कहने को ये है,[मातृभाषा ] ''मदर टंग ''
बोलने वाले, सुनते रह जाते, अक्सर दंग !
यह बस माध्यम है ,भावों को बतलाने,समझाने का ,
मृदु -कटु,भंडार भरा, शब्दों की पहचान बनाने का।
हिंदुस्तानी हैं,' हम' हिंदी से ही, सबका मान है।
हिंदी की बिंदी ने ही बढ़ाया, सबका सम्मान है।
कभी आते क्लिष्ट शब्द , नई जिव्ह्या को देते कष्ट,
''रोमन लिपि ''से पढ़े बच्चे, हिंदी से हो जाते त्रस्त !
'भाषा' बनी है एक ,रहतीं इसकी सखियाँ अनेक !
ब्रजभाषा ,बुन्देल खंड से बुंदेली , अवधी, भोजपुरी ,
मैथिली , हरियाणवी ,मेवात ,सखी इसकी जयपुरी।
यह न जाने, हरियाणे से ले, कहाँ -कहां घूम आई ?
विभिन्न बोलियों के रूप में, छाप अपनी, छोड़ आई।
कभी कड़वी,कभी मीठी,कभी भावों भरी, संस्कारी लगती है।
ये बोलने वाले पर निर्भर करता, किस जुबान से निकलती है ?
अ ,आ से ले , कोमल -कटु , दीर्घ -प्लुत, शब्दों का भंडार है।
यह लगती हिंदुस्तान की शान है, हिंदी की ''बिंदी'' महान है।
