जब पुलिस की तहकीकात शुरू हुई है, तो धीरे-धीरे कॉलेज के, अन्य भेद भी खुलने आरंभ हो गए हैं , जिस और किसी का ध्यान भी नहीं जाता था, आज उस' कार्तिक भैया 'की भी धीरे-धीरे पोल खुल रही थी , परत दर परत, जुर्म की नई कहानी खुल रही थी। इसमें 'कार्तिक चौहान' का नाम भी आ जाता है , तब इंस्पेक्टर साहब सुमित और रोहित से पूछते हैं -क्या कार्तिक चौहान अकेला ही कार्य करता है ?
हमारे कॉलेज में तो वे अकेले ही आते हैं, उनका कितना बड़ा समूह है या बाहर उनके कितने मित्र हैं ?यह हम नहीं जानते।
तब तुम्हारे 'कार्तिक भइया' ने तुम्हारी, किस तरह से सहायता की ?
इंस्पेक्टर की बात से फिर दोनों एक दूसरे को देखने लगे, देखो ! इस तरह एक दूसरे को देखने से कोई लाभ नहीं है। सीधी और सच्ची बात बताओ ! इस बार रोहित ,बात बताने के लिए पूरी तरह तैयार हो गया था। दरअसल सर! बात यह थी, कार्तिक चौहान हमारा सीनियर था। बड़े तड़क-भड़क तरीके से, और बड़े खर्चीले अंदाज में, कॉलेज में रहता था महंगे- महंगे कपड़े पहनता था दादागिरी में चलता था। जब हम उस कॉलेज में आये तो वो हमारा आदर्श बन गये । हमें भी लगा, कि हमें भी ऐसे ही रहना चाहिए। हम उनकी नकल करते, उनके साथ रहने लगे, उनका जीवन तो ऐसे ही मौज मस्ती का वाला था। धीरे-धीरे उनके साथ रहने से, हमारा ध्यान पढ़ाई से हटता चला गया। जब हम फेल हो गए, तो हमारे घर वालों ने हमें खूब डाँटा धमकाया और हमारा खर्चा देना बंद कर दिया। अब हम परेशानी में आ गए थे, तब कार्तिक भइया ने हमारी सहायता की।
वही तो मैं तुम लोगों से पूछना चाहता हूं, कि उसने किस तरह से तुम्हारी सहायता की ?उसके इस तरह के रहन -सहन के लिए उसके पास पैसा कहाँ से आता था ?
वो तो हम नहीं जानते ,वो किस परिवार से हैं या उनके पास पैसा कहाँ से आता था ? उन्होंने हमें कुछ गोलियां लाकर दी, और कुछ पुड़िया और कहने लगे -यह कुछ छात्रों को में बेच दो !आजकल इन्हें बहुत खरीदते हैं। हमें इस विषय में कोई जानकारी नहीं थी किंतु उनसे हमें पैसा अच्छा मिल रहा था इसलिए हमने यह कार्य किया। धीरे-धीरे उस कार्य को करनेा हमें अच्छा लगने लगा।
वह गोलियां और पुड़िया कैसी थीं ? क्या तुम ड्रग्स बेच रहे थे ? इंस्पेक्टर का चेहरा कठोर हो गया।क्या तुमने कभी उससे पूछा नहीं ,कि ये गोलियां कैसी हैं ?
सर !हम नहीं जानते थे कि वह सब नशीले पदार्थ हैं , हम तो पैसे के लालच में यह कार्य कर रहे थे।एक दिन मैंने यह बात जानने का प्रयास किया रोहित ने बताया।
तब तुम्हारे देवता 'कार्तिक 'ने तुम्हें क्या बताया ?
मेरी बात सुनकर वो हंसने लगे और बोले -इसका सेवन करके देखो !स्वयं ही पता चल जायेगा , एक सुंदर दुनिया में पहुंच जाओगे !जिज्ञासावश मैंने वे गोलियां खाईं , जब पता चला,उससे कोई लाभ नहीं था क्योंकि हम भी, उनका सेवन करने लगे थे। खर्चे के लिए पैसों की आवश्यकता थी अब यह हमारी मजबूरी बन गया था।
क्या तुम जानते हो ? नशा बेचने वालों को कितने साल की सजा होती है ?
