एकांत मिलते ही ,दमयंती ने, अपनी मां को अपनी ससुराल के विषय में बताया ,उन लोगों की सोच के विषय में बताने ही वाली थी ,तभी उन्होंने मेरी सोच के लिए मुझे धिक्कारा और डाँटते हुए बोलीं - इतना अच्छा परिवार तुम्हें कहां मिलेगा ? तुम्हारा कितना ख्याल रखते हैं ?और इतना प्यार करने वाला पति,क्या तुम्हें यहां कोई कष्ट दे रहा है ? तुम्हें तो खुश होना चाहिए वरना आजकल भाई-भाई में झगड़ा होने में, देर नहीं लगती,यहाँ सभी एकसाथ प्रेम से रहते हैं।
मुझे उनसे उम्मीद थी, कि वह मुझे कोई अच्छी सलाह देंगीं और मेरे दर्द को भी समझेंगीं किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ। मुझे अपनी माँ की सोच पर भी आश्चर्य हो रहा था या फिर वो मेरी कोई बात समझना ही नहीं चाहतीं थीं ,कैसे लोग हो गए हैं ?अपने ही , अपनों का साथ देते नजर नहीं आ रहे थे। तभी समझाते हुए मम्मी बोलीं -इतना बड़ा परिवार है ,भले ही, ये लोग कैसे भी हों किन्तु तुम्हारा तो ख़्याल रखते हैं ,देखा नहीं ,दामाद जी, तुमसे कितना प्यार करते हैं ,तुम्हें और क्या चाहिए ?
वही तो मुझे आश्चर्य होता है ,जो ठाकुर ख़ानदान अपनी हेकड़ी [अकड़ ]और दादागिरी के लिए जाना जाता है किन्तु ये लोग घर में आकर कैसे ''भीगी बिल्ली बन जाते हैं ?
यह तो अच्छी बात है, इस बात से तेरा क्या मतलब है ? क्या वो घर में आकर तेरे साथ अनुचित व्यवहार करें ?वे लोग जैसे भी हैं ,बहुत अच्छे हैं ,घर में अच्छे से रहते हैं ,वरना ज़्यादातर लोग तो, बाहर का क्रोध भी अपने घर ले आते हैं और घर के लोगों पर ही ,अपना क्रोध उतारते हैं। अभी तुम इस बात को नहीं समझोगी किंतु बाद में समझ जाओगी ?
मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, क्या यह सब ठीक है, वे सही कह रही हैं और मैं ही गलत हूं। कुछ दिनों के पश्चात मैं, घर वापस आ गई। घर में खुशियां छा गयीं थीं, घर में 'जच्चा ' गाई जा रही थी।ठाकुर साहब के घर में, उनका पहला पोता आया था ,उसका रुदन भी, उन्हें सुखानुभूति पहुंचा रहा था।उन्होंने मेरी मम्मी को भी धन्यवाद दिया ,कि उनकी बेटी के क़दम शुभ हैं ,आते ही, पोते का मुख दिखला दिया।
तब मैंने एक दिन, अपनी सास को यानी कि सुनयना देवी को, ज्वाला को डांटते हुए सुना -ये तो अच्छा हुआ, स्वामी जी ने ताबीज बनाकर दे दिया था, वरना तुमने तो गलती करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। तुमसे किसने कहा था, कि बहू को सब कुछ सच-सच बता दो ! वह धीरे-धीरे अपने आप ही तैयार हो जाती। वह तो स्वामी जी की कृपा दृष्टि का असर है कि वह अब तक यहां पर टिकी हुई है। तुम लोगों से कितनी बार कहा है ,कि मेरा कहना माना करो ! किन्तु लगता है ,तुम पर मेरी बातों का कोई असर नहीं होता। मैं जो भी कर रही हूँ ,इस हवेली की बेहतरी के लिए ही तो कर रही हूँ।
