पारो ,रूही का मन लगाने के लिए उसे ,नवरात्रि के'' गरबा 'और' डांडिया रास' में ले जाती है किन्तु वो वहां के वातावरण की मस्ती में इतनी खो जाती है कि उसे ध्यान ही नहीं रहता कि उसके साथ रूही भी आई है ,वो तो भला हो, उस लड़के' गर्वित; का जिसने,उन आवारा लड़कों से रूही को बचा लिया किन्तु अब रूही को लग रहा है ,वो उसके; पल्ले पड़ गया है', उसका पीछा ही नहीं छोड़ रहा है। अब ऐसी अनजान जगह में 'रूही' जाये भी तो कहाँ जाये और कैसे जाये ?' गर्वित' भी उसको छोड़कर जाना नहीं चाहता था। रूही के व्यवहार से उसे लग रहा था ,या तो ये मुझ से ड़र रही है ,या फिर मुझसे पीछा छुड़ाना चाहती है। तब वो रूही से पूछता है ,आपको मुझसे ड़र तो नहीं रहा।
नहीं नहीं , मैं भला आपसे क्यों डरने लगी ? आप कोई भूत हैं, आपने तो मुझे उन आवारा लड़कों से बचाया है ,कहते हुए रूही ने, उसकी तरफ देखा, उसके हृदय में एक कंपन सा हुआ, मष्तिष्क की शिराओं में रक्त संचार तीव्रगति से दौड़ने लगा। इस चेहरे को मैंने कहीं तो देखा है, तुरंत ही उसने ,उसके चेहरे से अपनी नज़रें हटा लीं,यह दोस्त है या दुश्मन !मुझे इसका विश्वास करना चाहिए या नहीं ,अभी वह यही सब सोच रही थी। तब तक वहाँ दो आइसक्रीम लेकर, एक लड़का उपस्थित हो गया था जो आइसक्रीम बेच रहा था।
लीजिए, खाइए !
मैं यहां आइसक्रीम खाने नहीं आई हूं, रूही थोड़े तीखे स्वर में बोली -आज मेरा व्रत है।
आपने पहले क्यों नहीं बताया ?क्या इस व्रत में ,आइसक्रीम भी नहीं खा सकते ?
पता नहीं ,
यह बात मैं जानता हूं, आइसक्रीम दूध से बनी होती है ,इसको खाकरआपका कोई व्रत टूटने वाला नहीं है , हम नृत्य भी कर सकते हैं।
मैं भला, तुम्हारे साथ क्यों नृत्य करूंगी ?
क्योंकि तुम्हारी बहन अभी तक नहीं आई है और मेरी जिम्मेदारी बन जाती है तब तक तुम्हारे साथ रहूं। कहते हुए ,उसने एक आइसक्रीम रूही की तरफ बढ़ा दी। रूही ने चुपचाप वह आइसक्रीम ले ली। भीड़ में इतने लोग मौज मस्ती कर रहे थे किंतु तब भी रूही अपने को अकेला महसूस कर रही थी, यह बात अवश्य थी कि उस लड़के के कारण, वह अपने को सुरक्षित महसूस कर रही थी किंतु उस लड़के को देखकर भी उसे लग रहा था, जैसे इसको कहीं देखा है , इससे कोई तो संबंध है।
क्या सोच रही हो ?
कुछ भी तो नहीं ,
तुम्हें चिंता हो रही होगी ,तुम्हारी बहन नहीं आई तो क्या होगा ?
वो क्यों नहीं आएगी ?जब भी उसे मेरी याद आएगी ,वो मुझे ढूंढते हुए अवश्य ही आ जाएगी। हो सकता है ,अभी भी वो मुझे ढूंढ़ रही हो।
हम लोग इतनी देर से बातें कर रहे हैं किन्तु मैंने, तुमसे तुम्हारा नाम एक बार भी नहीं पूछा।
क्या ,इसकी आवश्यकता है ?
यह क्या बात हुई ? हम जिससे मिले हैं, जिसके साथ खड़े हैं, बातचीत कर रहे हैं, कम से कम उसका नाम तो हमें मालूम होना चाहिए। मैंने तुम्हें अपना नाम कितनी सरलता से बता दिया था।
वैसे तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूँ ,मैंने तुम्हारा नाम पूछा नहीं था, तुमने स्वयं ही अपना नाम बताया था ।
यह तो अच्छी बात है, तुम्हें भी अपना नाम तुरंत ही बता देना चाहिए था वरना मैं तुम्हें क्या कह कर बुलाऊंगा ?
