गाड़ी में बैठकर ,पारो ने रूही से पूछा -क्या वो तुझ पर, लाइन मार रहा था ? उसने स्पष्ट शब्दों में इस तरह पूछा ,रूही झेंप गयी और बोली -पता नहीं , जब मुझे वो बदमाश लड़के छेड़ रहे थे ,तब उसने, मुझे उन बदमाश लड़कों से बचाया था।
क्या फिल्मी हीरो की तरह मारधाड़ भी हुई ,या फिर वो तुम्हें ऐसे ही, प्रभावित करने का प्रयास कर रहा था।
उसने एक लड़के को तो मारा भी था,उसके एक ही धक्के में, उसकी नाक से रक्त बहने लगा था ,बाक़ी को समझाया था फिर वहां से वे लोग चले गए।
क्या इतनी जल्दी सब सुलट गया ? उन्होंने बदला नहीं लिया ,पारो को आश्चर्य हो रहा था।
नहीं, धमकी देकर चले गए।
तब तो अवश्य ही, उसकी कोई चाल होगी ,यह सब खेल उसने तुम्हें यानि अकेली लड़की को, प्रभावित करने के लिए खेला होगा।
कैसा खेल ? फिर भी मैं तुम्हें बता दूँ ,मैं उससे प्रभावित नहीं हुई ,तब भी मुझे लगा...... कहते -कहते रूही चुप हो गयी।
क्या लगा ?सजीला नौजवान तो है किन्तु आजकल ऐसे लड़के, लड़कियों को पटाने के लिए अपने ही लाये गुंडों को पीटकर, लड़की को प्रभावित करते हैं। वैसे, तुझे क्या लगा ?उसकी आँखों में झांकते हुए पारो ने पूछा।
कुछ नहीं, रूही ने बात टालने का प्रयास किया।
कुछ तो है ,बता न.... क्या उस पर,तेरा दिल आ गया है ?दबाब बनाते हुए पारो ने पूछा।
नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।
फिर कैसी बात है ?जब तक बताएगी नहीं तो पता कैसे चलेगा ?उसके चेहरे की तरफ देखते हुए पारो ने पूछा।
वो.. तो... मैं... यह कहना चाह रही थी ,अटकते हुए रूही बोली -तुम फिर ये मत कहना मैं वही बात दोहरा रही हूँ।
क्या ??कुछ कहेगी भी या ऐसे ही गोलमोल घुमाती रहेगी ?
दरअसल वो भी, मुझे देखा हुआ सा लगा ,जैसे उससे पहले कभी,कहीं मिल चुकी हूँ ,अब वो मित्र है या शत्रु !ये मालूम नहीं।
धत तेरे की,'खोदा पहाड़, निकली चुहिया '' इसमें इस बात को इतना रबड़ की तरह खींचने की क्या बात थी ?ऐसे ही बता देती ,अब तो हम लोगों को इस बात की आदत हो गयी है ,कहते हुए हंसने लगी ,तभी एकाएक गंभीर हो गयी और बोली -उसे देखकर कुछ और स्मरण हुआ।
नहीं ,वही तो याद नहीं आ रहा।
ठीक है ,जब उस ऊपरवाले ने जब उससे मिलवाया है, तो कुछ सोचकर ही मिलवाया होगा। घर में ,किसी ने भी पारो से उन महात्मा के विषय में कुछ नहीं बताया था किन्तु पारो के शब्द सुनकर रूही को उनकी बातें स्मरण हो आईं ,तब वो बोली - मैं उससे प्रभावित नहीं हुई ,तुम कोई गलतफ़हमी मत पाल लेना।
रूही को आश्चर्य हो रहा था, उसे मैंने अपना नाम भी नहीं बताया था , तब भी, उसे मेरा नाम कैसे पता चला ? अब तो वो यहाँ है भी नहीं वरना उससे पूछती, किंतु अपना व्यवहार अपनी बातें ,कुछ स्मृतियां, रूही के ज़ेहन में छोड़ गया। रूही सोच रही थी ,आखिर मैंने इसको कहां देखा है ? मैंने पारो से कह तो दिया है किन्तु इसे तो मेरी यह सब बातें भ्रम लगती हैं किन्तु न जाने, आज कैसे इतनी शीघ्र मान गयी ?मन ही मन रूही सोच रही थी ,उसने कितनी देर तक,मुझसे अच्छी बातें कीं,क्या वो मुझे प्रभावित करना चाहता था ?ऐसा लगता तो नहीं था। तब रूही, पारों से कहती है -कल को मैं नहीं आऊंगी ,तुम , मुझे छोड़कर ना जाने कहां चली गई थीं ? तुझे पता है, यदि वह लड़का नहीं होता, तो मेरा क्या होता ?
