डॉक्टर साहब और उनके परिवार को'' सिद्ध बाबा'' से मिले हुए ,लगभग एक सप्ताह हो गया था किंतु रूही को अभी भी, डरावने सपने आने बंद नहीं हुए थे, वह अभी भी परेशान थी और इस उम्मीद में दिन व्यतीत कर रही थी ,कभी तो उसे, अपनी पिछली जिंदगी के विषय में पता चलेगा।
वहीं दूसरी तरफ ताराजी मन ही मन परेशान रहने लगीं थीं, अचानक ही उनके हृदय में एक घबराहट सी होने लगी थी, एक ड़र उनके ह्रदय में समाने लगा , यदि रूही को उसकी सभी स्मृतियाँ वापस आ जाती हैं, तो कहीं यह हमें छोड़कर चली ना जाए, अब इसके साथ रहने की जैसे ,आदत हो गयी है, अक्सर अपने अकेलेपन को सोचकर, घबरा उठतीं और डर जातीं , यह बात उन्होंने अपनी सहेली डॉक्टर अपर्णा से, ऐसे ही बातों ही बातों में कह दी थी किंतु अब सच में ही, उन्हें डर लगने लगा था।
एक दिन तारा जी ,डाक्टर साहब से, अपने ड़र को बताती हैं ,तब वो कहते हैं - इसमें ड़रने की कोई बात नहीं है ,बाबा ने कहा था -'अब वो हमारी बेटी है किन्तु यदि उसके जीवन की कोई भी परेशानी का हम समाधान कर सकें, तो इससे बेहतर क्या होगा ?वो खुश रहेगी तो हमें भी ख़ुशी होगी। लड़की तो पराया धन ही होती हैं ,एक न एक दिन तो हमें उसे अपने से अलग करना ही होगा,हाँ ,ये बात अवश्य है ,अब हम उसे अकेला नहीं छोड़ेंगे।
डॉक्टर साहब, के समझाने से ,तारा जी को अच्छा लगता है, अपने मन को बहलाती हैं , बाबा ने तो कहा था -यह मेरी बेटी है , जन्म देने वाली मां कोई दूसरी हुई तो क्या हुआ ? इसके पिता ने, इसे दूसरा जन्म दिया है।
अपने सपनों से परेशान होकर, रूही ने, तारा जी से पूछा -मम्मी ! बाबा ने तो कहा था,-मुझ पर देवी मां का आशीर्वाद है ,अब 'नवरात्रि 'भी आ रही है, क्यों न मैं, देवी मां के व्रत रख लूँ।
रूही के मुख से ऐसी बातें सुनकर, तारा जी को आश्चर्य हुआ और उन्होंने पूछा -क्या तुम यह सब कर पाओगी? यह एक दिन की बात नहीं है ,एक सप्ताह की बात है।
कोई बात नहीं, देवी मां, शक्ति देंगी , उनका आशीर्वाद मेरे साथ है, यह उसने पूर्ण विश्वास के साथ कहा -अवश्य ही कुछ अच्छा होगा। उस दिन वह तारा जी के साथ बाजार गई , तारा जी को बहुत अच्छा लग रहा था आज पहली बार मेरी बेटी, मेरे साथ बाजार में घूमने आई है। वहां से रूही ने, पूजा का सामान लिया और देवी मां की मूर्ति भी ली।
यह आश्चर्य की बात थी, जैसे ही देवी मां ने, घर में प्रवेश किया, घर में जैसे नकारात्मक शक्ति का , लोप हो गया, ऐसा लग रहा था, जैसे देवी माँ के घर में प्रवेश करते ही,घर में खुशियों की लहर दौड़ गई हो।बड़े प्रेम से रूही ने माँ का दरबार सजाया, सुबह -शाम- पूजा करना, व्रत रखना, यह सब बहुत अच्छा लग रहा था। उनके लिए ही नहीं , रूही के लिए भी एक और आश्चर्य की बात थी, उसी दिन से रूही को डरावने सपने आने बंद हो गए थे ,उसकी नींद भी पूरी हो रही थी। मन में अज़ीब सी शांति का एहसास था ।
उन्हीं दिनों, पारो ! घर पर आई और उसने रूही से पूछा -क्या तू, मेरे साथ चलेगी ?
कहां जाना है ?
