डॉ अनंत,' बीजापुर' गांव से निकलकर' गूची' गांव में प्रवेश करते हैं और उन महात्मा को ढूंढते हैं जिनसे मिलने के लिए वो घर से निकले थे। जब उन महात्मा का पता पूछते हुए, गांव से बाहर, जंगल में एक कुटिया के समीप पहुंच जाते हैं। जहां पर एक छोटी सी फुलवारी भी थी। वो आसपास का वातावरण देखते हैं,वहां बहुत ही शांति थी ,उन्हें विश्वास था कि इतने पहुंचे हुए संत के इर्द -गिर्द बहुत भीड़ होगी। किन्तु उन्हें , उस समय वहां कोई नजर नहीं आया ,उन्हें लग रहा था, कहीं हम गलत जगह तो नहीं आ गए , तब बाहर खड़े होकर, अपनी शंका के समाधान के लिए पूछते हैं -कि क्या कोई यहां है ?
तब उस कुटिया के अंदर से एक दुबला सा नौजवान, कुटिया के बाहर निकलता है और कहता है -आइये ! आपकी ही प्रतिक्षा हो रही थी।
उसके मुख से यह शब्द सुनकर, डॉक्टर अनंत और तारा जी को आश्चर्य होता है, तब डॉक्टर आनंद को लगता है, शायद ,इन्हें कोई गलतफहमी हुई है, इसलिए वो कहते हैं - मैं डॉक्टर अनंत और ये मेरी पत्नी हैं ,हम दूर शहर से आये हैं ,हमें महात्मा जी से मिलना है।
हां, स्वामी जी, सब जानते हैं, उन्होंने ही आपको बुलाने के लिए भेजा है ,अपनी बेटी को अंदर ले आइये !
उसकी यह बात सुनकर उन्हें, बहुत आश्चर्य होता है क्योंकि अभी तक, तारा तो गाड़ी में ही थी, लगता है ,ये सच में ही कोई अंतर्यामी पुरुष हैं। तब वो अपनी गाड़ी के समीप गए ,रूही, अभी भी अचेतावस्था में ही थी, इसे कैसे उठायें ? तारा जी , ने अपने पति से पूछा।
जब गुरूजी ने बुलाया है ,उठाना तो होगा ही, उन्होंने ,रूही की नब्ज़ देखी और बोले - बेटा उठो ! स्वामी जी ने बुलाया है, उनके का इतना कहते ही रूही उठ बैठी,जैसे उसे कुछ हुआ ही नहीं था , दोनों ने आश्चर्य से एक -दूसरे को देखा ,डॉक्टर अनंत, तारा जी के साथ रूही को लेकर ,उस छोटी सी कुटिया के समीप पहुंचते हैं । मन ही मन सोच रहे थे -क्या बाबा इस कुटिया से बाहर नहीं आ सकते हैं ? क्या हम तीनों इस कुटिया में आ जाएंगे ? यह स्थान, इतना छोटा है, शायद हम इसके अंदर ठीक से बैठ भी नहीं पाएंगे।
तभी पीछे से वही वो दुबला सा व्यक्ति कहता है ,आप इसकी चिंता न करें ,आप अंदर चलिए !कहते हुए पहले वो उस कुटिया में प्रवेश कर गया।
जब वह लोग अंदर गए, तो देखा,वह स्थान काफी साफ -सुथरा था, एक संत, एक ऊंचे स्थान पर चटाई पर बैठे हुए थे। पास में ही दो तीन चटाईयां और बिछी हुई थीं, उनके नेत्र बंद थे , जैसे, ध्यान में मग्न हैं ,उनके दर्शनमात्र से ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे सम्पूर्ण कष्टों का निवारण हो गया। उनके चेहरे पर अद्भुत तेज़ था। जैसे ही डॉक्टर अनंत ने और उनका परिवार उस कुटिया में प्रवेश करते हैं ,वो स्थान बहुत बड़ा नजर आ रहा था। कहीं ये हमारा भ्र्म तो नहीं ,आस -पास देखकर डॉक्टर अनंत ने सोचा।
तब उन महात्मा ने अपने नेत्र खोलकर पूछा -यहां आने में कोई परेशानी तो नहीं हुई, आप सोचते बहुत हैं ,जहाँ भीड़ नहीं होती ,क्या वहाँ संत निवास नहीं कर सकते ? बाबा ने ही उनसे प्रश्न किया।
जी नहीं, तारा देवी ने जवाब दिया ,ऐसी तो कोई बात नहीं है, कहते हुए हाथ जोड़ दिए,हमें लग रहा था , आप कहीं चले तो नहीं गए।
आपका सोचना सही है ,हम कहीं भी रमण करने लगते हैं, किन्तु यहाँ जिस उद्देश्य से आये हैं ,वो तो पूर्ण करना ही था इसीलिए यहाँ ठहरे हुए थे। ज्यादा भीड़ से, हमारी भक्ति में बाधा आती है इसीलिए हमने लोगों से मिलने का समय तय किया हुआ है। अब, आप अपना स्थान ग्रहण कीजिए !
