सुप्रभात !मेरी आधी अंग्रेजन ,नींद तो अच्छी आई ,मुस्कुराते हुए तारा जी ने पूछा।
हाँ ,नींद अच्छी क्यों नहीं आएगी ?मेरी आज की भी छुट्टी है ,तब इधर -उधर देखकर पारो ने पूछा - क्या अभी तक रूही नहीं उठी है ?
उठ गई होगी, किंतु उठने के पश्चात भी ,वो तुम्हारी तरह बाहर नहीं आती है, तुम जाकर देखो !क्या कर रही है ?
न जाने क्यों? रूही को, पार्वती का आना अच्छा नहीं लगता है। हो सकता है, उसके एकांतवास में उसके आने से खलल पड़ता हो। वह स्वयं भी नहीं जानती, कि वह पार्वती को क्यों, पसंद नहीं करती है ? वह उठ गई थी, किंतु उठकर भी क्या करना था ? अभी भी वह इस परिवार में, अपरिचितों की तरह ही रहती है।
रूही दरवाजा खोलो ! पारो की आवाज ने उसे चौंका दिया। यह यहां , क्या यह आज यही थी ? पता नहीं, क्यों आई है ? जबरन ही, उसने अपने को, उस बिस्तर से बाहर निकाला और दरवाजा खोल दिया। सुप्रभात ! क्या कर रही हो ? खुश होते हुए पार्वती ने उससे पूछा। चलो, आओ !घूमने चलते हैं ?
नहीं, मुझे कहीं नहीं जाना है, रूही ने अनिच्छा जाहिर की।
क्यों, नहीं जाना है ?जब बाहर कहीं नहीं जाओगी ,किसी से मिलोगी नहीं तो, अपने विषय में कैसे जानोगी ?
रूही ने अविश्वास से उसे देखा और पूछा - मुझे अपने विषय में क्या जानना है ?
यही कि, तुम कौन हो, कहाँ से आई हो ?पारो ने बेझिझक स्पष्ट शब्दों में कहा।
इसमें मुझे क्या जानना है ? मैं डॉक्टर अनंत की बेटी हूँ और क्या ?
ये बात, तुम भी जानती हो और मैं भी ,पार्वती की आँखों में जैसे उसे कोई रहस्य नजर आया ,भेदभरी नजरों से पार्वती ने, रूही के चेहरे की तरफ देखा और बोली -तुम जानती हो ,मैं किसकी बात कर रही हूँ ? मैंने तुम्हें दरवाजे के पीछे से चुपचाप जाते और झांकते हुए देखा है। तुमने हमारी सभी बातें सुन लीं हैं ,क्यों मैं सही कह रही हूँ ?न.... तुम मौसी और मौसाजी से अनजान बनकर रह सकती हो किन्तु मुझसे नहीं ,मैं जानती हूँ ,तुम जान गयी हो ,तुम इस परिवार की बेटी नहीं हो और तुम अपने विषय में जानना चाहती हो। इसमें मैं तुम्हारी सहायता कर सकती हूँ किन्तु तुम्हें इसमें मेरा साथ देना होगा ,कहते हुए पार्वती ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
पार्वती के मुख से, अपने ह्रदय का हाल जाकर रूही की आँखों में आंसू आ गए थे। उसने रोते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया और बोली -इसमें तुम मेरी क्या सहायता कर सकती हो ?जब मुझे ही कुछ भी स्मरण नहीं है।
जो भी सम्भव होगा, वही करेंगे। मैं ही नहीं, तुम भी अपने को जानने का प्रयास करना ,और शर्त ये है ,मौसीजी और मौसाजी को ये बात मालूम नहीं होनी चाहिए कि तुम सारी बातें जान चुकी हो। अनजान ही बने रहना है और हम दोनों मिलकर, तुम्हारे अतीत को खोजेंगे। अब ये रोना बंद करो !मैं समझ सकती हूँ ,एक इंसान पर क्या बीतेगी ?जब वो अपना सम्पूर्ण अतीत भुला चुका होगा। अपने विषय में ,यहाँ तक कि वह अपना नाम तक नहीं जानता है ,उसकी क्या पहचान है ?अब इसके लिए तुम्हें रोना -धोना बंद करके अपने को, इस घर से बाहर ले जाना होगा। यहाँ, इस घर में बैठे -बैठे तुम कुछ भी नहीं जान पाओगी ,हो सकता है ,बाहर कुछ ऐसी चीजें देखकर तुम्हारी याददाश्त के कुछ हिस्से तुम्हें स्मरण होने लगें।
हाँ ,तुम सही कह रही हो , बातें अच्छी लगने के साथ -साथ उनमे सच्चाई नजर आईं ,उसका पारो पर विश्वास बढ़ गया ,तब उसने पूछा -मेले में जो कुछ भी उस महिला ने कहा ,क्या सच हो सकता है ?
