Mysterious nights [part 102]

पार्वती ,और उसके मौसा -मौसीजी ,रूही के विषय में चर्चा करते हैं ,उसकी परेशानी को समझते हैं किन्तु वे ये भी नहीं चाहते कि रूही को मालूम हो कि हम उसके असली माता -पिता नहीं हैं। अभी तक तो, रूही  यह जानकर ही परेशान है कि उसका विवाह हो चुका है। इस बात ने ही, उसे झकझोर कर रख दिया होगा। ये बात उसे उस 'जुगनी' नाम की ज्योतिषाचार्य से जानने को मिल रही है जबकि हम उसके माता -पिता होकर भी उससे यह बात छुपा गए। किन्तु वो क्या जाने ?उसकी इस सच्चाई के विषय में तो, हम भी नहीं जानते ,तारा चिंतित स्वर में बोली। 


 मैं तुम्हारी बात समझ सकता हूं, यदि हमें उसे ठीक करना है, और उसे उसके परिवार से मिलाना है तो हमें यह जोखिम तो उठाना ही होगा,हो सकता है ,उसके सपनों का इलाज़ भी मिल जाये क्योंकि ये कोई शारीरिक बीमारी नहीं है ,ये एक मानसिक परेशानी है ,इसे बिमारी भी नहीं कह सकते हैं।  डॉक्टर अनंत ने कहा और यदि तुम चाहती हो, कि वह इसी तरह हमारी बेटी बन कर रहे तो हम उसे कोई सच्चाई नहीं बताएंगे, और न ही, उसके अतीत के विषय में कोई जानकारी प्राप्त करेंगे। 

किंतु मौसा जी !वह तो, अपने अतीत को लेकर बहुत परेशान है, क्या आप चाहते हैं ? कि वह संपूर्ण जीवन इसी तरह परेशान रहे उसे उसकी सच्चाई का पता ना चल पाए,या फिर किसी और से, उसे इस बात की जानकारी मिले कि वो इस घर की बेटी नहीं है ,तब भी उसके मन में अनेक विचार आने सम्भव हैं ,उनमें अच्छे भी हो सकते हैं ,तो नकारात्मक !भी ,आप लोगों को ही अपना दुश्मन ,न समझ बैठे और ये भी तो सम्भव  हो सकता है, संपूर्ण सच्चाई जानने के पश्चात, वह आप लोगों से अधिक प्यार करने लगे , अपना मानने लगे, अभी तक तो वह दुविधा में ही है क्योंकि उसे ऐसा कुछ भी नहीं लगता, जो उसकी दिल की भावनाओं को छू रहा है।

 तुम सही कह रही हो, कल उसे उस ज्योतिषाचार्य, तुमने उसका क्या नाम बताया था ?स्मरण करते हुए तारा ने पूछा। 

उसका नाम' जुगनी 'है, जो कभी झूठ नहीं बोलती, हंसते हुए पारो ने जवाब दिया। 

हां, तो तुम इस जुगनी के पास इसे ले जाना। हो सकता है ,वो इस परेशानी का कोई हल निकाले।

 रूही से क्या कहेंगे ? पारो ने पूछा। 

कह देना, उससे दोबारा मिलने जा रहे हैं और जो भी बातें उसने बताइ हैं हम उसकी सच्चाई को परखना चाहते हैं। 

क्या उसके बिना जाए, काम नहीं चल सकता, तारा जी ने पूछा। 

कह नहीं सकती, हो सकता है उसके बिना जाए भी, वह बात बता दे और यह भी हो सकता है कि रूही की आवश्यकता पड़े।

तब तुम ऐसे करना, रूही को अपने साथ ले जाना लेकिन उसे कुछ भी मत बताना, यदि उसकी आवश्यकता पड़ती है तो उसे अपने समीप, अपने साथ, उसके सामने जाना यदि उसकी आवश्यकता नहीं पड़ती है तो तुम ही सारी बातें पूछ कर और सुनकर आ जाना, बाकी देखते हैं, कैसे हल निकालना है ? 

