Zeenat [part 68]

ज़ीनत आगे बताती है - जब मैं डॉक्टर के पास गयी थी ,उसने अपनी उस नर्स को बुलाया और उससे कुछ कहा। 

वो, मेरे पास आई और बोली -मेरे साथ चलो ! मैं उसके पीछे गयी ,तब वो बोली -तुम्हें ये बिमारी कब से है ?

कौन सी बीमारी ? 

क्या तुम नहीं जानतीं ? तुम्हें 'एड्स 'है। 


ये क्या है ? आसिफ़ ने तो कहा था - मुझे छूत की बिमारी हो गयी है ,इसीलिए उसने मुझे घर से निकाल दिया। 

उसने, तुम्हें घर से निकाल दिया ,क्या उसने भी अपनी जाँच करवाई थी ? हो सकता है ,उसे भी ये बीमारी हो। 

मुझे नहीं पता ,उसे ये बिमारी है या नहीं ,तभी तो उसने ,मुझे घर से बाहर कर दिया। उसने मुझे अज़ीब नज़रों से देखा। तब मुझे डर लगा ,जहाँ मैं काम करती हूँ ,उन्हें पता चल गया तो वे भी मुझे घर से निकाल  देंगे ,कहते हुए मैं रोने लगी। 

तब वो बोली - तुम्हारा पति बहुत ख़राब है ,जो उसने, तुम्हें ये बिमारी दी और तुम्हें छोड़ दिया। 

क्या मैडम जी ! उसने, मुझे ये बिमारी दी है ? ये बात सुनते ही मुझे उस पर बहुत गुस्सा आया ,कितना मतलबी था , मुझसे निक़ाह करेगा ,कहकर मुझसे पैसा कमवाया और बिमारी देकर भगा दिया। 

क्या उसे भी बुखार होता था ?

नहीं तो... उसने मेरी तरफ देखा और बोली - जब किसी से शारीरिक संबंध बनाते हैं ,तब ये बीमारी होती है।

आसिफ़ तो कह रहा था -' छूत' की बिमारी है। 

हाँ ,ये बीमारी तुम्हें है ,यदि तुम किसी के पास सोऊंगी तो उसे भी ये बिमारी हो जाएगी। तुम समझ रही हो न...

तब मुझे पता चला पुलिस जी ,मेरे ये बिमारी कैसे हुई ? न जाने कौन ? मुझे ये बिमारी दे गया। 

जब उस नर्स ने कहा - ये बीमारी कभी ठीक नहीं होती ,तब मैं रोने लगी।

 या अल्लाह ! तूने, मुझे मेरे कौन से गुनाहों की सज़ा दी है। मेरे अम्मी -अब्बू  नहीं रहे ,मेरा बहनोई  -बहन  नहीं मिल रहे ,मेरा घर भी कहीं खो गया। अब मैं कहाँ जाऊँ ? वो मेरा शौहर नहीं था ,जो मुझे यहाँ से ले गया था ,उसने कहा था -मुझसे बहुत प्यार करता है और वहां मुझसे धंधा करवाता रहा। 

देखो ! रो मत ! पास में ही सरकारी दवाइयों की दुकान है ,वहां तुम्हें ये दवाइयां मुफ़्त में मिल जाया करेंगी ,जब दवाई ख़त्म हो जाएँ ,तभी यहां से ले जाना। तुम ठीक रहोगी। जैसे बताई जाएँ ,वैसे ही खाना ! अब किसी से संबंध  मत बनाना वरना ये बिमारी उसे भी लग जाएगी। बस अपनी वक़्त से दवाई लेती रहना ,कुछ नहीं होगा। 

देखो न... पुलिस जी ! मुझे तो पूरी ज़िंदगी का दुःख मिल गया। 

उसकी आँखों में दर्द और निराशा थी। वो' पगली 'दिखती थी किन्तु ऐसे हालात तो किसी को भी पागल कर दें। जहाँ क़दम -क़दम पर धोखा ही मिले। 

  मुझे न जाने, मेरे कौन से गुनाहों की सज़ा मिल रही है ? अब मुझे आसिफ़ का असली चेहरा नज़र आ रहा था। वो तो मुझसे मुहब्बत करता ही नहीं था।

जब मैं, घर पहुंची, जहाँ काम करती थी ,तब मैंने देखा मेरा सामान बाहर पड़ा हुआ था। मैं अपना सामान घर के बाहर देखकर परेशान  हो गयी। मैं धूप में खड़ी होकर, बहुत देर तक उनका दरवाज़ा पीटती रही पर उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला। मैंने सोचा ,शायद वे सो रही होंगी इसीलिए थोड़ी दूर पर एक खाली जगह पड़ी थी। मैं वहीं जाकर लेट गयी। मुझे आते -जाते लोग देख रहे थे। पहले जब कोई मुझे देखता था ,तब मुझे ख़ुशी होती थी कि अब पैसे मिलेंगे किन्तु अब जब कोई मुझे देखता तो मुझे गुस्सा आता। उन लोगों को देखती ,किसमें वो छूत की बिमारी होगी ?

