स्नेह की, माटी में पनपी ,
परवाह की बूदों से,सिंचित।
ज्ञान की लौ से ,जन्मी।
चलती ये ,रिश्तों की बेल !
गहरी, जड़ों का,संयोजन !
उतना ही ,सुंदर अंकुरण ।
बढ़ती खट्टी -मिठ्ठी रिश्तों की बेल !
कुछ लहराती ,बलखाती ,
उलझती कभी, उलझाती सी।
बढ़ती गयी ,रिश्तों की बेल !
देख न..... पीछे मुड़कर ,
चलती गयी, रिश्तों की बेल !
इक पड़ाव पर कुछ रिश्ते टूटे ,
बिखरे ,टूटकर बिखरते गए।
छुट गए ,कुछ रिश्ते बिछड़ गए।
मोह ,अहं की दीमक लगी।
लोभ ,ईर्ष्या से जा लिपटी।
प्रेम पूर्ण वो रिश्तों की बेल !
ढूंढती, आलंबन अपनों का।
कुम्हलाने लगी ,रिश्तों की बेल !
पीत वर्ण, बन कुछ पात !
छूट गयी, रिश्तों की बेल !
अज्ञान ,अंधकार में डूबी।
स्व की सोच से पनपी,क्षीण ,
अहम की लाठी ,अर्थ सोपान !
दीन -हीन बनी, रिश्तों की बेल !
''अर्थ ''की माटी से पनपी ,
नागिन सी बलखाती, रिश्तों की बेल !
'तड़पती' प्रेम की माटी को ,
स्वार्थ की धूप में ,बढ़ी रिश्तों की बेल !
खोजती, आज अपना अस्तित्व !
कहाँ गयी ? प्रेम पूर्ण वो जड़ें !
कोसती एक -दूजे को रिश्तों की बेल !
जड़ों से दूर ,टूटे पात से ,
अस्त -व्यस्त चलती रही रिश्तों की बेल !
