे में भी छिपाया हुआ था। वो स्पष्ट नजर नहीं आ रहा था।
मोहिनी का पूरा तन काँप गया ,उस महिला ने, उसका हाथ छोड़ा और पीछे हट गई।फिर...उसने धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर उठाया।
मोहिनी, साँस रोके यह सब देख रही थी किन्तु उसका चेहरा अभी भी दिखलाई नहीं दे रहा था। तभी उस महिला ने अपनी उँगली होंठों पर रखी -चुप ! फिर उसने दीवार की ओर इशारा किया ,वहाँ...एक दरवाज़ा उभर आया था।
मोहिनी ने पलक ही झपकी थी ,तभी दरवाज़ा गायब और वो महिला भी गायब !उसके गायब होते ही ,अचानक मशाल फिर से जल उठी।
भानु ने अपने चारों ओर देखा और मोहिनी से पूछा -"क्या हुआ?"
मोहिनी कुछ बोल ही नहीं पाई ,वह स्वयं ही कुछ भी समझने में अपने को असमर्थ पा रही थी ,उसने सिर्फ़ सामने दीवार की ओर इशारा किया -"वहाँ..."
भानु ने उधर देखा ,वहां कुछ नहीं था ,कुछ भी न समझते हुए ,उसने पूछा -"क्या?"
"एक औरत थी,मोहिनी अटकते हुए बोली।
"कहाँ?"
"यहीं।"
भानु ने, उसकी आँखों में देखा -"क्या तुमने उसका चेहरा देखा था ?"
मोहिनी ने सिर हिलाया -"नहीं।"फिर उसने धीरे से कहा—लेकिन उसने मुझे बचाया।"
भानु ने जमीन पर पड़ी चीज़ देखी।वो एक छोटी-सी चाँदी की अंगूठी थी।उसने उसे उठाया उसके अंदर खुदा था -"M"
भानु ने, मोहिनी को दिखाया ,"क्या यह भी मृणाल की है ? मोहिनी ने अंगूठी हाथ में ली ,जैसे ही उसने, उसे छुआ...उसकी आँखों के सामने फिर वही धुँधला दृश्य आ गया। एक कमरा ,एक महिला,एक छोटी बच्ची और सामने खड़ा रत्न प्रताप ,लेकिन इस बार...रत्न प्रताप बहुत युवा दिखाई दे रहे थे। महिला गुस्से में उनसे कह रही थी — अगर तुमने, उसे आज रात यहाँ से नहीं निकाला..."तो वे उसे ढूँढ़ लेंगे।"
युवा रत्न प्रताप ने कहा—मैं ,उसे सुरक्षित जगह पहुँचा दूँगा।
महिला ने पूछा—"किसके पास?"
रत्न प्रताप कुछ क्षण चुप रहे और फिर बोले—"उस आदमी के पास..अचानक दृश्य धुँधला हो गया।
मोहिनी ने झटके से आँखें खोल दीं और लड़खड़ा गयी।
भानु ने उसे संभाला और पूछा -"क्या देखा?"
मोहिनी ने इस बार तुरंत जवाब दिया—रत्न प्रताप राजवीर !"
"क्या?"
"हाँ ,मैंने उन्हें ही देखा, पच्चीस साल पहले का दृश्य लग रहा था।
यह सुनकर भानु का चेहरा गंभीर हो गया "और?"
मोहिनी ने धीरे से कहा—"वो किसी बच्ची को कहीं ले जाने की बात कर रहे थे।"
"किस बच्ची को?"
मोहिनी ने, उसकी ओर देखा और बोली -"मुझे !"
भानु कुछ क्षण तक कुछ नहीं बोल पाया।
उसी समय...ऊपर हवेली में रत्न प्रताप अचानक रुक गए। उनकी गर्दन के पीछे भी ,वही पुराना निशान जलने लगा।
विक्रम ने तुरंत पूछा—"क्या हुआ?"
रत्न प्रताप ने आँखें बंद कर लीं और बोले -"वह जाग गई है।"
साया ने उनकी ओर देखा,"कौन?"
रत्न प्रताप ने उत्तर नहीं दिया।साया समझ गया और कहा -"मोहिनी ?"
रत्न प्रताप ने सिर हिलाया ,साया ने डायरी खोली ,उसमें एक नया शब्द उभर चुका था।"दूसरा दरवाज़ा !"और उसके नीचे...एक वाक्य—"जिससे छिपाया गया था, उसने देख लिया।"
साया की आँखों में गंभीरता आ गई ,"अब समय कम है।"
विक्रम ने पूछा—"किसके लिए?"
