Jee nahi karta

 जी नहीं करता , फुर्ती से उठ रसोई में जाऊँ।

पहले की तरह , खूब व्यंजन बनाऊं।  

 जी चाहता है ,कोई आकर कहे-खाना बनाया है। 

  कैसा बनाया है ? चखकर तो बताइये !

 सोचती हूँ ,कोई आकर कहे! भोजन तैयार है। 

 आकर भोजन कर लीजिये !

बेफ़िक्र हो ,ज़िंदगी से ,ज़िंदगी का मज़ा लीजिये। 


इंतजार सा रहता है, हाथों से बदले स्वाद का ,

कुछ नया बनाया है,खाने में बदलाव आया है।  

लड़ीं  हैं ,बहुत ज़माने से और अपने आपसे।

कोई कहे !अब तो थोड़ा आराम कर लीजिये। 

 

कब तक? इस तरह गमों को उठाती रहेंगी ?

थकन है, ज़िंदगी भर की, मिटा लीजिये। 

मन करता है,कोई तो कहे- आराम कीजिये !

उत्तरदायित्वों से मुक्त हो,विचरण कीजिये।

 

न कांधे पर कोई भार,चिंता से मुक्त जियें।

ज़िंदगी है ,आपकी थोड़ा तो मज़ा कीजिये।

कैद रहेंगीं ,कब तक ? अपने आप में ,

इस ज़िंदगी को थोड़ा सा तो ढ़ील दीजिये।     

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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