हां यही उचित रहेगा, अभी मैं चलती हूं। 

अब तुम कहां जा रही हो? जब तुमने यह बीड़ा उठाया है , वह काम भी पूरा करना होगा अब तुम यहीं रहो और फोन करके अपने दोस्तों को भी बुला लेना उनका दोबारा घूमना हो जाएगा और तुम्हारा काम भी हो जाएगा। 

वैसे तुमने यह गलत कार्य किया, तुम्हें उस' जुगनी 'का फोन नंबर तो लाना चाहिए था। 

उस समय मौसा जी, यह बात दिमाग में आई ही नहीं, और रूही की परेशानी देखकर हम घर वापस आ गए। अब आपने जो भी बातें बताई ,पहले वो भी तो नहीं जानती थी ,अधूरी जानकारी के साथ उससे क्या तर्क -वितर्क करती ?

अच्छा, अब तो तुम्हें सम्पूर्ण जानकारी हो गयी ,अब तुम भोजन करके यहीं सो जाना और कल रूही के साथ कैसे बात करनी है और कैसे ले जाना है ?तैयारी कर लेना ,कहकर तारा अपने कमरे में चली गई और डॉक्टर अनंत से पूछा -क्या हमने सही किया ?

क्या मतलब ?उसकी बातों का आशय न समझते हुए डॉक्टर अनंत ने पूछा। 

मैं इस बात को किसी ओर ही दृष्टि से सोच रही थी ,मेरी दीदी यानि मेरी बहन चाहती थी ,कि मैं पारो को गोद ले लूँ किन्तु उस समय मुझे अपने बच्चे की इच्छा थी, इसीलिए मैंने उनसे इंकार कर दिया था किन्तु तब भी वो यही कहती थी -मैं पारो को, आपकी बेटी समझकर ही पाल रही हूँ ,अब जब पारो यहाँ आई ,तब मैंने उसे यहां रुकने के लिए कहा भी, किन्तु अभी वो अपने दोस्तों के संग रुकी है। उसे इस बात का दुःख तो हुआ होगा ,क्योकि ये बात पारो भी जानती है ,जब उसने रूही को हमारी बेटी के रूप में देखा होगा। 

तुम भी न क्या -क्या सोचने लगती हो ?यदि हम पारो को अपनी बेटी के रूप यहां रख लेते या क़ानूनी तौर अपनी  बेटी बना भी लेते तो वो भी ऐसे ही रहती ,हमने क्या उसके नाम अपनी ये कोठी और जायदाद कर दी है। तुम ये व्यर्थ की बात मत सोचो !और सो जाओ !कहते हुए अनंत बिस्तर पर करवट बदलकर सो गया।

 तारा, को अपनी बहन की बातें स्मरण हो रहीं थीं -तारा तेरे तो कोई औलाद नहीं है ,किसके लिए ये सब जुटारहे हो ? मेरी पार्वती को अपनी बेटी बना लो ! इसके पिता को भी सहारा हो जायेगा। एक बेटी का भा र जो कम हो जायेगा। 

दीदी ! तुम सही कह रही हो,मैं मानती हूँ ,जीजाजी ,पर परिवार का अधिक बोझ है किन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं,मैं अपनी औलाद की उम्मीद ही छोड़ दूँ। यदि आपको मेरी सहायता की आवश्यकता है तो मैं, थोड़े पैसे से मदद कर सकती हूँ। मेरी बात सुनकर दीदी निराश हो गयी थीं और क्रोधित होते हुए बोलीं  -तुम क्या हमें भिखारी समझ रही हो ? चंद पैसों से हमारी सहायता करोगी। मैं तो तुम्हारे अकेलेपन के कारण यह सब कह रही थी। तुम्हारी जो इच्छा हो ,वो करो !

दीदी !आप तो मेरी बातों का बुरा मान गयीं ,अच्छा आप पार्वती को मेरी धरोहर समझकर ही पाल लो ! मेरा मतलब है ,मेरी बेटी मानकर उसे पाल लो !इसके सारे खर्चों की मेरी जिम्मेदारी है।

  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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