Khoobsurat [part 31]

शिल्पा, अगले दिन ,कॉलिज नहीं गयी, क्योंकि कल वाले हादसे के कारण वो अभी भी घबराई हुई थी,अभी उसका मन विचलित था, किन्तु फिर भी, घर में,कोहराम मच गया। 'समाचार पत्र 'में यह समाचार बड़े -बड़े अक्षरों में लिखा हुआ।'' प्रतियोगिता के बहाने,मिलने आई लड़की '' उसमें अंदर की खबर में लिखा था -'आजकल के बच्चे कैसे होते जा रहे हैं ? न जाने, अपने अनैतिक संबंधों को, बनाए रखने के लिए, घर वालों से न जाने कितने बहाने करते हैं ? झूठ बोलकर, एक लड़की 'ऑडिटोरियम' में घुस आई और जब उसे, कुछ लड़कों ने देख लिया, तो कहने लगी -मैं एक 'कला प्रतियोगिता; के लिए यहां आई हूं। आप उसके झूठ की शुरुआत तो यहीं से सुनिए !सबसे बड़ा झूठ तो, उसने यही बोला है, क्योंकि आज तक उस 'ऑडिटोरियम' में कभी कोई प्रतियोगिता ही नहीं हुई।


 अब आप जानना चाहेंगे ,उस लड़की का नाम क्या है ? किंतु हम उस लड़की का नाम नहीं बताएंगे, इस  खबर को लिखने का हमारा उद्देश्य यही था, आजकल के माता-पिता को, सचेत हो जाना चाहिए , आजकल के बच्चे, कितना झूठ बोलकर, बाहर जाकर क्या-क्या गुल खिला रहे हैं ?

एक जगह लिखा था ''ऑडिटोरियम में मचा बवाल '' आज प्रातः काल की ही बात है , लोगों की ठीक से नींद भी नहीं खुली थी। कुछ लोग टहलने के लिए, खुले स्थानों पर जाते हैं किंतु कुछ लोग, उन स्थानों का दुरुपयोग करते हैं। उन स्थानों को, अपनी मौज- मस्ती के लिए, अपनी आवारा गर्दी का, अड्डा बना लेते हैं। हमारे देश के नेता के नाम पर वह 'ऑडिटोरियम 'खुला हुआ है किंतु कुछ लोगों को ,इतनी भी बात की शर्म नहीं है, कम से कम उनके नाम की लाज रख लें। उस लड़की का कहना है -'कि जो लड़के वहां पर मौजूद थे , वो ही उसे छेड़ रहे थे, किंतु मिली जानकारी के आधार पर हम कह सकते हैं, वह लड़की उस इलाके की थी ही नहीं, वह किसी दूसरे इलाके से आई थी , उन लड़कों का कथन है -'वे तो प्रतिदिन उस 'ऑडिटोरियम' में, घूमने और टहलने के लिए जाते हैं,इस बात की पुष्टि के लिए हमने वहां के' सुरक्षाकर्मी' से भी पूछा। 

उसका भी यही कथन है -वो लड़के प्रतिदिन वहां आते रहे हैं , उस लड़की को देखकर,ही नहीं आए थे , अब आप समझ ही सकते हैं कि आजकल की लड़कियां कैसी होती जा रही है ? लड़की के घर- परिवार की इज्जत और मान - सम्मान के लिए हमने उसका नाम नहीं बताया है। इतना बवाल मचाने पर भी, उसका वह दोस्त आता है और उसके साथ वह मोटरसाइकिल पर चली जाती है। 

उस सूचना को पढ़कर, शिल्पा को बहुत क्रोध आया। इन लोगों ने क्या-क्या लिखा है ?' तिल का ताड़' बना दिया है, ऐसा तो कुछ भी तो नहीं हुआ था, कुछ धुंधली सी तस्वीरें भी थी, जिसमें उसके चेहरे को छुपाया गया था। उन्हें देखकर तो लग रहा था - सच में ही वहां, कुछ बड़ा बवाल हुआ है। 

यह समाचार शिल्पा की मम्मी, कल्याणी जी ने भी पढ़ा, इस समाचार पत्र को पढ़कर, उन्होंने सोचा, कल तो शिल्पा भी, किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने गई थी, कहीं यह समाचार, उसी जगह का तो नहीं ,उन्होंने तो सोचा भी न होगा ,कि ये समाचार उनकी, अपनी बेटी का भी हो सकता है। तभी शिल्पा की मम्मी, उसके पास आती हैं और शिल्पा से पूछती हैं -कल तुम्हारी भी प्रतियोगिता थी, तुमने मुझे क्यों नहीं बताया ?

इसमें क्या बताना है ? ऐसी प्रतियोगिताएं तो अक्सर होती रहती हैं , आप जानती ही हैं, मैं प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती रहती हूं। 

वैसे वह प्रतियोगिता कहां पर थी ?

