Mysterious nights [ part 118]

 अगले दिन जब पारो और रूही उठीं , उस अलसाई सुबह की धूप ,उनके कमरे की खिड़कियों से छनकर आ रही थी ,जिससे आभास हो रहा था ,उन्होंने उठने में काफी देर कर दी ,तब घड़ी में समय देखा तो आठ बज रहे थे किन्तु अभी भी आलस्य ऐसे ही, बना हुआ था। रूही न जाने, क्या सोच रही थी ? उसके मन में, अनेक विचार आ जा रहे थे। उधर दूसरी तरफ पारो भी ,अपने ही विचारों में खोई थी किन्तु उसके विचार उसे नकारात्मकता की तरफ ले जा रहे थे। 

 पारो को, मन ही मन बहुत क्रोध आ रहा था ,न जाने ,ये कहाँ से आ गयी ?मेरी ज़िंदगी में अड़चनें क्या कम थीं ,जो ये अड़चन बनकर आ गयी। सोच रही थी ,शीघ्र ही, इसका परिवार ढूंढवा दूंगी और इससे छुटकारा मिल जायेगा किन्तु ये तो, जाने का नाम ही नहीं ले रही है। मौसा जी और मौसीजी को तो न जाने, इस पर क्या विश्वास हो गया है ? कहीं इसने, इन पर कोई जादू तो नहीं कर दिया ? ऐसी गांव की लड़कियां सीधी  बनी रहती हैं और अपना'' उल्लू सीधा करती रहती हैं।'' लेना एक न देना दो ''इस घर पर कब्जा करके बैठ गई है, इस घर पर ही क्यों मौसा जी और मौसी जी पर भी कब्जा किए हुए हैं, न जाने कब इस घर से जाएगी ? क्या सोचा था क्या हो गया ?


पारो , बेटा !आज उठना नहीं है , घड़ी में समय तो देखो! कितना हो गया है ? यदि छुट्टी है, तो क्या आराम ही करती रहोगी ?पेट को भूख भी लगती है। 

आई, मौसी जी ! कहकर वह बाहर आती है और अपनी मौसी से गले लगते हुए कहती है -गुड मॉर्निंग मौसी जी !

तुम्हारी इस समय गुड मॉर्निंग हो रही है, समय तो देखो !क्या हो रहा है ?

इतना ज्यादा भी नहीं हुआ है ,शहरों में इससे भी देरी से उठते हैं ,आप ही न जाने क्यों ?इतनी शीघ्र उठ जाती हैं ,आप तो जानती ही हैं, आते समय हमें कितनी देरी  हो गई थी ?

हाँ ,वो तो मैं जानती हूँ ,डॉक्टर की पत्नी हूँ ,भई !हमारा स्वस्थ रहना तो बनता है ,यदि हम ही बिमार होंगे तो तुम्हारे मौसाजी के पास कौन दिखाने आएगा ? रोगी तो यही कहेंगे -ये स्वयं ही स्वस्थ नहीं हैं ,हमें कैसे ठीक करेंगे ?कहते हुए वो मुस्कुराने लगीं जैसे उन्होंने कोई चुटकुला सुनाया हो ,कुछ देर ठहरकर बोलीं -अच्छा, यह बताओ !वहां रूही का मन तो लगा था या नहीं ,

हां, हां, वह बहुत खुश थी, खूब मजे कर रही थी , उसने खाने की मेज पर से एक सेब उठाया और खाने लगी। 

यह क्या कर रही हो ? कम से कम ब्रश करके मुंह तो धो लेतीं। 

वह सब बाद में हो जाएगा, अभी तो बड़ी जोरों की भूख लगी है, खाने में क्या है ?

तुम्हारे मौसा जी के लिए तो मैंने ओट्स बनवाये हैं, तुम दोनों के लिए दही के साथ,आलू के परांठे !

