Kiski dulhan [part 34]

भानु और मोहिनी सुरंग के रास्ते से होते हुए ,एक कक्ष में पहुंचते हैं और वहां पर उन्हें कुछ सामान और टेप रिकार्डर ''मिलता है ,वे उसको चलाकर जानना चाहते हैं कि आखिर इसमें क्या है ?वे उसे सुनते हैं। कमरे में कुछ क्षणों तक सिर्फ़ टेप रिकॉर्डर की धीमी खरखराहट सुनाई देती रही।तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया और आवाज आई -मोहिनी ! दरवाज़ा खोलो !

मोहिनी की आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं और सोच रही थी -दरवाज़ा खोले या नहीं !

बाहर से फिर वही आवाज़ आई—मोहिनी ! दरवाज़ा खोलो !"


भानु ने अपना हाथ तलवार की मूठ पर कस लिया ,उसने धीमे स्वर में मोहिनी से कहा— पापा की आवाज़ लग रही है..."

मोहिनी ने, उसकी ओर देखा ,लेकिन तुमने कहा था -''कि तुम्हारे पिता बाहर थे।"

"थे ,तो..."

"तो फिर..."

भानु ने ,सिर हिलाया और सोचते हुए बोला -"यही तो समझ में नहीं आ रहा है। "

दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई -ठक... ठक...

"भानु "अबकी बार भानु को आवाज़ लगाई थी ,इस बार आवाज़ में हल्की अधीरता थी -"दरवाज़ा खोलो !"दरवाजा खोलने के लिए भानु आगे बढ़ा। 

मोहिनी ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया ,"रुको !"अगर सच में पापा हुए तो?"

"और अगर नहीं हुए तो...भानु रुक गया ,दोनों कुछ क्षण एक-दूसरे को देखते रहे।फिर मोहिनी  ने टेप रिकॉर्डर की ओर देखा ,अभी कुछ क्षण पहले जो आवाज़ उसे सुनाई दी थी, वह बिल्कुल उसकी माँ जैसी लग रही थी ,लेकिन उसने यह नहीं बताया था 'कि उसकी माँ कौन थी ?'उसने केवल इतना कहा था—"मैंने तुम्हें कभी छोड़ा नहीं था और फिर...जिस आदमी के साथ भेजा था, वह तुम्हारा दुश्मन नहीं था।यही बात मोहिनी के मन में बार-बार घूम रही थी। वह आदमी कौन हो सकता है और उसे कहाँ भेजा गया था?

बाहर से आवाज़ फिर आई—भानु ! मुझे पता है ,तुम दोनों अंदर हो।"

भानु ने इस बार कोई जवाब नहीं दिया ,कुछ सेकंड सन्नाटा छाया रहा ,फिर वो आवाज़ बदली सी महसूस हुई -"मोहिनी !"अगर तुम मुझे सुन रही हो, तो दरवाज़ा मत खोलना !"

मोहिनी  और भानु दोनों चौंक गए ,यह आवाज़...अब भी विक्रम की थी ,लेकिन शब्द बिल्कुल विपरीत  थे।बाहर से फिर आवाज़ आई—"जो भी तुम्हें यहाँ तक लेकर आया है..उस पर भरोसा मत करना।"

भानु ने धीरे से कहा—"पापा !"लेकिन उधर से कोई उत्तर नहीं आया।

मोहिनी ने फुसफुसाकर पूछा—"क्या तुम्हारे पिता ऐसी जगहों के बारे में जानते हैं?"

भानु ने कुछ क्षण सोचा और बोला - "बचपन से उन्होंने हमें इस पुराने हिस्से से दूर ही रखा।"

"कभी कोई कारण बताया?"

"हमेशा यही कहा -' कि यह हवेली का असुरक्षित हिस्सा है।'

मोहिनी  ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—इस घर में हर खतरनाक चीज़ को 'पुराना' या 'असुरक्षित' कहकर छिपाया गया है।"

भानु के चेहरे पर भी क्षणभर के लिए हल्की मुस्कान आई ,लेकिन तुरंत गायब हो गई ,क्योंकि 'टेप रिकॉर्डर' फिर चल पड़ा था -खर्र...कुछ सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं आई ,फिर किसी महिला की आवाज़ दोबारा सुनाई दी -"अगर पहली रिकॉर्डिंग तुम्हें मिल गई है..तो इसका मतलब है ,कि तुम उस कमरे तक पहुँच चुकी हो।"

मोहिनी आगे बढ़ी।"मैं चाहती थी, कि तुम यहाँ कभी न आओ !लेकिन कुछ रास्ते.इंसान स्वयं नहीं चुनता ,वे उसे चुनते हैं।

मोहिनी  ने अपनी आँखें बंद कर लीं।वह आवाज़ उसके भीतर कुछ अजीब-सा जगा रही थी ,एक अपनापन...लेकिन साथ ही एक डर !रिकॉर्डिंग से तब आगे आवाज आई —"तुम्हें बहुत-से लोग अलग-अलग बातें बताएँगे।कुछ कहेंगे ,'कि तुम इस घर के लिए खतरा हो।"कुछ कहेंगे,' कि तुम किसी पुराने अपराध की वजह हो और कुछ..."आवाज़ कुछ पल के लिए रुक गयी ,तब आवाज आई 'तुम्हें बचाने का दावा करेंगे।"फिर बहुत धीमे स्वर में उसने कहा —"इनमें से किसी पर तुरंत विश्वास मत करना।"