हो भी सकता है ,नहीं भी ,किन्तु जब हम किसी चीज के विषय में जानते ही नहीं, तब हमें विश्वास तो करना ही होगा ,इसके सिवा हमारे पास कोई और रास्ता भी तो नहीं है। अच्छा चलो !अब तुम नहाकर ,नाश्ता करके तैयार हो जाओ ! आज हम उसी 'जुगनी 'से दुबारा मिलने चलते हैं ,हो सकता है ,कोई और काम की बात बताये। अच्छा ! अब मैं चलती हूँ और तैयार होती हूँ ,तुम्हारे जीवन के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए ,आगे बढ़ते हैं। कहते हुए ,वो रूही के बिस्तर से उठी। पारो ने ,रूही का उसी तरह लटका हुआ चेहरा देखा तो उसके गालों को पकड़ कर खींचते हुए बोली -अब इस तरह मुस्कुराना सीख़ लो !ऐसे लटके चेहरे से किस्मत भी रूठ जाती है। अच्छा ,अब शीघ्रता से तैयार होकर नाश्ते के लिए नीचे आ जाओ ! वहां मैं तुमसे साथ चलने के लिए कहूंगी किन्तु तुम पहले की तरह मुँह लटका कर, मना कर देना वरना मौसीजी न जाने क्या समझे बैठें ?कहते हुए हंसने लगी।
पारो के चले जाने पर अचानक ही, रूही के चेहरे पर मुस्कान आ ही गयी और वो सोचने लगी -मैं व्यर्थ में ही ,इसे बुरा समझ रही थी ,ये इतनी बुरी भी नहीं है ,इसने मुझे और मेरी भावनाओं को समझा, सोचकर वह तैयार होने चली गयी।
पारो को देखकर ,क्या रूही उठ गयी है ?तारा जी ने पूछा।
उठी नहीं थी ,उठाकर आई हूँ और उसे तैयार होने के लिए भी कहकर आई हूँ।
वो जाने के लिए तैयार हो गयी।
होती क्यों नहीं ? किसकी भांजी हूँ ?कहते हुए नहाने के लिए भागी।
मैं व्यर्थ में ही परेशान हो रही थी ,अब तो ये बहुत होशियार हो गयी है,वहां किसी को भी न देखकर,डॉक्टर अनंत ने तारा से पूछा -तुम किसकी बात कर रही हो ?
वही अपनी पार्वती ,न.. न.. पारो !कहते हुए हंसने लगीं।
होशियार क्यों न होगी ?विदेश से पढ़ाई करके आई है ,अब नौकरी कर रही है।
सही कह रहे हैं ,कह रही थी -'उसने रूही को अपने साथ ले जाने के लिए मना लिया है।
ये तो बड़ी अच्छी बात है ,तुम्हारी सिरदर्दी तो ख़त्म हुई।
नाश्ता परोसते हुए बोली -इसमें सिरदर्दी कैसी ? मैं ये सोच रही हूँ ,क्यों न मैं भी, बच्चों के साथ चली जाऊँ ?
तुम उस जगह जाना चाहती हो ,अनंत को आश्चर्य हुआ ,वो जानता है ,तारा ऐसे किसी गांव के मेले में जाना पसंद नहीं करती है।
क्यों ?जब बच्चे उस मेले में जा सकते हैं ,तो मैं क्यों नहीं ?
जाना चाहती हो ,तो जा सकती हो ,मैं ,तुम्हें रोकने वाला कौन होता हूँ ? अनंत जानता है,इसके मन में अवश्य ही कुछ चल रहा है,तब उसने तारा से पूछा - वैसे तुम्हारा मेले में जाने का उद्देश्य क्या है ?
इसमें क्या उद्देश्य हो सकता है ?क्या बिन उद्देश्य नहीं जाया जा सकता ?अनंत ने तारा की तरफ देखा और सोचा, समय परिवर्तनशील है ,हो सकता है ,इसकी सोच बदल गयी हो या फिर इसके दिमाग़ में भी कुछ चल रहा होगा किन्तु उसने अब कुछ न ही कहना बेहतर समझा।