जब वे तीनों वहां बिछी चटाइयों पर बैठ गए, तो बाबा ने मुस्कुराते हुए ,पूछा -बैठने में कोई असुविधा तो नहीं हो रही है, आप बड़े चिंतित नजर आ रहे थे, इस छोटी कुटिया में आप कैसे समाएंगे ? अब आप ही देख लीजिए कितना स्थान है ? उनके कहने पर, डॉक्टर अनंत ने अपने आसपास देखा, वे सोच रहे थे - अभी तो यहां पर आठ -दस लोग और बैठ सकते हैं, यह कैसा चमत्कार है ?
यह सब प्रभु का चमत्कार है , वो अपने भक्तों की इच्छा जानते हैं, उनकी परेशानी को भी समझते हैं। वैसे यह आपने बहुत अच्छा किया , जो इस बिटिया को, उसकी ससुराल घुमा लाये।
मतलब !हम कुछ समझे नहीं, तारा जी ने प्रश्न किया।
आप लोग, अभी बीजापुर गांव से आ रहे हो, वही तो इसकी ससुराल है , मेरा आधा कार्य तो उस गांव के मंदिर के पुजारी जी ने ही कर दिया। बताओ, बेटा ! अब कैसा लग रहा है ? तुम्हारी स्मृतियां धूमिल पड़ गई हैं , माता रानी का आशीर्वाद तुम्हारे माथे पर लगा है , वह धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगेंगीं , तुम्हें जो स्वप्न आते हैं। वह तुम्हें याद दिला देना चाहते हैं कि तुम्हारी यात्रा अभी यहीं पर समाप्त नहीं हुई है ,तुम्हें अभी और आगे जाना है। क्या उस गांव को देखकर, तुम्हें कुछ स्मरण हुआ था ?
जी, गुरु जी ! मुझे लगा तो था जैसे मैं उन सड़कों पर, पहले भी कभी आई हूं, वहां के दृश्य पहले भी कभी देखे हैं किंतु याद नहीं आ रहे थे।
अब धीरे-धीरे याद आ जाएंगे, तुम्हें अपना अधूरा कार्य जो पूर्ण करना है इसीलिए तो तुम इस संसार में मरने के पश्चात भी पुनः लौट आई।
गुरुदेव ! यह आप क्या कह रहे हैं ?
डॉक्टर साहब, तो सब जानते हैं, तुम उनकी गाड़ी के सामने आई नहीं थी, लाई गई थीं क्योंकि नियति ने तो यही रचा है। अब यहां तुम्हें कोई पहचान भी नहीं पाएगा क्योंकि तुम्हारा स्वरूप ही बदल चुका है और जब तुम्हें सब कुछ याद आ जाएगा तब तुम्हें एहसास होगा कि तुम्हारा क्या कार्य अधूरा था ?जो तुम्हें पूर्ण करना है। तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे लिए चिंतित भी हैं और प्रसन्न भी हैं क्योंकि उन्हें मालूम ही नहीं है कि तुम कहां हो? किस दौर से गुजर रही हो , वो तो बस यही जानते हैं, हमारी बेटी, विदेश में घूमने गई है। सही तो है, इस जीवन से परे, तुम दूसरी दुनिया में घूम कर आ गई हो और इस बात का तुम्हें भी आभास नहीं है क्योंकि तुम्हारे जीवन दाता तो अब यही डॉक्टर साहब है, जिनकी तुम बेटी हो,क्यों डॉक्टर साहब !मैं सही कह रहा हूँ न.....
जी ,कहते हुए डॉक्टर अनंत ने हाथ जोड़ दिए।
दोनों माँ -बेटी उनकी तरफ आश्चर्य से देख रहीं थीं।
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