मोहिनी ने, भानु की ओर देखा, वो कुछ बोलने ही वाला था कि रिकॉर्डिंग आगे बढ़ी—"सच एक ही है..लेकिन उसे जानने के लिए तुम्हें तीन दरवाज़े खोलने होंगे।कमरे में हल्की गूँज हुई -"पहला दरवाज़ा....जो तुमने आज खोल दिया।"

मोहिनी की नज़र उस पुराने कमरे की ओर गई, जहाँ आईना था ,"दूसरा दरवाज़ा..."तुम्हें स्वयं ढूँढ़ना होगा।और तीसरा...आवाज़ अचानक बहुत धीमी हो गई। जब वह समय आएगा, तब कोई तुम्हें रोक नहीं पाएगा।पुराना टेप फिर खरखराया ,फिर उस टेप वाली महिला ने आख़िरी बात कही—और मोहिनी ,भानु को हमेशा अपने साथ रखना ,टेप अचानक बंद हो गया।मोहिनी और भानु दोनों स्तब्ध रह गए।बाहर...अब कोई दस्तक नहीं हो रही थी।

भानु ने धीरे से पूछा—क्या मेरी माँ का नाम तुम्हें पता है?

मोहिनी ने 'नही 'में  सिर हिलाया।

मुझे भी नहीं पता,तब इस रिकॉर्डिंग में किसकी आवाज़ थी ?

मोहिनी ने उसकी ओर देखा और पूछा -क्या तुम्हें अपनी माँ की आवाज़ याद नहीं?"

भानु की आँखें कुछ क्षण के लिए झुक गईं ,"नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि...वह थोड़ा रुका ,मुझे बताया गया था कि मेरी माँ की मृत्यु तब हुई थी जब मैं बहुत छोटा था।"

मोहिनी ने कुछ नहीं कहा ,भानु ने पहली बार खुलकर अपनी बात कही—मुझे उनका चेहरा तक ,ठीक से याद नहीं है। "सिर्फ़ एक चीज़ याद है।"

"क्या?"

"चाँदी की पायल की आवाज़...."

मोहिनी ने जो अपने  हाथ में पायल पकड़ी हुई थी, अचानक भारी लगने लगी ,उसने धीरे से उसे देखा और पूछा -क्या तुम्हें यकीन है ? 

भानु ने सिर हिलाया ,"हाँ ''लेकिन..."उसकी आवाज़ धीमी थी।

किन्तु यह पायल तो मृणाल की बताई गई है।"

भानु ने पायल को देखा ,उसके चेहरे की उलझन और बढ़ गई ,"तो फिर. वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाया।

अचानक कमरे की दीवार से आवाज़ आई -टक ! दोनों ने एक साथ पीछे मुड़कर देखा।वही लकड़ी की डिब्बी...जो कुछ देर पहले मेज़ पर पड़ी थी...अपने-आप खुल गई थी।उसके अंदर एक छोटी-सी पीतल की चाबी थी और उसके नीचे एक कागज़ था ,मोहिनी ने कागज़ उठाया। उस पर लिखा था—"दूसरा दरवाज़ा वहाँ है जहाँ से ,किसी ने कभी तुम्हें विदा किया था।"

भानु ने सुनते ही कहा—"विदा..."

मोहिनी  ने सोचने लगी कहाँ से विदा किया था ?फिर अचानक उसकी आँखें फैल गईं  और एकदम से बोली -"शादी।"

"क्या?"

"मेरी शादी के दिन..."उसने धीरे से कहा - मुझे जिस रास्ते से मंडप तक लाया गया था, वहाँ एक पुराना आँगन था।"

भानु ने कहा—वह तो हवेली का पूर्वी हिस्सा है।"

"हाँ।"

लेकिन वहाँ तो कोई दरवाज़ा नहीं है। 

मोहिनी ने चाबी को देखा और सोचते हुए बोली -"शायद है ,बस दिखाई नहीं देता।उसी समय कमरे की पिछली दीवार से हल्की आवाज़ आई। घर्ररर...पत्थर का एक छोटा सा हिस्सा पीछे खिसक गया।तब उस दीवार  में एक पतली दरार बनी।दरार के भीतर से हल्की हवा आई।

भानु ने मशाल आगे की और बोला -मोहिनी !देखो ,यहाँ रास्ता है। 

मोहिनी, उसके समीप पहुँची ,दीवार के अंदर एक संकरी सीढ़ी नीचे जा रही थी ,लेकिन सीढ़ियों के पहले पत्थर पर कुछ लिखा था—"वापसी का रास्ता मत ढूँढ़ना।"

भानु ने कहा—यह चेतावनी हो सकती है।"

या डराने की कोशिश ,मोहिनी ने उत्तर दिया। आगे बढ़ने  के लिए उसने ,अपना क़दम आगे बढ़ाया ही था। 

भानु  ने उसका हाथ पकड़कर बोला -पहले मैं !

"नहीं।"

"क्यों?"

मोहिनी ने उसकी आँखों में देखा और बोली - क्योंकि रिकॉर्डिंग में कहा गया था ,''मुझे, तुम्हें अपने साथ रखना है।"

भानु कुछ क्षण चुप रहा,फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला—"तो साथ चलते हैं।दोनों सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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