जब तक बच्चा एक महीने का नहीं हो गया,' जगत जी' रोज आते और उसे देर तक खिलाते ,प्यार करते उन दोनों का प्रेम देखकर मैं भी जैसे अब ज्वाला के प्रेम को भूलने लगी थी ,या ऐसे समझो !वो बीते दिनों की बातें लगने लगीं थीं। हमारी ज़िंदगी सही पटरी पर जा रही थी, किन्तु न जाने क्यों ?मुझे लगता था मेरी अभी और परीक्षाएं बाक़ी थीं ,मुझे अभी और इम्तिहान देने थे। अपना' गर्वित' अब बड़ा हो रहा था ,जब वो एक माह का हुआ तो जगत जी का आना तीसरे अथवा चौथे दिन होने लगा और उसके छह माह के होते ही ,उन्होंने आना बंद कर दिया।
मैं अपनी ज़िंदगी को सही पटरी पर लाना चाहती थी ',गर्वित' के होने के पश्चात उन्होंने मुझे एक बार भी नहीं छुआ था ,न ही, ऐसी कोई इच्छा जतलाई। वे न जाने कहां चले गए ? कुछ समझ नहीं आया ,मुझसे कहकर भी नहीं गए। अब ज्वाला ही मेरा और बच्चे का ख्याल रखता, कोई भी परेशानी होती ,हाज़िर हो जाता। मुझे अब ज्वाला का साथ अच्छा ही लग रहा था। कुछ दिनों के पश्चात ही सही ,हम थोड़ा क़रीब तो आये ,किन्तु अब मुझे कभी - कभी अपने बच्चे के पिता की कमी खलने लगती। जब मैंने घरवालों से उनके विषय में पूछा -तो उन्होंने बताया -''काम के सिलसिले में विदेश गए हैं।
उनकी दूरी के कारण मैं,अब अपने ज्वाला की तरफ खिंचने लगी। धुले ,सूखे कपड़े उतारने के बहाने हम छत पर जा बरसात में भीगते किन्तु जब दो जवाँ दिल बरसात में भीगते हैं ,तो ठंडक नहीं बल्कि आग भड़कती है ,दो 'धडकते दिल' सुलगने लगते हैं। ऐसा ही हाल कुछ, मेरा और ज्वाला का भी हो रहा था। ये मैं जानती थी ,इन लोगों की सोच क्या है ?किन्तु मैं सतर्क थी ,मुझे मेरा ज्वाला मिल जाये ,मुझे और कुछ नहीं चाहिए।
कई बार बेख़ौफ उसके कमरे में जा उसे डरा देती ,मुझे अब अपने बच्चे की भी परवाह नहीं थी क्योंकि वो मेरे पास, मेरे दूध के लिए ही आता था। अब मेरे बदन में चिंगारियां सी सुलगने लगीं थीं। अब मुझसे ज्वाला से दूरी सही नहीं जा रही थी। मैं भी अपने प्यार में ,इस बात से अनजान थी कि मेरे विरुद्ध फिर से एक षड्यंत्र रचा जा रहा था।
आज मैंने ज्वाला के कान में कुछ कहा और अपने कमरे में आ गयी। आज मेरा,अपने ज्वाला के प्रेम में खूब भीगने का मन था ,अपने जगत जी को धोखा दे रही हो !तभी मन ने धिक्कारा। अपने आपको समझाया,धोखा कैसा ?वे तो पहले से ही सब जानते हैं।
मैं निर्वस्त्र अपने स्नानागार में ,सारी तैयारी के साथ ज्वाला प्रतीक्षा में थी ,उसने कहा था -चोरी से, चुपके से आएगा। मेरा बेटा ,अब अपनी दादी के साथ ही सोने का आदि हो गया था। तभी मुझे बाहर से कोई आहट सुनाई दी ,मन ही मन मैं, मुस्कुरा उठी ,मेरे दिल में ,प्यार के न जाने कितने दिए जल उठे ?तभी धीमे स्वर में ,मैं बोली -अंदर आ जाओ !
कुछ देर पश्चात ,एक हृष्ट -पुष्ट तन मेरे सामने खड़ा था ,रौशनी न के बराबर थी किन्तु आकृति तो नजर आ ही रही थी। मैं जैसे नशे में थी ,वो नशा जवानी का था या फिर कुछ और, मैं उस आकृति से लिपट गयी ,जैसे बरसों की प्यासी धरती की आज प्यास बुझेगी। इस बात से मैं बहुत खुश हो गई। मैं फिर से अपनी ज़िंदगी में वापस लोेट रही थी। मैं अपनी पिछली बातों को भूलती जा रही थी और एक नई दुनिया में खो जाना चाहती थी।
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