वे, मुझे बहुत पसंद है,खुश होते हुए पारो बोली। 

 मैं जानती हूं इसीलिए तो बनवाए हैं। जरा देखो तो सही, अभी रूही उठी है या नहीं ,इस लड़की को पता नहीं क्या हो रहा है ?चिंतित स्वर में तारा जी बोलीं। 

 लापरवाही से पारो बोली -जब भूख लगेगी ,तो उठ जाएगी, तभी ऊपर से सीढ़ियों से नीचे आते हुए, रूही दिखलाइ दी , आ गई ,'शैतान का नाम लिया और शैतान हाजिर' कहते हुए हंसने लगी, किंतु यह उसने अपने मन की बात कही थी। 

रूही के चेहरे पर गंभीरता थी , तारा जी घबरा गई उन्हें लगा, शायद इसने फिर से कोई बुरा स्वप्न देख लिया है। 

क्या हुआ ?बेटा ! तुम ठीक तो हो , उनको रूही का इस तरह हाल-चाल पूछते देखकर,पारो को अच्छा नहीं लगा। तब वह बीच में ही बोली- हां हां क्यों नहीं ठीक होगी ? कल तो इसने खूब मौज मस्ती की है।

 तभी उसकी सोच के विपरीत रूही बोली -हम लोग, आज भी, उस कार्यक्रम में जाएंगे। 

क्या?? पारो ने आश्चर्य से पूछा, क्योंकि कल तो रूही आने के लिए मना कर रही थी और मैं सोच रही थी किस तरह से इसे मना कर, उस कार्यक्रम में ले जाऊं , वहीं  दूसरा क्या ?तारा जी ने कहा था? उन्हें आश्चर्य हो रहा था, जिस लड़की को हम बार-बार बाहर जाने और घूमने के लिए प्रेरित करते रहे हैं, आज वह स्वयं ही अपने मन से कह रही है, कि मुझे उस कार्यक्रम में पुनः जाना है , उनके लिए यह आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है ?

क्या तुम, सच में जाना चाहती हो ?उन्होंने रूही से पूछा, जैसे वे उसकी बात पर, विश्वास कर लेना चाहती है। 

हां, मैं वहां दोबारा जाना चाहती हूँ ? 

क्या कोई बात है या ऐसे ही, तारा जी में जानना चाहा। 

नहीं,ऐसी कोई बात नहीं है , वहां उपस्थित सभी लोगों का साथ, अच्छा लग रहा था, कुछ पलों के लिए मैं, भूल गई थी कि मेरे जीवन में कितनी परेशानियां है और मुझे किसी से जूझना है ?

यह बात तो है , इंसान ऐसे वातावरण में, अपने ग़मों को भुला देता है, दुख किसके जीवन में नहीं होते , हर इंसान को कोई न कोई दुख लगा ही रहता है , कोई ज्यादा धन से दुखी है, तो कोई गरीबी से दुखी है, कोई रिश्तों से दुखी है, तो कोई रिश्ते न, होने से दुखी है हर किसी का गम अलग-अलग है लेकिन गम तो है ऐसे समय में तुम अपने आप को भुलाकर, अपनी उन परेशानियों को भुलाकर, मस्ती में डूब जाते हो तो, इससे बेहतर क्या होगा ? तारा जी ने उसकी बातों का समर्थन किया। 

किंतु पारो को अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था, कि वह आज उस स्थान पर जाना चाहती है,जहाँ उसको लेकर झगड़ा हुआ था।  जब तारा जी, रसोई घर में, नाश्ते के लिए कहने गईं , तब पारो ने रूही से पूछा - तू  किसके लिए जाना चाहती है , क्या उस गर्वित के लिए ? क्या तुझे उससे प्यार हो गया है ? तू तो जाना ही नहीं चाहती थी, फिर तेरे मन में क्या चल रहा है? क्या मुझे नहीं बताएगी ?

न  बताने वाली तो, कोई बात ही नहीं है किंतु अब मुझे लगता है, मुझे जिंदगी को एक और मौका देना चाहिए , अपनी खुशियों को ऐसे ही, बंद कमरे में घुटकर  रहने नहीं देना है, मैं खुलकर जीना चाहती हूं। तब तक दिनेश ने नाश्ता लगा दिया था। तब रूही कहती है - मैं अभी आती हूं, कहते हुए ,स्नानागार में चली गई। 

तब तारा जी हंसते हुए बोलीं  -इस लड़की में एक बात तो है, यह बिना नहाए कभी भी, नाश्ता नहीं करती है ,पारो की तरफ देखते हुए बोलीं। 

मौसी जी!! मुंह बनाते हुए पारो बोली -आप मेरे सामने उसकी प्रशंसा कर रही हैं, यानी कि आप कहना चाहती हैं मैं बिना नहाये खा लेती हूं। 

तुम्हारे सामने प्रत्यक्ष प्रमाण है ,उसके हाथ के आलू के परांठे को देखते हुए बोलीं। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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