अरे ! कुछ नहीं, तू चिंता मत कर, कुछ नहीं होगा, ऐसा लगता है लेकिन ईश्वर सब की रक्षा करता है पारो लापरवाही से बोली।
गाड़ी में बैठी, रूही चुपचाप सोच रही थी-' क्या मुझे कल जाना चाहिए ?वैसे रूही शब्द का क्या अर्थ हो सकता है ,ये तो मैंने कभी नहीं सोचा था ,मेरे नाम का भी कोई अर्थ भी हो सकता है ,तभी वो पारो से पूछती है -'रूही' शब्द का क्या अर्थ है ?
पारो ने मुस्कुराते हुए पूछा -क्यों ,क्या तुम्हें नहीं मालूम ?
मैं तुम्हारे जितनी पढ़ी -लिखी तो नहीं हूँ इसीलिए कभी इस ओर ध्यान ही नहीं गया ,कभी जरूरत भी महसूस नहीं हुई।
तब आज कैसे ?कहते हुए पारो ने मुस्कुराते हुए अपनी भोंहे हिलाई ,क्या उस अनजान ने पूछा था ?क्या नाम था उसका ,स्मरण करते हुए बोली -हाँ ,याद आया 'गर्वित ''
नहीं ,मैं ही जानना चाहती हूँ ,क्या हमारे नाम के भी कुछ अर्थ होते हैं।
हाँ -हाँ क्यों नहीं ,जैसे मेरा नाम 'पार्वती' है ,जो शिव की अर्धांगनी थी ,और पर्वतराज की पुत्री थी ,इसीलिए उनका नाम पार्वती रखा गया था ,उसी तरह तुम्हारे इस छोटे से नाम का भी प्यारा सा अर्थ है -जो रूह से जुडी हो यानि जो रूह को छू जाये। जब वे लोग घर पहुंच गई और गाड़ी से उतर रही थीं ,तब पारो बोली - आओ, चलो !आज तुम्हारे इश्क की कहानी मौसाजी और मौसीजी को भी सुनाते हैं ,कहते हुए हंसने लगी।
पारो की बात सुनकर, रूही ने मुंह बनाया और बोली -आप मेरी बहन हो ना, आप घर में किसी से कुछ भी नहीं कहेंगी वरना मैं भी, आपकी बात बता दूंगी।
मेरी बात ! मेरी कौन सी बात ?हालाँकि रूही ,पारों के विषय में ज्यादा कुछ नहीं जानती थी , इन चंद मुलाकातों में ही, उसने, पारो को जाना था, तब भी बोली -आपका भी कोई दोस्त है , उसी के कारण तो आप वहां रहती हैं, क्या मैं समझती नहीं हूं ?
तुम कुछ भी नहीं समझती हो, कहते हुए, पारो उससे आगे -आगे दौड़ी और पीछे- पीछे दौड़ते हुए रूही आई। घड़ी में बारह बज रहे थे , डॉक्टर साहब और तारा जी, दोनों अपने शयन कक्ष में थे ,सो ही गए थे, किंतु बच्चों के आने की आहट सुनकर, तारा जी की नींद खुल गई और वो बाहर आई। दोनों लड़कियों को इस तरह हंसते- खिलाखिलाते हुए देखकर बोलीं - दोनों ने,कैसे दौड़ लगा रखी है ? समय देखा है, कितना हुआ है ?12:00 बज रहे हैं।
हमने तो मौसी जी आपसे पहले ही कह दिया था कि हमें आने में देरी हो जाएगी कहते हुए ,वहीं सोफे पर बैठकर अपने सैंडल निकालने लगी।
तारा जी ने, रूही की तरफ देखा, उसके चेहरे पर भी मुस्कुराहट थी, यह देखकर उन्हें अच्छा लगा और बोली -आज तो लगता है ,खूब मजे किए, आनंद आया।
रूही कुछ कहने ही वाली थी, तभी पारो ने हाथ के इशारे से, रूही से कुछ भी बताने से , मना कर दिया। तब रूही अपने कमरे में चली गई। रूही के जाते ही तारा जी भी, अपने शयन कक्ष की तरफ चल दीं और पारो से बोलीं - जब सोने जाओ तो, बैठक की लाइट भी बंद कर देना।
उनके जाने के पश्चात, अचानक ही पारो को जैसे, बहुत क्रोध आया, वह अपने कमरे में गई, अपने वस्त्र उतारकर वहीं फेकें और जो सैंडल हाथ में लिए हुए थी, वे भी इधर-उधर फेंक दिए, मैं कितना भी कर लूं , पता नहीं ,यह लड़की कैसी है ? कब यहां से जाएगी , सोचती कुछ हूं और हो कुछ और जाता है , उसने क्रोध में पानी पिया और ऐसे ही, बिस्तर पर निढ़ाल हो गई।
