Mysterious nights [part 105]

 रूही को लेकर, तारा जी के मन में अनेक सवाल उठ रहे थे, जिनका जवाब वो, जल्दी से जानना चाहती थीं। 

 उनकी बेचैनी और परेशानी को समझ कर'जुगनी' बोली - वो ऊपरवाला ! बैठा, सभी को खेल खिला रहा है ,क्या आपको मालूम था ?आप मुझसे मिलेंगी,आप ऐसे इलाके में कभी आई नहीं ,और आज आई भी हो और मेरे सामने बैठी भी हो। उसी ने तय किया हुआ है, कब ,किसको ,कैसे मिलना है ?

तारा जी की परेशानी देखकर, दुबारा ध्यान लगाने का प्रयास करती है, वो तारा जी का प्रश्न सुनकर, ध्यान लगाने लगती है,कुछ देर पश्चात , तब वो कहती है -यह जहां मिली थी, उसके उत्तर दिशा मे, मालूम करना। उसके स्वप्न ही उसका जबाब होंगे। 


यह सुनकर ,सभी को आश्चर्य हो रहा था ,आपको कैसे मालूम उसे' स्वप्न 'भी आते हैं ?

इसमें, इतनी हैरानी की कोई बात नहीं है ,पिछली बार जब वो आई थी , उसके प्रश्न उसके सपनों पर ही थे। 

किंतु उसके विषय में ,क्या कह कर मालूम करेंगे ? न ही, तो हमें उसके घर का पता मालूम है और न ही इसका असली नाम जानते हैं । तारा जी की बात सुनकर, पारो के सभी मित्र, उन्हें देखने लगे , तब उन्होंने पारो की तरफ देखा , जैसे वो यह पूछ रहे हैं -ये जो भी कह रही हैं, क्या सत्य है ? क्या रूही का असली नाम रूही नहीं है ?तब पारो ने अपने हाथों के इशारे से अभी उन्हें शांत रहने के लिए कहा ,बाद में सब बताती हूँ।

 यह तो मैं भी नहीं बता सकती , हां इतना अवश्य कह सकती हूं, यह किसी बड़े खानदान की बहू है। कुछ बातों से तारा जी को संतुष्टि हुई तो कुछ बातों से वह संतुष्ट रहीं , वे जो कुछ जानना चाहते थे, वह ज्ञान अधूरा ही रहा किंतु इतना तो अवश्य पता चल गया है ,ये किसी सभ्य और सम्पन्न परिवार की बेटी और बहु रही है।इसके अंधकारमय जीवन में कुछ उजाले की किरणें तो नजर आईं। कुछ अतीत के पन्ने उजागर हुए किन्तु कुछ प्रश्न भी उभर आये ,आखिर ये कौन है ? यदि ये अनाथ नहीं है ,तो अनाथों की तरह सड़कों  पर क्यों भटक रही थी ? इसके ससुराल वाले कैसे लालची हैं,अपने घर की लक्ष्मी को मरने के लिए छोड़ दिया या उन्होंने ही उसे मारने का प्रयास किया ? 

  कुछ देर वहाँ मेला देखते हैं ,आज तो तारा जी ने भी, मेले का आनंद लिया। वैसे हर जगह का अपना ही अलग महत्व है ,धूल और गंदगी के कारण, कभी मेरी मम्मी ने और फिर तुम्हारे मौसाजी भी  ऐसे ही मिल गए ,वे भी कभी इस तरह कहीं घुमाने नहीं ले गए ,मैं अक़्सर इन छोटी -छोटी खुशियों से वंचित रही। आज तुम बच्चों के कारण मैंने इसका भी लाभ उठाया। अच्छा, अब हमें चलना चाहिए और फिर वापस अपने घर के लिए निकल पड़ती हैं।

 पारो अपने दोस्तों के संग आगे चली गई थी। रूही ,पारों के साथ जाने के लिए तैयार थी इसलिए वह कहती है -कि मैं भी, इन लोगों के साथ जाऊँगी।

 तब ताराजी ड्राइवर को लेकर, अपनी गाड़ी से वापस अपने घर आ जाती है किंतु मन ही मन संतुष्ट थी। कम से कम यह लड़की बाहर तो घूम रही है, लोगों से घूलने -मिलने लगी है। वे लोग हंसते- खेलते, मौज मस्ती करते हुए ,अपनी गाड़ी में दूसरी तरफ निकल गए। रूही को, अब उन लोगों का साथ अच्छा लग रहा है।उसे लग रहा था ,शायद, पारो उसे समझने लगी है ,एक वही है ,जो उसके अतीत को उस गहन अंधकार से उभारकर बाहर ला सकती है। उसे इस बात का दुःख था कि उसके माता -पिता हैं किन्तु वो उनके विषय में कुछ नहीं जानती। ऐसे कौन दुष्ट लोग हैं ?जिन्होंने मुझे इस तरह सड़कों पर छोड़ दिया या मारने का प्रयास किया। 

