Rishton ki bel

स्नेह की, माटी में पनपी  ,

परवाह की बूदों से,सिंचित।

ज्ञान की लौ से ,जन्मी। 

चलती ये ,रिश्तों की बेल !


 गहरी, जड़ों का,संयोजन !

 उतना ही ,सुंदर अंकुरण । 

बढ़ती खट्टी -मिठ्ठी रिश्तों की बेल !

कुछ लहराती ,बलखाती ,

उलझती कभी, उलझाती सी। 

बढ़ती गयी ,रिश्तों की बेल !

देख न..... पीछे मुड़कर ,  

 चलती गयी, रिश्तों की बेल ! 

इक पड़ाव पर कुछ रिश्ते टूटे ,

बिखरे ,टूटकर बिखरते गए। 

छुट गए ,कुछ रिश्ते बिछड़ गए। 

मोह ,अहं की दीमक लगी। 

लोभ ,ईर्ष्या से जा लिपटी। 

प्रेम पूर्ण वो रिश्तों की बेल !

ढूंढती, आलंबन अपनों का। 

कुम्हलाने लगी ,रिश्तों की बेल !

पीत वर्ण, बन कुछ पात !

 छूट गयी, रिश्तों की बेल !

अज्ञान ,अंधकार में डूबी। 

 स्व की सोच से पनपी,क्षीण ,

 अहम की लाठी ,अर्थ सोपान !

दीन -हीन बनी, रिश्तों की बेल !

''अर्थ ''की माटी से पनपी , 

नागिन सी बलखाती, रिश्तों की बेल !

'तड़पती'  प्रेम की माटी को ,

स्वार्थ की धूप में ,बढ़ी रिश्तों की बेल !

खोजती, आज अपना अस्तित्व !

कहाँ गयी ? प्रेम पूर्ण वो जड़ें !

कोसती एक -दूजे को रिश्तों की बेल !

जड़ों से दूर ,टूटे पात से ,

अस्त -व्यस्त चलती रही रिश्तों की बेल !


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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