Mysterious nights [part 120]

आज, अचानक रूही को न जाने क्या हुआ ? वह गर्वित की, प्रतीक्षा कर रही थी, किंतु कुछ देर पश्चात, वह स्वयं ही भीड़ के मध्य पहुंचकर नृत्य करने लगी। उस अकेली ने ही मोर्चा संभाल लिया किंतु जो लोग, उसे जानते थे, उनके लिए आश्चर्य की बात थी, कि जो लड़की, कल तक नृत्य करना नहीं जानती थी। आज वह, अकेली ही इतना सुंदर नृत्य कर रही थी। पारो भी, उसे ढूंढते हुए, गर्वित के पास पहुंच जाती है और जब वह देखती है -कि रूही ही वह लड़की है जो इतनी भीड़ के बीच अकेली नृत्य कर रही है ,तो उसे आश्चर्य होता है तब वह उस भीड़ में लगभग चिल्लाते हुए गर्वित से कहती है -इसे तो नृत्य आता ही नहीं था। 

गर्वित ने भी उतने ही जोर से कहा -तुम्हारे सामने ही तो है, तुम इसकी बहन हो और इसे जानती भी नहीं , इस बात पर पारो चुप हो गई। 


तब वह बोली - यह कई दिनों से व्रत भी रख रही है, कहीं इसे कुछ हो ना जाए , यह तो लगातार नृत्य करती ही जा रही है, इसे रोकना होगा ,कहीं इसकी तबीयत न बिगड़ जाए। कहते हुए वह अपने स्थान से नीचे आई और उस भीड़ को चीरते हुए, रूही के करीब पहुंच गई।  एक मन किया,अच्छा हो, ये नृत्य करते -करते ही मर जाये किन्तु तभी उसकी आत्मा ने उसे धिक्कारा - कई दिनों से देवी का व्रत और पूजन कर रही है ,यदि इसे कुछ हो गया तो ,तू भी, इसकी मौत की ज़िम्मेदार होगी।

  रूही की तो जैसे हालत ही खराब होती जा रही थी, वह अभी भी लगातार नृत्य करती जा रही थी। तभी पारो ने सामने आकर उसे रोका और एक दो लोगों से और सहायता मांगी। उसने देखा, रूही का बदन पूरी तरह थक चुका है , आंखों में अजीब सी चमक थी, ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी के वश में है, और नृत्य करती जा रही है। जैसे ही उसको रोका गया वह बेहोश हो गई।

 तब तक गर्वित भी उसके पास आ चुका था और उसने पारो से पूछा -इसे क्या हुआ है, यह ऐसा क्यों कर रही है ?

 तब भीड़ में से, एक लड़की बोली -मुझे तो लगता है, इस पर देवी मां की कृपा हो गई है , उनका आशीर्वाद इसे मिला है यह उन्हीं के लिए नृत्य कर रही थी। वे लोग उसे उठाकर गाड़ी में लिटाते हैं और उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारते हैं। कुछ देर की कोशिशों के पश्चात , रूही को होश आया और बोली - मैं यहां कैसे आई ?

और तुम्हें कहां होना चाहिए था, पारो ने पूछा और तभी बोली -मेरा पर्स वहीँ -कहीं गिर गया ,मैं  अभी आती हूँ ,कहते हुए वहां से तीव्रता से चली गयी।  

पता नहीं, मैं तो सबको नृत्य करते हुए ,देख रही थी। 

और फिर तुम स्वयं नृत्य करने लगीं ,गर्वित उसके सामने आकर बोला। गर्वित ने इधर -उधर देखा और पूछा -सबको देख रही थी या मुझे ढूंढ रही थीं, जहां तक मैं गलत नहीं हूं, तुम मेरी प्रतीक्षा कर रही थीं ।

 गर्वित को देखकर रूही उठ बैठी, और बोली -मैं भला तुम्हारी प्रतीक्षा क्यों करूंगी ? मुझे तो आज आना ही नहीं था, पता नहीं, कैसे चली आई ?

मेरे लिए आई हो ,इससे पहले कि वो कुछ और कहता ,तभी पारो ,वहां आकर रूही से पूछती है -अब तुम ठीक हो ! 

हां, मैं एकदम स्वस्थ हूं, यहां आए हुए, हमें कितना समय हो गया  ?

यही कोई दो घंटे हुए हैं। 

अब हमें चलना चाहिए , उसने गर्वित की तरफ देखा तब उसे अपनी बात स्मरण हो आई ,मन ही मन सोच रही थी मैं यहां जिस उद्देश्य से आई हूं, वह तो पूर्ण ही नहीं हुआ। तब उसने पारो से पूछा -क्या तुम अभी और रुकना चाहोगी। 

मुझे लगता है, तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है , अब हम घर जाएंगे। 

नहीं, मैं ठीक हूं , तुम यदि रुकना चाहती हो तो कुछ देर के लिए रुक सकती हो।

तुम अकेली क्या, यहीं गाड़ी में बैठी रहोगी ?