साया ने डायरी बंद कर दी ,"हम सबके लिए।"
उधर सुरंग में...मोहिनी और भानु आगे बढ़ रहे थे।अब दोनों के मन में एक ही सवाल था—रत्न प्रताप ने, उसे कहाँ भेजा था?
सुरंग अचानक एक विशाल पत्थर के दरवाज़े पर खत्म हो गई। दरवाज़े के बीच एक गोल निशान था। उसमें वही पीतल की चाबी लग सकती थी।मोहिनी ने चाबी निकाली।
भानु ने कहा—"शायद यही दूसरा दरवाज़ा है।"
मोहिनी ने चाबी ताले में डाल दी ,क्लिक !दरवाज़ा नहीं खुला।उसने चाबी घुमाई ,कुछ नहीं हुआ।
भानु ने दरवाज़े को देखा और अनुमान लगाया ,"शायद कोई दूसरा ताला है।"
मोहिनी ने हाथ फेरते हुए कहा—"नहीं।"
"क्या?"
"यह ताले से नहीं खुलेगा।"
उसने दरवाज़े के ऊपर बनी आकृति की ओर इशारा किया ,वहाँ एक अर्धचंद्र था और उसके नीचे...एक छोटी हथेली का निशान। मोहिनी ने अपना हाथ उस निशान पर रखा किन्तु कुछ नहीं हुआ।
भानु ने पूछा—"शायद खून..."
"नहीं।"
मोहिनी ने अचानक कहा -"मुझे लगता है...उसने पायल निकाली ,उसमें लगा छोटा लॉकेट हथेली के निशान के पास ले गई - टक! दरवाज़े के भीतर से आवाज़ आई ,फिर...पत्थर धीरे-धीरे पीछे खिसकने लगा।घर्ररर...दरवाज़ा खुल गया।अंदर एक छोटा कमरा था ,कमरे में न कोई संदूक था...न कोई मूर्ति...न कोई पुरानी वस्तु ,सिर्फ़ एक मेज़ और उस पर...तीन लिफाफे ! हर लिफाफे पर एक नाम लिखा था।पहले पर—रत्न प्रताप !दूसरे पर—विक्रम ! तीसरे पर—मोहिनी ! मोहिनी ने अपना नाम देखते ही कदम रोक दिए।
भानु ने कहा —"यह तुम्हारे लिए है।"
मोहिनी ने लिफाफा उठाया।पीछे लिखा था—"इसे अकेले में पढ़ना।"
भानु ने कहा—"अगर तुम चाहो ,तो मैं बाहर चला जाता हूँ।"
मोहिनी ने लिफाफे को देखा फिर विराज की ओर बोली -"नहीं।"यह उसने धीरे से कहा।"मैंने अकेले बहुत कुछ सहा है ,अब और नहीं ,भानु कुछ नहीं बोला। मोहिनी ने लिफाफा खोल दिया।अंदर केवल एक कागज़ था ,उस पर लिखा था—मोहिनी !अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हें अपने बचपन की पहली सच्ची याद मिल चुकी है। मोहिनी की उँगलियाँ काँपने लगीं।अगली पंक्ति—"तुम्हें जिस रात इस हवेली से बाहर भेजा गया था, उस रात तुम्हें बचाने वाला आदमी...मोहिनी की साँस जैसे अटक गई।वह आगे पढ़ने लगी -भानु के पिता, विक्रम नहीं थे।"
मोहिनी ने, तुरंत भानु की ओर देखा,भानु भी स्तब्ध था।नीचे एक और पंक्ति थी—लेकिन वह आदमी तुम्हारे लिए अजनबी भी नहीं था ,फिर...कागज़ खाली था।बस सबसे नीचे एक छोटा-सा चिन्ह !''दो साँप''
मोहिनी ने कागज़ पलटा ,पीछे सिर्फ़ एक वाक्य था—"तीसरा नाम मिलने तक किसी पर पूरा भरोसा मत करना।"
भानु ने धीरे से पूछा—"तीसरा नाम?"
मोहिनी ने उसकी ओर देखा ,"शायद यही अगला रहस्य है।"
तभी कमरे के बाहर...किसी के कदमों की आवाज़ आई।इस बार कदम तेज़ थे।और फिर एक परिचित आवाज़—"मोहिनी !"
भानु ने तलवार निकाल ली ,"यह कौन है?"