जब सूरज ,ढल गया ,नमाज़ भी पूरी हो गयी ,तब मैं फिर से उसी घर में गयी। आंटी !आंटी दरवाज़ा खोलो !

बहुत देर बाद वो आईं और बोलीं -अब हमें, तुम्हारी जरूरत नहीं ,कहकर उन्होंने दरवाज़ा बंद कर लिया। उन्होंने मुझे बताया भी नहीं ,मुझे काम से क्यों निकाल दिया ?

उन्हें तुम्हारी बिमारी के बारे में पता चल गया होगा ,मनोरमा बोली। 

पुलिस जी ! मैंने तो उन्हें बताया ही नहीं था, मैं तो उनके घर भी नहीं पहुंची थी ,मेरा सामान बाहर ही रखा था। 

तुझे, उन्होंने ही तो डॉक्टर के पास भेजा था न... तब उन्होंने डॉक्टर से ही पूछ लिया होगा कि आखिर उस लड़की को क्या बीमारी है ?

हाँ ,ठीक कह रही हो ,उसने ऐसे दिखाया जैसे उसके दिमाग़ की बत्ती जली। कोई भी ठीक नहीं है, डॉक्टर को बताने की क्या जरूरत थी ? वो गुस्से से बोली - उसने मेरा घर भी छुड़वा दिया, मेरा काम भी छुड़वा दिया और मैं सड़क पर आ गई।  

इसमें गुस्से वाली क्या बात है ?कभी न कभी तो उन्हें पता ही चलता, तब भी वो  बाहर निकालतीं उनकी कोई गलती नहीं है, जो भी तुम्हारी बीमारी के विषय में सुनेगा, तो वह यही करेगा। 

पुलिस जी !मैं भूखी प्यासी, उस खाली जगह पर पड़ी थी, जहां पर शराबी घूम रहे थे। नर्स ने मुझसे कहा था-' अब किसी से बात मत करना किंतु मुझे भूख लगी थी। मेरे पास खाने को कुछ भी नहीं था।  तब एक शराबी मेरे पास आया और बोला -मेरे साथ चलेगी।''

 मैंने कहा नहीं, मुझे बहुत ज़ोर की भूख लगी है। तब वह बोला -तुझे खाना खिलाऊंगा। आजा  मेरे साथ चल....

मैं क्या करती ? मेरे पेट में आग जो लगी थी, भूख लग रही थी। वह मेरे सामने बैठा शराब पी रहा था, और बहुत सारा सामान खा रहा था। मुझसे  रहा नहीं गया, तब मैं भी उठी और मैंने  भी थोड़ी सी शराब पी और उसके साथ खाना भी खाया। मैं तो मैडम जी , उसके साथ जाना भी नहीं चाहती थी किंतु क्या करती ?उसने खाने को जो दिया था इसलिए उसके साथ चली गई।

 सुबह आँख खुलते ही, उसने भी भगा दिया। सब लोग मतलबी हैं ,जब अपना मतलब निकल जाता है तो कोई साथ नहीं देता। मैं कई रातों तक सड़कों पर धक्के खाती रही।  मुझे किसी ने कोई काम नहीं दिया।मुझे भिखारी समझते थे। 

 एक सड़क से दूसरी सड़क चलती रही। मेरे पास पैसे भी नहीं थे। कोई खाने को दे देता तो खा लेती। एक दिन मुझे अपना घर मिल गया , उसमें मेरी बहन के बच्चे रह रहे थे।

पुलिस जी !मैं उसी घर के पीछे सोइ थी ,सोचकर मुस्कुराई , जो मेरी मां ने मुझे मेरे लिए दिया था। 

मैं अपने घर में रहने के लिए गयी , पर उसमें मेरी बहन के बच्चे रह रहे थे। पहले तो उन्होंने, मुझे बहुत डांटा और बोले -तुम यहां वापस क्यों आई हो  ? 

बताओ पुलिस जी ! मैं  अपने घर में ही नहीं रह सकती। 

क्या सच में ही वो तुम्हारा घर था ?तुम्हें पक्का याद है। 

हाँ ,मुझे पक्का याद था ,बहन तो दूसरी जगह रहती थी।  मैंने, उनसे कहा -मेरी बहन से मिलवा दो ! तो मुझसे लड़ने लगे उसके बड़े लड़के ने तो मेरे डंडे भी बजाएं ! मैं बहुत चिल्लाई ! मोहल्ले वालों ने उसे बहुत डांटा। वह तो मुझे भी डांट रहे थे क्योंकि उन्होंने कह दिया था - यह भिखारिन जबरदस्ती हमारे घर में घुस आई है।

 तब मैंने उनसे कहा था ? यह मेरी अम्मी का घर है, मेरी अम्मी ने मेरे लिए दिया था। एक आदमी मुझे पहचान गया, और तब उसने कहा-' हां, यह इसका ही घर है। तब उन्होंने मुझे, मेरे घर में घुसने दिया। अब बताओ !पुलिस जी ,मेरी क्या गलती है ?


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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