मोहिनी , भानु की बाँहों में अचेत हो गयी ,और जब उसकी आँखें खुलीं ,तो ऐसा लग रहा था ,जैसे वो अपने आप में नहीं है ,वो शून्य में देख रही थी,और बोली -मुझे जाना है।
भानु ने उसका हाथ पकड़ लिया और पूछा -तुम्हें कहाँ जाना है ?
"वहाँ...उसने सामने इशारा किया ,वह मेरा इंतज़ार कर रही है।"
रत्न प्रताप के चेहरे के भाव बदलने लगे और उन्होंने भी पूछा -"कौन?"
मोहिनी ने धीरे से बोली —"माँ" उसके ये स्वर सुनकर ,कमरे में सन्नाटा छा गया।
विक्रम ने एक कदम पीछे लिया ,रहस्यमयी महिला ने अपनी आँखें बंद कर लीं और भानु कुछ क्षणों तक मोहिनी को देखता रहा और बोला -"मोहिनी ! उसकी आवाज़ बेहद धीमी थी।"तुम्हारी माँ..."वह आगे नहीं बोल पाया।
मोहिनी अचानक उठी और गलियारे में चलने लगी।भानु भी उसके पीछे हो लिया।वह बिल्कुल सीधी चल रही थी।न उसे रास्ता देखना पड़ रहा था...न उसे किसी रोशनी की आवश्यकता थी।जैसे वह इस जगह को पहले से जानती हो। वह उसी पुराने बंद हिस्से से आगे निकल गई, जहाँ से वे अभी लौटे थे।गलियारा समाप्त हुआ।सामने एक पत्थर की दीवार थी। मोहिनी उसके सामने जाकर रुक गई।
भानु ने चारों ओर देखा और सोचने लगा -"यहाँ तो कोई रास्ता है ही नहीं ,तब मोहिनी से बोला -अब वापस चलो !यहाँ कोई रास्ता नहीं है।
अचानक मोहिनी ने दीवार पर हाथ रखा और बोली -यहां रास्ता है।
"कहाँ ?"भानु ने इधर -उधर देखा
तब मोहिनी ने उँगलियों से एक खास पत्थर दबाया ,टक ! दीवार के भीतर से हल्की आवाज़ आई ,फिर दूसरा पत्थर टक ! तीसरा टक ! भानु आश्चर्य से मोहिनी को देख रहा था ,उसने भानु से पूछा - ये स्थान तुम्हें ये कैसे पता चला ?"
मोहिनी ने उसकी ओर देखा ,कुछ क्षणों तक उसकी आँखें खाली रहीं ,फिर उसने कहा—"मुझे नहीं पता और तभी...दीवार बीच से दो हिस्सों में बँट गई। वहां एक बेहद संकरी सुरंग सामने दिखलाई दी ।
तभी भानु ने मशाल उठाई और मोहिनी की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए बोला -"मैं पहले जाऊँगा।"
मोहिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली -"नहीं।"
"क्यों?"
"वो, मुझे अकेले बुला रही है।"
भानु ने अपना सिर हिलाया, मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा।"इस बार मोहिनी ने विरोध नहीं किया ,दोनों सुरंग में प्रवेश कर गए।
पीछे...रत्न प्रताप उन्हें जाते हुए देख रहे थे।विक्रम ने धीमे स्वर में पूछा— तुमने उसे रोका क्यों नहीं ?"
रत्न प्रताप ने कहा—क्योंकि अब जो हो रहा है...वह हमारे नियंत्रण में नहीं है।"
रहस्यमयी महिला ने पहली बार उनकी ओर सीधे देखा और चिंतित स्वर में बोली -"आप अभी भी सच नहीं बताएँगे?"
रत्न प्रताप ने उनकी ओर देखा और बोले -"अभी ,सच बताने का समय नहीं आया।"
महिला की आँखों में कठोरता आ गई ,"नहीं "आप हमेशा यही कहते हैं "पच्चीस साल पहले भी आपने यही किया।
रत्न प्रताप चुप रहे।
महिला ने धीमे स्वर में कहा—लेकिन अब फर्क है।
"क्या ?"
"अब मोहिनी अकेली नहीं है ,उनकी नज़र उस सुरंग पर गई।अब उसके साथ वह लड़का है .जिसे इस रहस्य से सबसे दूर रखना चाहिए था।"
विक्रम ने चिंता से पूछा—भानु ?"
महिला ने सिर हिलाकर कहा -"हाँ 'फिर वह धीमे स्वर में बोलीं—और यही सबसे बड़ी समस्या है।
उधर...सुरंग के भीतर हवा बेहद ठंडी थी। मोहिनी आगे -आगे चल रही थी।भानु उसके पीछे था। कुछ दूर जाने के पश्चात अचानक मोहिनी रुक गई।
भानु ने पूछा—क्या हुआ ?