शिल्पा ने कोई जवाब नहीं दिया, वह चुप हो गई , वो जानना चाहती थीं  कि शिल्पा प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए कहां गई थी ?

एक' ऑडिटोरियम' था ,

 वो समझ गईं कि यह उसी की बात कर रही है, क्या वहां कोई प्रतियोगिता हुई थी ?किन्तु शिल्पा ने कोई जबाब नहीं दिया। 

मैं तुमसे क्या पूछ रही हूँ ?उन्होंने अपने शब्दों पर दबाब बनाया ,शिल्पा को चुप देखकर, उन्हें क्रोध आया और उसके सामने समाचार- पत्र रखकर पूछा - क्या इसी ''ऑडिटोरियम'' में पर वह प्रतियोगिता हुई थी ?

 उनके समाचार- पत्र को सामने रखते ही, शिल्पा रोने लगी और बोली -मम्मी !मैं धोखा खा गई, वहां कोई प्रतियोगिता नहीं थी , कहते हुए उसने सारी बात अपनी मम्मी को बता दी।

 उसकी बातें सुनकर वे उस पर बेहद नाराज़ हुईं, तेरे साथ इतना सब कुछ हो गया और तूने मुझे एक बार भी हमें  बताना उचित नहीं समझा, नाराज होते हुए वो बोलीं - तुझे हमें तो फोन करना चाहिए था। इस तरह तू कहीं भी कैसे जा सकती है ? क्या तुझ में इतनी भी अक्ल नहीं है ? इन लोगों ने तेरा चेहरा और नाम नहीं बताया है किन्तु यदि ऐसा होता तो क्या होता ?कितनी बदनामी हो जाती ?ये झूठी ख़बर फैलाने वाले कौन होते हैं। मिडिया वाले हैं तो क्या, इन्हें झूठी खबरें छापने का अधिकार मिल गया ,या अपनी ख़बर को बेचने के लिए कुछ भी उल्टा -सीधा कैसे छाप सकते हैं ?आने दे ,तेरे पापा को ,मैं उनसे बात करूंगी या तो वो कहेंगे वरना मैं फोन करूंगी। 

नहीं ,मम्मी !आप ऐसा कुछ भी नहीं करेंगी ?आप ये तो देखिये !इसमें कहीं भी ,मेरा नाम नहीं है ,न ही तस्वीर, इतनी स्पष्ट है ,आपके ऐसा कुछ भी करने से हो सकता है ,बात बढ़ जाये ,इस बात को यहीं दबा देते हैं ,यदि मेरा नाम होता तब तो हमें, उनसे कहने का अधिकार बनता था ,इस विषय में आप पापा से भी, कुछ नहीं कहेंगी ,अब वो लड़की तो कोई भी हो सकती है।

शिल्पा की बात सुनकर कल्याणी जी थोड़ा शांत हुईं ,तब अपनी बेटी से ही बोलीं -हमने कभी भी तुम पर कोई बंदिश नहीं लगाई ,तुम्हें आगे बढ़ने और पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया किन्तु तुम्हें इस तरह की लापरवाही उचित लगती है। तुम पढ़ी- लिखी हो,उस प्रतियोगिता के विषय में सम्पूर्ण जानकारी पहले ही लेनी चाहिए थी। ये नहीं कि कुछ भी छपा देखा और तुम बिना जानकारी के दौड़ चलीं। सोचकर ही मेरी रूह काँप गयी। ऐसा कुछ गलत तुम्हारे साथ नहीं हुआ ,यदि हो जाता तो.... जिंदगी भर का कलंक लग जाता ,तुम इस गलती के लिए स्वयं को भी ,माफ नहीं कर पातीं। 

मम्मी !मैं समझती हूँ किन्तु उस पर्चे में, उसमें बड़े-बड़े कलाकारों का आगमन लिखा हुआ था इसलिए मुझे लालच आ गया था।

यही लालच तो इंसान को मारता है , मुझे दिखा !वो पर्चा कहां है ?

 आते समय वह तो मैंने वहीं कहीं रास्ते में फेंक दिया था। 

तेरे भेजे में, तनिक भी अक्ल नहीं है, उस विज्ञापन के माध्यम से, मैं इन झूठी खबर लिखने वालों की भी खबर लेती। 

मैंने वहां उपस्थित सभी लोगों को, दिखाया था। 

फिर भी, उन्होंने तेरी कोई बात नहीं मानी। 

जीवन में ,कई बार ऐसी बातें हमारे साथ घटित हो जाती हैं ,जिनके विषय में ,इंसान ने सोचा भी नहीं होता,वे हादसे जीवन को एक सबक़ देकर चले जाते हैं ,अथवा जीवनभर की परेशानी का सबब बन जाते हैं। या फिर आने वाली घटनाओं संदेश !किन्तु ये तो उस इंसान पर निर्भर करता है वो इन परिस्थितियों से कैसे बाहर आता है ?चलिए !शिल्पा के विषय में यही जानने के लिए आगे बढ़ते हैं।  



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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