Mysterious nights [part 59]

पुनीत के व्यवहार के कारण, शिखा सतर्क हो गई थी किंतु इतनी सतर्कता, बरतने ने के पश्चात भी, न जाने उसके साथ ये क्या हो गया ? उसको, उसके आत्मसम्मान को रातों -रात रौंद डाला गया। एक अजीब सी गंध उसके चारों ओर फैल गयी थी। वह महसूस कर रही थी,वह गंध उसे अपने में जकड़ती जा रही थी। जिससे उसका दम घुटने लगा। वह जोर -जोर से चीखने लगी , चिल्लाई ! वह स्वयं ही नहीं समझ पा रही थी, कि वह यहां कैसे आई ? किंतु इतना तो समझ गई थी जो कुछ भी मेरे साथ हुआ है, सही नहीं हुआ है। अब उसे पछतावा हो रहा था मन ही मन सोच रही थी - ये मेरे साथ क्या हो गया ? बंदिनी ने सच ही कहा था - मुझे ये लोग यहां से निकलने  नहीं देंगे। मैं यहाँ क्यूँ थी,क्यूँ ? किसके लिए थी ?अपने आपसे प्रश्न पूछती है।   मुझे यहां से पहले ही निकल जाना चाहिए था, उसने निर्णय लेने में बड़ी देर कर दी।


 

अभी वह यह सब सोच ही रही थी, तभी दमयंती ने आकर उसके विचारों को विराम दिया और उसे बता दिया कि उसने निर्णय लेने में बहुत देर कर दी। 

क्या ,आप यह सब जानती हैं,जानती भी क्यों नहीं होंगी ?इस घर की मालकिन जो ठहरीं व्यंग्य से बोली -यहाँ जो भी होता है ,इन्हें  सब पता होता है, फिर आपने मेरे साथ ऐसा क्यों होने दिया ?रोते हुए शिखा ने पूछा और अपने आस -पास फैले फूलों की पंखुड़ियों को उठाकर फेंकने लगी। उसे लग रहा था ,ये पंखुड़ी नहीं, उसके लिए अंगारे बिछाए गए थे ,जिनकी जलन वह महसूस कर पा रही थी। 

मैं तो ,तुम्हें इस सबसे बचाना चाहती थी, किंतु तुमने तो हमारा कहना माना ही नहीं ,उसकी तरफ देखकर शांत स्वर में दमयंती बोली।   

हाँ ,नहीं माना ,मैं आपका कहना क्यों मानूं ?जब आपकी राह ही उचित नहीं है। जो स्वयं सही राह पर नहीं चल रहा ,उससे क्या सलाह लेती ,तभी एकाएक उनकी तरफ घूरते हुए कहती है - आप क्या समझतीं हैं, मुझे आपके विषय में कुछ भी मालूम नहीं है , अपने दर्द को, दमयंती की करतूतों को बतला कर, उन्हें  कम करना चाहती थी। 

किन्तु उससे पहले ही दमयंती बोली - मैं जानती हूं, इसीलिए तो तुम्हें पहले ही समझा रही थी, तुम मान -सम्मान और अधिकार के साथ, इस घर में जी सकती थीं किन्तु तुमने तो कहना न मानने की ज़िद जो ठान रखी थी इस बार दमयंती को उस पर क्रोध आया ,वो सोच रहीं थीं -ये अब तो बात को समझेगी किन्तु वो तो स्वयं उन पर ही तोहमत लगा रही थी।  

लगभग चिल्लाते हुए, शिखा बोली -आप यहां से चली जाइए ! मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी है। तुम लोगों ने मेरा अपमान किया है। मैं किसी को नहीं छोडूंगी। क्रोध से ,उसके बदन से अंगारे निकल रहे थे वही अंगारे उसके मुख से भी बाहर आ रहे थे।  

अब चीखने से कोई लाभ नहीं है, इतने दिनों से यहां रह रही हो ,क्या तुम इतना भी नहीं समझीं , तुम्हें यहां क्यों रखा जा रहा है ? यहां तुम्हारा रहने का कोई प्रयोजन नहीं था फिर भी तुम रह रही थीं यदि तुम विधवा बनकर भी आई थीं तब भी तुम्हार यहां कोई प्रयोजन नहीं था क्योंकि जिसके लिए तुम यहां आतीं वह तो इस संसार में ही नहीं था , क्या यह बात तुमने नहीं सोची ? सोचती भी कैसे ? उस समय तो तुम पर' तेजस' के इश्क का भूत सवार था। कितने दिनों तक उसकी याद में जीतीं ?तुम लोग ,इतने ज्यादा भी नहीं मिले थे कि तुम्हें उससे इतना अधिक प्रगाढ़ प्रेम हो गया ,जो उसके लिए सम्पूर्ण जीवन न्यौछावर कर देतीं।  

