डॉक्टर साहब ,से जो कुछ भी महात्मन ने कहा ,उसको सुनकर डॉक्टर साहब ने, हाथ जोड़ दिए जिसके विषय में उन्होंने तारा जी को भी नहीं बताया था ,उन बाबा ने इशारा कर दिया। तब बाबा मुस्कुराते हुए बोले - ये अर्द्धजली हालत में, तुम्हारी गाड़ी के सामने आ गयी थी और वहीं ये अचेत भी हो गयी थी किन्तु तुम फिर भी इसे, अपने अस्पताल ले गए और इसको जिन्दा करने के लिए ,हर सम्भव प्रयास किया तब इसमें प्राण लौट आये।
उन बातों को तो जैसे डॉक्टर अनंत ने, भुला दिया था किन्तु आज बाबा ने पुनः स्मरण करा दिया, दूसरे डॉक्टर ने तो कह दिया था- डॉक्टर साहब !आप व्यर्थ में ही प्रयास कर रहे हैं ,अब यह जा चुकी है ,अब कोई लाभ नहीं है ,यदि ये जिन्दा भी हो गयी तो इसका जीवन व्यर्थ है ,आपने इसकी हालत देखी है।
यदि ये मेरी गाड़ी से आकर टकराई है ,तो अवश्य ही, ईश्वर ने कुछ सोचा होगा ,उन्हें, मुझसे उम्मीद होगी ,मैं इसके लिए कुछ कर सकता हूँ ,उनके विश्वास को बल मिला ,जब रूही ने, एक गहरी स्वांस ली। देखा ,प्रतीक ! इसे मेरी गाड़ी के सामने भेजकर, उन्होंने मेरी भी परीक्षा ली है ,मैं उनके दिए कार्य को सफलता पूर्वक कर पाता हूँ या नहीं। डॉक्टर साहब !अपनी सफलता पर प्रसन्न थे ,किन्तु काफी तक गए थे ,तब नर्स को सभी दवाइयां समझाकर घर आ गए थे ,सोचा था ,अगले दिन थोड़ा और स्वस्थ हो जाएगी ,तब इसका नाम -पता पूछकर, इसके घरवालों को सूचित कर देंगे किन्तु अगले दिन डॉक्टर साहब ने जब उस अपरिचित मरीज़ के विषय में नर्स से जानना चाहा तो पता चला ,वह रोगी तो कोमा में जा चुकी है।
तारा देवी न जाने, अपने मन में कितने प्रश्नों को लेकर आई थी? और सोच रही थी - गुरु जी, से यह पूछेंगे, वह पूछेंगे लेकिन उनके सामने आते ही निशब्द हो गई। उन्हें कोई प्रश्न ही नहीं सूझ रहा था, ऐसे लग रहा था जैसे उनके दर्शन मात्र से ही, सभी समस्याओं का समाधान पहले ही हो गया हो। गुरुजी, जो कुछ भी, हमने अभी आधा- अधूरा समझा है ,क्या हमें, आप पूरा समझाएंगे।
आप लोगों को इसका सहयोग करना होगा, अब यह जीवन की दूसरी लड़ाई लड़ने वाली है और जिसमें इसे जीतना है। जब यह घर पहुंच जाएगी तो धीरे-धीरे सब स्मरण होता चला जाएगा, थोड़ा धैर्य रखना ! यदि मैं अभी एक साथ इसको सब याद दिलवा देता हूं, इसकी स्मरण शक्ति लौटा देता हूं ,तो हो सकता है, यह उस ऊर्जा को सहन न कर सके। इसके पूर्व जीवन में, इसने बहुत कष्ट सहे हैं , अब यह निर्णय इसको लेना है कि आगे यह अपने जीवन में क्या करना चाहती है? यह इसका अपना निर्णय होगा। कहते हुए गुरुदेव ने, अपने हाथ आगे बढ़ा दिए और रूही अपने स्थान से उठकर, आशीर्वाद लेने के लिए उनके समीप आई।उसे ऐसा एहसास हुआ,जैसे उसके मन की सम्पूर्ण हलचल शांत हो गयी हो, जैसे उसके जीवन में शांति छा गई है, उसके जीवन की संपूर्ण परेशानियां, समाप्त हो गई हैं।
बाबा ! आप क्या यहीं रहते हैं ? तारा जी को तो उन पर जैसे श्रद्धा हो गई थी और वह उनसे दोबारा मिलने के लिए सोच रही थीं ।
नहीं, हमारा कोई घर नहीं है, हमारी जहां जरूरत होती है ,वहां पहुंच जाते हैं। मां बनने का तो तुम्हारा सपना पूर्ण हो ही गया है। पूर्व जन्म में भी यह तुम्हारी बिटिया थी, किंतु किसी कारणवश , इसे किसी और की बेटी बनना पड़ा। यह सब पूर्व जन्मों का ही परिणाम होता है, अंत भला तो सब भला ! कान्हा को भी तो मां देवकी ने जन्म दिया था किंतु पाला यशोदा मइया ने...... कहते हुए वो भी भाव -विभोर हो उठे , यह सब कर्मों के आधार पर परिवर्तित होता रहता है।
यदि आपसे दोबारा मिलना हो, आपसे कुछ पूछना है ,तो क्या करेंगे ?
