वो लड़की ! जो कभी अधिकार जतलाती थी।
बात -बात पर जिद करके बात अपनी मनवाती थी।
आज वो गुमसुम सी हो गई है।
न जाने, वो चुलबुली सी लड़की कहां खो गई है ?
लड़ती थी, चिल्लाती थी,घर में कोहराम मचाती थी।
इच्छा पूर्ण न होने पर घर को सिर पर उठा लेती थी।
आज क्यों वो गुमसुम सी हो गई है ?
न अब जिद करती है ,चुपचाप सब सहन करती है।
अपने ही गम की परछाइयां में कहीं खो सी गई है।
लगता है , उम्र संग समझदार हो गयी है।
वो लड़की !न जाने कहाँ खो गयी है ?
वह बिन त्यौहार ही, घर में रौनक ले आती थी।
अधिकार से कभी भी, मायके चली आती थी।
अपनी ही तन्हाइयों में कहीं गुम सी हो गयी है।
न जाने ,वो लड़की !कहाँ खो गयी है ?
आज वो अंगना, आवाज से उसकी गूंजता नहीं ,
सूना अंगना, अब चहकता नहीं,
बचपन की परछाइयों में, कहीं गुम हो गई है।
न जाने ,वो 'सोन चिरैया 'कहाँ खो गयी है ?
प्रतीक्षा में हम हैं ,या वो प्रतीक्षा करती होगी।
उदास बैठी, राह वो हमारी तकती होगी।
उसके मौन में ,कुछ दबी शिकायतें रह गयी हैं।
जाने क्यों ? वो अंगना अपना भूल गई है ?
न जाने ,वो लड़की ! कहाँ खो गयी है ?
अधिकार से अब लड़ती नहीं ,हक़ जतलाती नहीं।
अब तक जिन रिश्तों से अनजान थी ,जान गई है।
वो ज़िद्दी सी लड़की ! न जाने कहां खो गई है ?
