वक़्त ने ,क्या -क्या ?वक़्त दिखला दिया।
वक़्त मुट्ठी में रेत की तरह फिसलता गया।
वक़्त की धूल चेहरे पर उनके, नजर आई।
इक वक़्त था, वक़्त पर वो, काम न आया।
देख अकड़ उसकी,वक़्त ने खेल खिलाया।
रहा बैठा ,लगाए आस, गया वक़्त न आया।
रफ़्तार वक़्त की तेज़,वक़्त संग चल न पाया।
वक़्त की मार देखो ! आज भी अंग- संग है।
वक़्त ने, न जाने, क्या -क्या रंग दिखलाया ?
भटकता वो आज ,सही वक़्त के इंतज़ार में,
वक़्त ने उसे , किस मंज़िल तक पहुंचाया ?
क़ीमती वक़्त इतना,आज वक़्त ने तरसाया।
किस्सा वक़्त का उसने, किसी वक़्त सुनाया।
आज तक वक़्त की क़ीमत कोई लगा न पाया।
वक़्त के बहु रंग देखे ,वक़्त को समझ न पाया।
छूट गया जीवनधन ,वक़्त को पकड़ न पाया।