पारो ने, उसे पहले ही समझा दिया था ,कि मौसी जी को इस बात की भनक न लगे- तुम सम्पूर्ण सच्चाई अपने कानों से सुन चुकी हो। रूही अब गाड़ी में बैठी , बाहर के नजारे देखते हुए जा रही थी तभी उसे कुछ स्थल ऐसे लगे , जैसे उसने उन्हें पहले कहीं देखा है। कहां देखा है ? कुछ स्मरण नहीं हो रहा। कुछ धुंधली सी स्मृतियाँ !

यही बात, जब उसने पारो से कही , तब पारो के एक दोस्त ने कहा। सपने में देखा होगा, कहते हुए हंसने लगे क्योंकि अब तक रूही की सम्पूर्ण सच्चाई पारो अपने दोस्तों को बता चुकी थी। रूही से उन्हें हमदर्दी थी किन्तु उसका दिल बहलाने के लिए कुछ ऐसी बातें भी कर जाते थे।  

आगे बढ़ते हुए वे लोग, एक शहर की तरफ निकल गए, और मौज मस्ती करते हुए एक होटल में खाना खाने के लिए पहुंच गए। बहुत अच्छी जगह थी, किंतु रूही उस स्थान को ध्यान से देख रही थी अभी वे लोग, भोजन कर ही रहे थे तभी  रूही ने एक चेहरा ऐसा देखा जो अक्सर उसके सपनों में आता था, क्या यह चेहरा हकीकत में है यह देखकर उसे बहुत ताज्जुब हुआ। ये कौन हो सकता है ?सोच -सोचकर रूही का सिर चकराने लगा।

उसकी ऐसी हालत देखकर, पारो ने उससे पूछा -क्या हुआ ? 

कुछ नहीं ,थोड़ा चक्कर सा महसूस हो रहा है। 

लो तुम ,पानी पियो !क्या तुम्हारे लिए नीबू -पानी मंगा दूँ ?

नहीं, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, मैंने यहाँ एक ऐसे चेहरे को देखा है ,जिसे देखकर मुझे लगा ,जैसे मैं उसे जानती हूँ ,वह धीरे से फुसफुसाई।   

किन्तु ये बात ,उसके करीब बैठे, समीर ने सुन ली , रूही को इस तरह परेशान देखकर ,समीर बोला - तुम अपने अतीत को लेकर, कुछ ज्यादा ही परेशान रहती हो , इसलिए तुम्हें हर चीज जानी पहचानी नजर आ रही है। अपने दिमाग़ पर इतना बोझ मत डालो ,जो चल रहा है ,चलने दो ! सभी बातों को सुनकर तो ऐसा नहीं लगता है कि तुम्हारा अतीत स्मरण करने योग्य है ,जब तुम्हारे अतीत में कुछ अच्छी स्मृतियाँ हैं ही नहीं तो उन्हें क्यों कुरेदना चाहती हो ? मैं ये जानना चाहता हूँ ?क्या तुम ,अपने इस जीवन से संतुष्ट नहीं हो ?

नहीं ,ऐसी कोई बात नहीं है किन्तु मन में दुविधा बनी हुई है आखिर मेरे माता -पिता कौन थे ?मेरा विवाह कब और किन परिस्थितियों में हुआ और मेरे साथ ऐसा क्या हुआ ? जो मेरी, ये हालत हो गयी। मैं अपना नाम तक भुला चुकी हूँ। 

ये तो तुम्हारे लिए अच्छा ही हुआ ,उन स्मृतियों को स्मरण करके क्या लाभ होगा ?जो कष्ट के सिवा कुछ दे ही नहीं सकतीं, बल्कि नियति ने ये तुम्हें सुनहरा मौका दिया है ,अपने अतीत को भुला, तुम अपने जीवन में आगे बढ़ सको !

मैं भी ,ये सब जानती हूँ किन्तु क्या करूं ?जिज्ञासा बनी रहती है ,और मन बार -बार मुझसे ही प्रश्न करता है ,मेरा अस्तित्व क्या है ?कौन हूँ ,मैं !

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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