 तभी गर्वित बोला-मैं इनके साथ हूँ क्योंकि मुझे भी नृत्य नहीं आता है। 

ठीक है ,अपना ख़्याल रखना कहते हुए वहां से आगे बढ़ गयी। 

 पारो के  चले जाने के पश्चात, रूही गाड़ी से बाहर आ गई और नजदीक ही कोई कुर्सी देखकर उस पर बैठ गई। तब गर्वित भी एक कुर्सी कहीं से उठा लाया और उसके समीप बैठते हुए बोला -तुम तो कह रही थीं  मुझे कोई नृत्य नहीं आता, फिर यह सब क्या था ? तुम तो बड़ा अच्छा नृत्य कर रही थीं ।

 यह तुम क्या कह रहे हो ? क्या मैंने कोई नृत्य किया? ऐसा कैसे हो सकता है ?अविश्वास से उसने पूछा। 

तभी तो तुम बेहोश भी हो गईं ,लगातार एक घंटा डांस किया है।

 रूही सोचने लगी -क्या यह सही कह रहा है? हो सकता है, सही कह रहा हो, तभी तो मेरी तबीयत बिगड़ गई थी।

 अच्छा यह बताओ ! आज तुम मेरे लिए ही तो यहां आई हो !गर्वित ने बिना लाग -लपेट स्पष्ट रूप से पूछा। 

मैं भला तुम्हारे लिए यहां क्यों आउंगी ?और भी तो लड़के- लड़कियां यहां पर उपस्थित है ,वे सभी यहां पर' गरबा' और 'डांडिया' के लिए आए हैं। तुम बताओ ! तुम यहां किस लिए आए हो ? क्या, तुम्हें उम्मीद थी कि मैं यहां दोबारा आऊंगी या फिर किसी अन्य लड़की से मिलना चाहते थे। वैसे एक बात पूछ सकती हूं, तुम इस शहर के नहीं हो, तब कहां से आए हो ?

तुमने सही पहचाना, मैं इस शहर का नहीं हूं किन्तु ये बात मैंने कल ही, तुम्हें बता दी थी ,यहां पर नृत्य देखने के लिए ही आ जाता हूं, पास के शहर में ही हमारा एक होटल है , और उसके पास ही हमारा गांव भी है। 

तुम, किस गांव से आए हो ?

क्यों ?इतनी छानबीन क्यों कर रही हो, क्या तुम पुलिस में हो ?या मेरे घर का पता इसलिए पूछना चाहती हो  ताकि अपनी मम्मी- पापा को बता सको ,हंसते हुए उसने कहा। 

नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है, उसने शरमाने का अभिनय किया, ऐसे ही जानकारी के लिए पूछना चाहती थी। तब गर्वित, गर्व से  बोला -मैं ''ठाकुर अमर प्रताप सिंह जी'' के परिवार से हूं ,उनका पोता हूं, और हम ''बीजापुर'' में रहते हैं। 

क्या, तुम हवेली में रहते हो,? एकदम से रूही ने पूछा। 

हां, तुम क्यों पूछ रही हो ? क्या उस गांव में किसी को जानती हो, या तुम्हारा कोई जानने वाला वहां रहता है या फिर हवेली से ही, कोई रिश्ता है। 

अब तुम्हें क्या बताऊं ? मेरी एक सहेली थी, उसका विवाह उसी गांव में हुआ था। 

किसके यहां ?किस परिवार में ? 

 बहुत दिनों की बात है ,अब तो मुझे कुछ भी ठीक से स्मरण नहीं है।

न  जाने ,वो कैसी होगी? उसके साथ क्या हुआ होगा ?तब उसने अपने आपको संभाला और बोली - बस इतना स्मरण है, कि उसका विवाह बीजापुर गांव की हवेली में ही हुआ था। 

ओह ! तो ये बात है। 

अच्छा वो सब छोड़िये ! अब आप बताइये !क्या आपकी हवेली में,ऐसी किसी लड़की का विवाह हुआ है ?या उस गांव में और भी हवेलियाँ हैं। 

मैं ऐसे कैसे बता सकता हूँ ?उसका कोई नाम ,पता याद हो तो, पता चले। वैसे आपको बता दूँ ,उस गांव में एक ही हवेली है और वो हमारी है। 

अच्छा !ये बताइये ! आपकी शादी हो गयी ,रूही ने पूछा। 

नहीं, अभी नहीं हुई , सच कहूं तो मैं यहां किसी लड़की की तलाश में ही आया था। एक बात पूछ सकता हूँ ,क्या आपका विवाह हो गया ?

उसकी बात सुनकर रूही शरमाते हुए, नजरें झुकाती है और कहती है -अभी नहीं ,

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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