मुझे क्यों बुलाना है ? कुछ देर के पश्चात मेरी बहन आ जाएगी और हम दोनों अपने-अपने घर चले जाएंगे, इसकी कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
तुम कितनी रूखे दिल की हो, एक बार भी तुमने यह नहीं सोचा, जिस लड़के ने मेरी सुरक्षा की है कम से कम उसे नाम तो बताया जा सकता है।
धन्यवाद तो दिया था न.....
देखिये ! अब आप मुझे सता रहीं हैं , अच्छा ,ये बताओ !कल तो आओगी या नहीं।
कल आकर क्या करना है, आज ही मैंने यहां आकर, कौन सा'' तीर मार लिया'' ? नृत्य मुझे आता नहीं है,यहाँ आकर खोने का भय बना रहेगा। जिस स्थान पर तुम आये हो ,जब तक उस स्थान में घुलमिल न जाओ !वहां आकर तुम्हें आनंद न मिले, ऐसे स्थान पर जाना व्यर्थ है।
इस बात की आप फिक्र मत कीजिए, मैं स्वयं आपकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेता हूं।
क्यों ? मैं आपकी सुरक्षा पाने के लिए, यहां दोबारा क्यों आउंगी ?एक और एहसान मैं नहीं ले सकती।
आना चाहिए, मन लगता है, लोगों से मिलकर, बातचीत करके अच्छा लगता है। देखिए !मैं कल भी आऊंगा और आप भी आइएगा। आज हमने कुछ तो सीखा है ,कल कुछ और नया सीखेंगे !एक -दूसरे को जान लेंगे। मुझे तो नहीं लगता मैंने आज कुछ सीखा है। वह तो आपको यहां से जाने के पश्चात पता चलेगा,कि प्रेम की पहली सीढ़ी चढ़ी हैं।
यह आप क्या कह रहे हैं, मैं ऐसा कुछ सोच भी नहीं सकती।
क्यों, क्या किसी ने मना किया है,यह सब इंसान सोचता नहीं है ,अचानक हो जाता है। अब आप ये बताइये ! क्या आप एक लड़की नहीं है।
पारो को, जब रूही का स्मरण हुआ तो वह उसे ढूंढते हुए, उसी स्थान पर पहुंच गई उसे देखते ही बोली -रूही तू यहां है, मैं तुझे न जाने कहां-कहां ढूंढ रही थी ? तू किधर चली गई थी ?
मैं भीड़ से हटकर, एक अलग स्थान पर आ गई थी, नजरों के सामने से ही, न जाने तुम कहां हो ओझल हो गई।
हां, हम लोग, नाचते -गाते हुए मंच की तरफ पहुंच गए थे, तू अंदर क्यों नहीं आई ?
वहां क्या करती, बहुत भीड़ थी। रूही के करीब, खड़े हुए एक लड़के को देखकर पूछती है , यह कौन है ?
उसके इतना पूछते ही, गर्वित ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया और बोला - हाय !मेरा नाम 'गर्वित' है , मैं भी आपकी तरह ही यहां पर 'डांडिया रास' के लिए आया था किंतु आपकी बहन अकेली खड़ी थी और परेशान हो रहीं थीं इसीलिए मैं भी, इनके साथ खड़ा हो गया। यह तो बहुत डरती हैं, इनका ख्याल रखा कीजिए। कह कर वह जाने लगा, तभी वापस आया और बोला -रूही !रूही का अर्थ जानती हो ,रूही ने न में गर्दन हिलाई ,वो मुस्कुराते हुए बोला -शीघ्र ही जान जाओगी ,वैसे सब लोग बुरे नहीं होते, तुम्हें भी लोगों से मिलना चाहिए इस तरह एकाकी जीवन कब तक व्यतीत करोगी ? कह कर आगे बढ़ गया।
रूही उसे जाते हुए देख रही थी ,तब पारो ने पूछा -ये क्या कह रहा था ?
बहुत बक -बक करता है ,कहते हुए वो भी आकर अपनी गाड़ी में बैठ गयी।
