Woh ladki

वो लड़की ! जो कभी अधिकार जतलाती थी। 

बात -बात पर जिद करके बात अपनी मनवाती थी। 

 आज वो गुमसुम सी हो गई है।

 न जाने, वो चुलबुली सी लड़की कहां खो गई है ? 


लड़ती थी, चिल्लाती थी,घर में कोहराम मचाती थी।

इच्छा पूर्ण न होने पर घर को सिर पर उठा लेती थी।  

आज क्यों वो गुमसुम सी हो गई है ?

 न अब जिद करती है ,चुपचाप सब सहन करती है। 

अपने ही गम की परछाइयां में कहीं खो सी गई है।

 लगता है , उम्र संग समझदार हो गयी है। 

 वो लड़की !न जाने कहाँ खो गयी है ?

 वह बिन त्यौहार ही, घर में रौनक ले आती थी। 

अधिकार से कभी भी, मायके चली  आती थी। 

 अपनी ही तन्हाइयों में कहीं गुम सी हो गयी है।

 न जाने ,वो लड़की !कहाँ खो  गयी है ? 

आज वो अंगना, आवाज से उसकी गूंजता नहीं ,

 सूना अंगना, अब चहकता नहीं,

बचपन की परछाइयों में, कहीं गुम हो गई है।

न जाने ,वो 'सोन चिरैया 'कहाँ खो गयी है ? 

प्रतीक्षा में हम हैं ,या वो प्रतीक्षा करती होगी।

उदास बैठी, राह वो हमारी  तकती होगी। 

उसके मौन में ,कुछ दबी शिकायतें रह गयी हैं।  

 जाने क्यों ? वो अंगना अपना भूल गई है ?

 न जाने ,वो लड़की ! कहाँ खो  गयी है ?

अधिकार से अब लड़ती नहीं ,हक़ जतलाती नहीं। 

अब तक जिन रिश्तों से अनजान थी ,जान गई है। 

वो  ज़िद्दी सी लड़की ! न जाने कहां खो गई है ?


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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