Waqt

 वक़्त ने ,क्या -क्या ?वक़्त दिखला दिया।  

वक़्त मुट्ठी में रेत की तरह फिसलता गया। 

वक़्त की धूल चेहरे पर उनके, नजर आई। 

इक वक़्त था, वक़्त पर वो, काम न आया।



देख अकड़ उसकी,वक़्त ने खेल खिलाया।

रहा बैठा ,लगाए आस, गया वक़्त न आया।

रफ़्तार वक़्त की तेज़,वक़्त संग चल न पाया। 

वक़्त की मार देखो ! आज भी अंग- संग है।

 

वक़्त ने, न जाने, क्या -क्या रंग दिखलाया ?

भटकता वो आज ,सही वक़्त के इंतज़ार में,

वक़्त ने उसे , किस मंज़िल तक पहुंचाया ?

क़ीमती वक़्त इतना,आज वक़्त ने तरसाया।


किस्सा वक़्त का उसने, किसी वक़्त सुनाया।

आज तक वक़्त की क़ीमत कोई लगा न पाया। 

वक़्त के बहु रंग देखे ,वक़्त को समझ न पाया। 

छूट गया जीवनधन ,वक़्त को पकड़ न पाया।      

  


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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