तू चल तो सही, बताती हूं, वह बहुत उत्साहित होते हुए बोली - जब रूही,पारो के साथ जाने के लिए, तैयार होने के लिए अपने कमरे में गई, तब उसके सामने ,उसके बिस्तर पर एक थैला रखा मिला ,वह उस थैले को खोलकर देखने लगी ,इसमें ये क्या है ? उस थैले में कुछ रंग -बिरंगे वस्त्र उसे दिखलाई दिए ,इन्हें यहाँ कौन लाया ?अभी वो यही सब सोच रही थी ,तभी दरवाजे के पीछे छिपी खड़ी पारो हँसते हुए बाहर आई और बोली -ये सब तेरे लिए ही तो हैं ,मैं ही ये कपड़े लाई हूं , तुझे अच्छे लगे।
ये कैसे वस्त्र हैं ? ऐसे वस्त्र तो मैंने, आज तक नहीं पहने।
जरा पहनकर तो देख ! कुछ नई चीजें भी तो ट्राई करनी चाहिए ,हँसते हुए पारो बोली।
तभी अंदर से, तारा जी आते हुए बोलीं -देखें तो भला ! ऐसे वस्त्र पहनकर हमारी बिटिया कैसी लगेगी ?
ये कैसे कपड़े हैं ? होंठ बिचकाते हुए रूही बोली।
पहनने के लिए हैं, सेब खाते हुए, पारो ने जवाब दिया।
क्या सिर्फ मेरे लिए ही हैं ?
नहीं, मेरे लिए भी हैं लेकिन पहले तू पहन , देखू तो सही, तू कैसी लगती है ?
ऐसे कपड़े कभी भी रूही ने नहीं पहने थे, उसे बड़ा अजीब लग रहा था, कहीं ऐसा न हो इन कपड़ो को पहनने के पश्चात वो, मेरी हंसी उड़ाए। तू इन कपड़ों को पहन कर शीघ्र आ !लगभग डांटते हुए पारो ! रूही से कहते हुए उसके कमरे से बाहर आ गयी, अब पारो उस पर अधिकार सा जताने लगी थी। रूही ने भी कपड़े पहनकर अपने को आईने में देखा, उन रंग-बिरंगे कपड़ों में वह अच्छी लग रही थी , जब वह अपने कमरे से बाहर आई, तो सामने उसने पारो को देखा पारो भी, तब तक अपने कपड़े बदल चुकी थी। दोनों ने एक दूसरे को देखा और हंसने लगीं। तब पारो बोली -आज मैं, तुझे एक ऐसी जगह ले जाने वाली हूँ ,जहाँ पहुंचकर तुझे बहुत अच्छा लगेगा।
मम्मी को भी साथ ले चलते हैं, रूही ने कहा।
हां, वैसे मम्मी भी चल सकती हैं किंतु आज हम दोनों ही जाएंगे , हंसते हुए पारो बोली।
क्या इन्हीं कपड़ों में जाना है ?
और नहीं तो क्या ? इसीलिए तो बदलवाए हैं। अब कुछ भी, मत सोच ! तू कुछ ज्यादा ही सोचती है , कहते हुए, उसका हाथ पकड़ कर उसे बाहर खींच कर ले गई। चलते समय तारा जी से बोली -मौसी जी ! हमें आने में देर हो जाएगी, हमारी प्रतीक्षा मत करना ! उन कपड़ों को देखकर ताराजी समझ गई थीं, कि यह रूही को कहां ले जा रही है ? सोच कर मुस्कुरा दीं, अभी इसकी उम्र ही क्या है ? चलो अच्छा है, इसे कुछ नया देखने और सुनने को मिलेगा। पारो, रूही जिस स्थान पर गाड़ी से उतरे थे, वहां पहले से ही उनके जैसे कुछ लड़के -लड़की पहले से ही उपस्थित थे।
अरे, आओ !बड़ी देर लगा दी नंदिता ने कहा -अरे तुम तो बड़ी प्यारी लग रही हो , उसने रूही को देखते ही कहा।
क्यों ,क्या मैं अच्छी नहीं लग रही हूं ?
तुम तो पहले से ही अच्छी लगती हो, तीनों ने हंसते हुए अंदर प्रवेश किया।
उस स्थान पर बहुत चकाचौंध थी ,तेज रौशनी से वह स्थान जगमगा रहा था। काफी अच्छी सजावट की गयी थी। बहुत सारे लड़के- लड़कियां इसी तरह के कपड़ों में वहां घूम रहे थे ,देवी मां के गाने चल रहे थे। वे लोग नाच गा रहे थे। रूही उस भीड़ में,पारो और उसके साथियों के अलावा किसी को नहीं जानती थी , किंतु उनके नाच- गाने का आनंद ले रही थी। यह सब क्या है ? उसने पारो से पूछा।