उसने दीवार की ओर देखा ,वहाँ छोटे-छोटे हाथों के निशान बने थे।जैसे किसी बच्ची ने गीली मिट्टी से दीवार को छुआ हो। मोहिनी ने, एक निशान पर हाथ रखा और अचानक...उसके सामने का दृश्य बदल गया।एक बच्ची उसी सुरंग में दौड़ रही थी।उसके पीछे कोई आदमी चिल्ला रहा था—"रुको!"बच्ची भागते हुए रो रही थी ,उसके हाथ में वही पायल थी ,फिर वह मुड़ी...और एक जगह जाकर रुक गई। सामने वही दीवार थी।बच्ची ने एक पत्थर दबाया और दीवार खुल गई।दूसरी तरफ़ एक महिला खड़ी थी।महिला ने उसे देखते ही गले लगा लिया और बोली -"तुम आ गई..."
बच्ची रोते हुए बोली—माँ, वे लोग मुझे ढूँढ़ रहे हैं।"
महिला ने उसके बालों पर हाथ फेरा और उसे सांत्वना देते हुए बोली -"उन्हें ढूँढ़ने दो !"वे तुम्हें नहीं पा सकेंगे।फिर महिला ने अचानक कैमरे जैसी किसी वस्तु की ओर देखा और कहा—अगर कभी मोहिनी को यह दिखे...तभी दृश्य वहीं रुक गया।
मोहिनी ने झटके से आँखें खोल दीं।
भानु उसे देख रहा था ,उसकी अवस्था देखकर पूछा -"तुम ठीक हो?"
मोहिनी ने धीरे से पूछा—क्या तुमने भी वो दृश्य देखा?
"कौन सा ?
"एक महिला...और एक बच्ची !"
भानु ने सिर हिलाया -"नहीं "
मोहिनी ने गहरी साँस ली ,तो क्या यह सब सिर्फ़ मुझे ही दिख रहा है।"
भानु ने उसका हाथ पकड़ लिया ,"जो भी है किन्तु तुम अकेली नहीं हो।"
मोहिनी ने पहली बार उसकी ओर देखा ,कुछ क्षण तक दोनों की आँखें मिली रहीं।
इस रहस्यमयी हवेली में...इतने सारे झूठ और अधूरे सच के बीच...उस एक पल में मोहिनी को पहली बार थोड़ी सुरक्षा महसूस हुई ,लेकिन वह पल ज्यादा देर नहीं रहा।
सुरंग के अंत में एक छोटा कमरा था ,दरवाज़ा आधा खुला था।अंदर से हल्की रोशनी आ रही थी। मोहिनी धीरे-धीरे भीतर गई ,कमरे में एक मेज़ थी।उस पर एक पुराना टेप रिकॉर्डर रखा था और उसके पास...एक कागज़ !
भानु ने वो कागज़ उठा लिया ,उस पर लिखा था—अगर तुम यहाँ तक पहुँच गई हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हें वह सच दिखना शुरू हो गया है जिसे तुमसे छिपाया गया था।"
नीचे कोई नाम नहीं था ,सिर्फ़ एक और पंक्ति—"रिकॉर्डिंग चलाने से पहले दरवाज़ा बंद कर देना।"
भानु ने तुरंत दरवाज़े की ओर देखा ,वह धीरे-धीरे अपने आप बंद हो रहा था ,घर्ररर...उसने दौड़कर उसे रोकना चाहा ,लेकिन तब तक दरवाज़ा अपने-आप बंद हो चुका था ,ठक!
मोहिनी और भानु कमरे के भीतर बंद थे ,उसी क्षण...टेप रिकॉर्डर अपने-आप चल पड़ा।कुछ सेकंड तक सिर्फ़ खरखराहट सुनाई दी और फिर...एक महिला की आवाज़ आई।
उसे सुनकर मोहिनी के चेहरे का रंग उड़ गया ,क्योंकि वह आवाज़...उसे बिल्कुल अपनी माँ की आवाज जैसी सुनाई दे रही थी।रिकॉर्डिंग में पहली पंक्ति थी—मोहिनी.. अगर तुम यह सुन रही हो, तो याद रखना—मैंने तुम्हें कभी छोड़ा नहीं था।"
भानु ने ,मोहिनी की ओर देखा, मोहिनी की आँखों से आँसू बहने लगे।
रिकॉर्डिंग से आगे स्वर उभरे —मैंने तुम्हें छिपाया था..एक लंबा विराम ! लेकिन उस रात तुम्हें जिस आदमी के साथ भेजा था, वह तुम्हारा दुश्मन नहीं था।टेप अचानक रुक गया और कमरे के बाहर...किसी ने धीरे से दरवाज़े पर दस्तक दी -ठक... ठक...
फिर वही आवाज़ आई—मोहिनी ! दरवाज़ा खोलो !"
इस बार...भानु ने आवाज़ पहचान ली ,उसका चेहरा सख्त हो गया।
"यह किसकी आवाज है ?मोहिनी ने पूछा -कौन है ?"
भानु ने धीरे से कहा—"मेरे पिता।"
