Tulana

हरिशंकर प्रसाद जी बहुत परेशान थे, अस्पताल के अंदर ,अपने बेटे के कमरे के बाहर ,इधर-उधर बेचैनी से टहल रहे थे। उनके चेहरे पर, चिंता और परेशानी के बादल छाए हुए थे। कभी नर्स को इधर-उधर आते -जाते देख रहे थे और उम्मीद लगा रहे थे, कि कोई तो उन्हें अच्छी खबर सुनने को मिले, किंतु अभी तक कुछ भी नहीं हो पाया था। घर में उनकी पत्नी अलग से परेशान थी। 

तभी उनके एक मित्र उनसे मिलने के लिए आए और पूछा -अचानक ,यह क्या हो गया ? सब कुछ तो ठीक-ठाक चल रहा था। 


क्या बताऊं ?,कुछ समझ नहीं आता, आजकल के बच्चों को क्या होता जा रहा है ?

ऐसा क्या हो गया ? जो बेटे ने इतना बड़ा कदम उठा लिया। 

अब आप ही बताइए ! हम जो कुछ भी कर रहे हैं ,अपने बच्चों के भविष्य के लिए ही तो कर रहे हैं तो क्या हम उनसे यह उम्मीद भी नहीं लगा सकते ? कि वो भी ,अपने भविष्य के लिए सोचें और आगे बढ़ें ,उन्नति करें। लेकिन आजकल के बच्चे तो जैसे कुछ सुनना ही नहीं चाहते ,न ही समझना चाहते हैं। हम क्या उनके दुश्मन हैं ? हमने उन्हें पैदा किया, इस संसार में लाये, अपने सपनों को उनके भविष्य में देखने लगते हैं। बस यही तो हमारा छोटा सा संसार है।  तब हमारी भी उम्मीदें बन जाती है, कि हमारा बच्चा अपने जीवन में सफल हो। 

यह बात तो आप सही कह रहे हैं लेकिन क्या कर सकते हैं ?आजकल के बच्चे लापरवाह होते जा रहे हैं , मेहनत तो करते हैं किन्तु आजकल उनके सामने भी बड़ी चुनौतियां हैं। बच्चे भी घबरा जाते हैं, उन्होंने अफसोस जाहिर करते हुए कहा -' अभी एक दिन पहले का ही केस है, बच्चे भी नाजुक से हो गए हैं। एक अध्यापिका ने ,बच्चे को थप्पड़ क्या लगाया ?वो तो वहीं पर मर गया।  पता नहीं ,इस पीढ़ी को क्या होता जा रहा है ? कोई बच्चा इतना कमज़ोर कैसे हो सकता है ?

वही तो मैं कह रहा हूं ,मैंने भी तो अपने बेटे से यही कहा था -अपने जीवन के विषय में सोचो ! आज  के समय में संघर्ष सरल नहीं है ,किंतु इसकी लापरवाही कम नहीं हुई। दोस्तों के साथ, घूमता रहता था। उस दिन मैंने सख्ताई से उसे डांटा और उसने यह कदम उठा लिया। कहते हुए ,वो बेचैन और निराश से वहीं  बेंच पर बैठ गए। 

तभी एक नर्स आई, और बोली -अब आपके बेटे को होश आ गया है। 

''डूबते को जैसे तिनके का सहारा 'मृत तन में जैसे जान लौट आई ,एकदम से उठकर बोले -क्या मैं, उससे मिल सकता हूं ?

 हां, कुछ देर बाद ही मिल लीजिएगा।अभी 'डॉक्टर साहब 'आपको बुला रहे हैं। 

तब तक उनकी पत्नी भी आ गई थी ,वो बोलीं - मैं अपने बेटे के पास बैठ जाती हूं। मां की आंखों से आंसू थम नहीं रहे थे। क्या करें ?बेटे से कुछ कहना भी नहीं चाहते थे और मन में बहुत कुछ भरा हुआ था। क्या वह उनकी बातों को समझेगा ? बस उनके मन का दर्द उनकी आंखों से छलक रहा था। 

बेटे  को जब होश आया उसने अपनी मां को इस हालत में देखा, उसे दुख तो हुआ किंतु फिर से उसने, अपनी नज़रें फेर लीं। माँ समझ गयी ये अभी भी नाराज़ है। 

कुछ देर बाद डॉक्टर से मिलकर हरिशंकर प्रसाद जी भी आए और बेटे को देखकर बोले -अब कैसे हो ? 

कुणाल ने कुछ नहीं कहा, और चुपचाप नजरें झुका लीं। 

कुणाल एक सप्ताह अस्पताल में रहा, उसके पश्चात घर पर आ गया ,घर में मां और पिता उसका, अच्छे से ख्याल रख रहे थे किन्तु किसी ने, उससे कुछ नहीं कहा। तब धीरे-धीरे उसके दिमाग में यह विचार कुल बुलाने लगे -मेरे माता-पिता मेरा कितना ख्याल रखते हैं ? मेरे लिए कितने परेशान हैं ,फिर मैंने ऐसा कदम क्यों उठाया?