जी, हम नहीं जानते ,
यह सब सामान तुम्हें' कार्तिक चौहान' ही लाकर देता था और इसी' कार्तिक चौहान' ने नितिन की भी सहायता की और नितिन तो तुम सबसे आगे ही निकल गया इस सबसे उसने बहुत पैसा कमाया और उस पैसों को वह पार्टियों में उड़ा देता था क्यों सही कह रहा हूं न....... इंस्पेक्टर ने उन दोनों की तरफ देखकर पूछा।
दोनों ने हां में गर्दन हिला दी , यह तुम लोगों की सहायता नहीं थी, वह तुम्हारे भविष्य से खेल गया तुम्हारा वो ''कार्तिक चौहान ''और तुम्हें पता भी नहीं चला। जिन माता-पिता ने तुम्हें इतने परिश्रम से कमाया पैसा लगाकर, तुम्हें यहां इस कॉलेज में दाख़िल करवाया वह तुम्हारे बुरे हो गए और एक वह लड़का जो तुम्हें गलत राह पर ले जा रहा था, तुम्हारा हितेेषी और मित्र हो गया। बस इतनी ही समझ है और अपने साथ-साथ तुमने नितिन का भविष्य भी खराब कर दिया। न जाने, कितने नए लड़कों को तुमने इसी काम में लगा दिया और वह' कार्तिक चौहान' जो तुमसे गलत कार्य करवाता है वह तुम्हारा देवता बन बैठा, हितेेषी बना हुआ है और तुम अभी भी ,उसे बचाना चाहते हो। वह तुम लोगों से वो ड्रग्स बिकवाता है , तुम लोगों को नशे की आदत डाल दी उसने यह कौन सा अच्छा कार्य किया है ?
रोहित और सुमित दोनों ही गर्दन झुकाए बैठे हुए थे उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अब तक हम गलत कार्य कर रहे थे और हम खुश थे। मन ही मन डर भी रहे थे, कहीं यह इंस्पेक्टर हमें ड्रग्स बेचने के कारण गिरफ्तार न कर ले।
तब इंस्पेक्टर सुधांशु एकदम से बोले -उस विषय पर हम बाद में बातचीत करेंगे ,तुम्हारे ''कार्तिक भैया ''से भी मिलेंगे। तहखाने में हमें एक व्यक्ति मिला है, क्या तुम उसे पहचान सकते हो ?
देख कर बता सकते हैं कि पहचान सकते हैं या नहीं , इंस्पेक्टर उन्हें उस व्यक्ति के सामने ले गया। वहां दोनों ने देखा एक गौर वर्ण व्यक्ति जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। थाने के कोने में, सहमा हुआ सा बैठा है।
क्या तुम लोग इसे जानते हो ?
दोनों ने उस व्यक्ति को ध्यान से देखा ,ज्यादा उम्र का नहीं लग रहा था, इसे अपने' पुस्तकालय' में तो कभी नहीं देखा ,सुमित बोला।
इंस्पेक्टर ने उसे घूरकर देखा और पूछा - तुम इसी कॉलिज में थे ,तो तुम्हें ये लड़के क्यों नहीं पहचान पा रहें हैं ?
मैं सच कह रहा हूँ ,सर ! मैं अभी छह माह पहले ही आया हूँ ,इन लोगों से पूछो !इन्हें'' पुस्तकालय'' में गए हुए कितने महीने हो गए ?आप,मेरे सामने ऐसे छात्रों को लाये हैं जो पढ़ते ही नहीं जो पुस्तकालय में न के बराबर ही आते हैं।
उसकी बात में दम था , इंस्पेक्टर सुधांशु ने सुमित और रोहित से कहा -अब तुम जा सकते हो।
उनके जाने के पश्चात इंस्पेक्टर ने उस व्यक्ति को डांटते हुए पूछा - जब तुम कॉलेज में नौकरी करते हो तो उस तहखाना में क्या कर रहे थे ?
सर! शायद, आपने ध्यान नहीं दिया,वो तहखाना कॉलेज की किताबें और कुछ जरूरी कागजात रखने का गोदाम है। मैं वहां कार्य कर रहा था और न जाने आप लोग कहां से आ गए और मुझे दबोच लिया मुझसे एक बार भी नहीं पूछा -कि मैं कौन हूं, वहां क्या कर रहा हूं ?
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