जब आपको मेरी जरूरत महसूस होगी, स्वतः ही आप लोगों के सामने चला आऊंगा। इसका एक उपाय और भी है, यदि इसकी स्मृति आने में समय लगता है, तो यह आप लोगों को सोचना होगा , उस हवेली के द्वार पर पैर रखते ही, इसे सब कुछ स्मरण हो जाएगा किंतु बात वही है , हो सकता है, इसकी मानसिक स्थिति इतना दबाव सहन न कर सके। अभी थोड़ा धैर्य से काम लीजिए ! देवी मां की शक्ति इसके साथ है हमारा आशीर्वाद इसके साथ है, जल्द ही कुछ, सामने आएगा।
धन्यवाद ,गुरुजी ! आपने हमारी बहुत बड़ी समस्या का निदान किया है , जैसे ही वे लोग, उस कुटिया से बाहर जाने वाले थे,बाबा जी का स्वर गूंजा - शिखा, बिटिया ! अपना ख्याल रखना।
तीनों ने पलट कर देखा, कि गुरुजी यह किसके लिए कह रहे हैं ? मुस्कुराते हुए गुरुजी बोले -यही इसका असली नाम है।
वो लोग बाहर आ गए। गाड़ी में बैठे हुए थे, लेकिन किसी के मुंह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था। उन पलों को महसूस कर रहे थे जो अब तक उन्होंने गुरु जी के समीप व्यतीत किए थे। सब कुछ तो सत्य था, झूठ कुछ भी नहीं था। तभी तारा जी बोलीं -क्यों न हम इसे, इस हवेली में ले जाएं , उसे सब कुछ स्मरण हो जाएगा।
इतनी जल्दबाजी अभी उचित नहीं है, गुरुजी ने भी कहा है -जब समय आएगा, तो सब अपने आप होता चला जायेगा, हो सकता है यह उन स्मृतियों को सहन न कर सके और इसकी दिक्कतें बढ़ जाएं। अभी हमें धैर्य से काम लेना होगा।
तारा जी अपनी कोठी में थीं तभी एक फोन उनके लिए आता है, जब वह फोन उठाती हैं तो उधर से उनकी सहेली डॉक्टर अपर्णा का फोन था, वो कहती है - तारा ! तुम अपनी बेटी को लेकर हमारे घर नहीं आईं , क्या हुआ ? क्या अब वह ठीक है। दवाइयां तो ठीक से काम कर रही हैं या नहीं, तुमने कुछ भी जवाब नहीं दिया।
क्या जवाब देती ? अभी कई कार्यो में व्यस्त थी, इसलिए तुम्हें बताने का समय ही नहीं मिल पाया। वैसे वह अब ठीक है
क्या उसकी याददाश्त वापस आ गई है ?
नहीं, वापस तो नहीं आई है किंतु...... कहते-कहते रुक गई , कहना चाहती थी, कि बाबा ने अभी मना किया है, याददाश्त वापस लाने में अभी थोड़ा समय लगेगा, क्योंकि वे जानती हैं यदि मैं इससे बाबा की बात बताती हूं ? तो यह उन बातों पर विश्वास नहीं करेगी। विश्वास तो हमारे डॉक्टर साहब भी नहीं करते थे , किंतु जब से बाबा से मिले हैं, विश्वास करने लगे हैं, सोच कर मुस्कुराई और बोली - अब उसे आराम है और हम नहीं चाहते कि उसकी याददाश्त वापस आए। अब वह हमारी बेटी है, यदि उसकी स्मृति वापस भी आ गई, तो हो सकता है वह हमें ही भूल जाए।
हां यह तो हो सकता है, इसलिए तो अब एक मां का प्यार स्वार्थी हो गया है,कहते हुए तारा जी ने फोन रख दिया।