 उन्होंने, उससे कुछ भी नहीं कहा, अब वह चाहता था कि वो पहले की तरह उससे वही व्यवहार करें, उससे बातचीत करें। उसे समझाएं ! किंतु दोनों ने कुछ नहीं कहा ,कुछ दिनों के उनके इस व्यवहार से वह स्वयं  ही परेशान हो गया। तब वह बोला -मम्मी ! क्या आप लोग मुझसे नाराज हैं ?

नहीं, हम क्यों नाराज होंगे ?हमारे लिए आज तुम जिन्दा हो हमारे साथ हो यही बहुत है। 

मुझे माफ कर दीजिए ,मुझसे  बहुत बड़ी गलती हो गई। 

मां की आंखों से आंसू बहने लगे वो बोलीं - यह गलती नहीं थी, यह तुम्हारा 'गुनाह 'था। क्या तुम्हें लगता है ? हम तुम्हारे दुश्मन है। 

तब तक उसके पिता भी आ गए थे, वो बोले - बेटा कैसे हो ?

 मैं ठीक हूं, पापा !

उसके इतना कहने पर वो बाहर जाकर बैठ गए। कुणाल को लगा,अब इनका व्यवहार  बहुत अलग हो गया   है पहले, लगता था जैसे मैं अपने घर में हूं ,मेरे माता-पिता मेरी परवाह करते हैं ,किंतु अब ऐसा लगता है जैसे मेरे माता-पिता मुझसे ही बात करते हुए डर रहे हैं। अब वह अपनापन नहीं लग रहा था।

तभी उसके पिता अंदर आकर बोले -तुमने ऐसा कदम क्यों उठाया ? कहते हुए रोने लगे। कुणाल ने ,आज से पहले पापा को इतना कमजोर कभी नहीं देखा था। उसने अपने पापा का हाथ पकड़ा और रोते हुए बोला -पापा !मुझे माफ कर दीजिये !अचानक ही न जाने मुझे क्या हो गया था ?

तुम ही बताओ !तुम्हारे सिवा हमारा इस दुनिया में कौन है ?यदि तुम्हें कुछ हो जाता तो हम क्या करते ?हमारे जीवनभर की पूंजी तुम ही तो हो। 

पापा !आपने मेरी' तुलना 'रघुवीर से की थी इसलिए मुझे क्रोध आ गया था ,मुझे लगा ,जब देखो !आप उसे मुझसे श्रेष्ठ समझते हैं। 

ऐसा नहीं है ,बेटा !कुणाल की माँ बोली -भला, हमारे लिए ,तुमसे बेहतर कौन हो सकता है ? तुम ये सोचो !हम तुम्हारी परवरिश कर रहे हैं, अपने जीवन का कितना बड़ा हिस्सा ,तुम्हारे लिए सोचने और तुम्हारा सुखद भविष्य बनाने में बिता देते हैं ? क्या इसीलिए कि उनका बच्चा अपने अभिभावकों की बातों पर ध्यान न देकर लापरवाही करे और जब वे उससे सख्ताई से पेश आये तो जहर खा ले। 

ये क्या  बात हुई ? यदि कोई माता -पिता अपने बच्चे को किसी का उदाहरण देकर समझा रहे हैं तो इसका मतलब ये नहीं, कि वे उसे नीचा दिखाना चाहते हैं बल्कि उस इंसान से तुलना करके अपने बच्चे में भी, आगे बढ़ने ,जागरूक होने की प्रेरणा देना चाहते हैं ,ताकि उनका बच्चा भी किसी के लिए उदाहरण बन सके।

 क्या बड़े -बड़े लोगों का उदाहरण नहीं दिया जाता ?'कि देखो !उन्होंने अपने जीवन में किन परिस्थितियों में रहते हुए, कितनी उन्नति की ?इसी प्रकार बच्चे के सहपाठी या किसी मित्र के साथ तुलना करके उसे समझाना चाहते हैं कि उनका बच्चा भी अपने भविष्य के लिए जागरूक हो ,आगे बढ़े !असल में तो वे अपने बच्चे की उन्नति ही चाहते हैं किन्तु बच्चे उसका उल्टा ही अर्थ निकाल लेते हैं, जैसे तुमने समझा !

यदि तुम्हें कुछ हो जाता ,तो हम किसके लिए जीते ? जब माता -पिता बच्चे से प्यार करते हैं तो बच्चे की भलाई के लिए डांटना भी पड़ता है। हम तुलना नहीं कर रहे थे बल्कि समझाना चाहते थे ,आगे बढ़ने के लिए परिश्रम आवश्यक है किसी का उदाहरण तो देना ही पड़ता। इससे हमारा, तुम्हारे प्रति जो प्रेम है ,वो कम नहीं हो जाता। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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