हम इतना समझते थे ,ये एक मीठी बयार थी जो समय के साथ गुज़र जाएगी ,इसीलिए हम लोगों ने पहले ही तुम्हारे घरवालों से इस विषय में इजाज़त ले ली थी। तब से तुम्हें यही तो समझा रहे थे किन्तु तुम कुछ समझना ही नहीं चाहती थीं। उस समय उस कमरे में दमयंती और शिखा के अलावा और कोई नहीं था। पलंग पर मुरझाई पंखुड़ियां रात्रि की कहानी कह रहे थे। उसे देखकर शिखा को घुटन सी होने लगी। 

एक न एक दिन तो तुम्हें निर्णय लेना  ही था। 

किन्तु ये मेरा निर्णय नहीं था ,ये जबरदस्ती का रिश्ता है ,ये रिश्ता भी कैसा है ?रात्रि में मेरे साथ कौन था ?मैं ये भी नहीं जानती ,ये रिश्ता नहीं, मेरे साथ छल हुआ है । 

इसके लिए तुमने मज़बूर किया वरना हमने बच्चों को समझाया था। 

अरे !आप उन्हें क्या समझायेंगी ?जो स्वयं इस कीचड़ में धंसी हुई है ,इस घर के मर्दों पर कब्ज़ा किये बैठीं हैं ,सबको अपने आगे -पीछे घुमाती हो ,हर रात एक नया मर्द तुम्हें चाहिए ,तुम क्या समझती हो ?मैंने तुम्हें देखा नहीं ,बच्चों को भी तो यही सिखाओगी किसी को अकेला समझ दबोच लें। कोई लड़की नहा रही हो ,तो उसके ग़ुसलख़ाने में घुस जाये,इस समय उसकी जिव्ह्या ज़हर उगल रही थी।  

चुप रहो !तुम अपनी सीमा लाँघ रही हो ,उसकी बातें सुनकर एकदम से दमयंती चिल्लाई। तुम मुझे क्या समझती हो ? मैं रिश्ते में अभी भी तुम्हारी सास हूँ। 

अरे !कैसी सास ?मैं किसी को नहीं जानती ,मुझे तुम लोगों से कोई मतलब नहीं है ,कहते हुए रोने लगी। कुछ देर दमयंती वहीं खड़ी रही और चुपचाप बाहर आ गयी।

बाहर आकर उसकी स्वांसें तेज़ चल रहीं थीं ,उसके अंदर शिखा के कहे शब्दों के कारण उबाल आ गया था। शिखा ने जैसे सुप्त ज्वालामुखी को छेड़ दिया था। अपने कमरे में आती है ,और पानी पीती है ,कुछ देर आँखें मूंदकर बिस्तर पर लेट जाती है। 

मालकिन, आप ठीक तो हैं ,आकर रामदीन काका ने पूछा। 

हाँ ,मैं ठीक हूँ कहते हुए वो बिस्तर से उठी और बोली -ज़रा पुनीत को मेरे कमरे में भेजना। 

जी मालकिन !कहकर वो बाहर निकल गया।कुछ देर पश्चात ,पुनीत वहां आकर खड़ा हो गया। मम्मी !क्या बात है ?आपने मुझे इस तरह अचानक क्यों बुलाया ?

हम्म्म्म  गंभीर स्वर में दमयंती ने हुंकारा भरा। क्या शिखा के साथ रात्रि में तुम ही थे ?

पुनीत कुछ देर मौन रहा और बोला - वो सपने देखने लगी थी। 

मतलब !

मतलब ये कि उसके ख्यालों में अब भाई का स्थान नहीं रह गया था ,वो स्वप्न देख रही थी। 

क्या किसी के स्वप्न देखने पर भी बंदिश लगाई जानी चाहिए ?पुनीत किन सपनों की बात कर रहा था ?शिखा का मान तोड़ने का किसने प्रयास किया ?चलिए आगे जानते हैं।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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