आज अचानक शिखा को नहाते हुए पुनीत देखता है ,उसकी हरकतों से शिखा घबरा जाती है ,उसे ड़र था वह कभी भी यहां दुबारा आ सकता है इसलिए अब वो चौकन्नी हो गयी थी,इसी कारण उसने अपने कमरे की कुण्डी लगा ली थी,जब उसे लगता है ,उसके दरवाजे पर कोई है,तब वह अंदर बैठे -बैठे ही पूछती है - कौन है ?
मालकिन ने, आपके लिए भोजन भिजवाया है।
तुमसे कहा था ,न... मुझे भूख नहीं है।
कुछ देर बाहर शांति रही ,तब वही आवाज फिर से उभरी ,मालकिन कह रहीं हैं -रात्रि में भूखे पेट सोना उचित नहीं है ,आप दरवाजा खोल दीजिये !मैं भोजन रखकर चला जाऊंगा ,खाना खाना है या नहीं, यह आपका अपना निर्णय होगा।
कुछ देर शिखा चुपचाप रही और न जाने क्या सोचकर उसने दरवाजा खोलकर बाहर झाँका ,उस नौकर का नाम वह नहीं जानती थी ,तब वह उससे बोली - लाओ !थाली मुझे पकड़ा दो ! तब उसने उससे थाली ली और अंदर रखने चली गयी। उससे बोली -मेरी जब इच्छा होगी खा लूंगी ,अब तुम जा सकते हो।
झूठे बर्तन लेने कब आऊं ?
सुबह आना ,कहकर उसने दरवाजा फिर से बंद कर लिया। रात्रि हो चली थी,दिल -दिमाग़ अपना कार्य करते हैं ,उसी तरह पेट भी अपना कार्य करता है ,भूख तो बहुत जोरों से लग रही थी किंतु पुनीत के इस व्यवहार के कारण, उसकी भोजन करने की इच्छा नहीं हो रही थी।बंद कमरे में अजीब घुटन सी महसूस होने लगी ,सोचा ,इस समय यहाँ कौन आएगा ?यह सोचकर दरवाजा खोलकर, कुछ देर तक इधर -उधर टहलती रही ,और अपने आस -पास देखती रही, फिर सोचा -भोजन से कैसी नाराजगी ?कुछ खा ही लेती हूँ भोजन करते समय सोच रही थी ,लगता है ,जीवन का संघर्ष बढ़ गया है।
अब तो दमयंती जी ,से बात तो करके रहूंगी किन्तु अब यह बातें सुबह ही हो सकती हैं, अब मैं सतर्क रहूंगी ,दरवाजा खुला ही नहीं छोडूंगी , यह निर्णय करके उसने भोजन करना आरम्भ कर दिया। सोच रही थी, सोने से पहले अच्छे से दरवाजा बंद कर लेगी। भोजन करते-करते,अचानक उसकी पलकें भारी होने लगीं , उसे तेज नींद आने लगी और वह गहरी नींद में सो गई। जो सोच रही थी ,ऐसा न हो सका।
प्रातः काल जब शिखा की आंखें खुली, तो उसके सिर में भारीपन था, ज़बरन आखें खोलकर देखने का प्रयास कर रही थी, उठने का प्रयास करती है किंतु यह क्या ? वह अपने बिस्तर पर नहीं थी यह बिस्तर तो बहुत ही मुलायम, और सुंदर था, सजा हुआ था,गुलाब के फूलों की पंखुड़ियां उस पर बिखरी हुई थीं , जो रात्रि में ताजी रही होगीं किंतु अब वह मुरझा चुकी थीं।कमरे में धीमी रौशनी हो रही थी। वह अपने सर को पकड़ कर उठकर बैठने का प्रयास करती है। देखती है, जो कपड़े उसने पहने थे वह कपड़े भी अब उसके बदन पर नहीं थे। उसके बदन पर, एक लाल रंग का आधुनिक वस्त्र था, जिसमें से उसका संपूर्ण शरीर झांक रहा था। उसे पहनने के बाद भी वह अपने को, असहज महसूस कर रही थी। उसने तुरंत ही वहां से, एक चादर उठाई और अपने ऊपर ओढ़ ली। यह पलंग, यह कमरा, यह वस्त्र कुछ और ही कहानी कह रहा था।
उसके साथ रात्रि में क्या हुआ ? उसे कुछ भी याद नहीं, यह हवेली का कौन सा कमरा है , यह तो मेरा कमरा नहीं है सिर में भारीपन था, शरीर में अज़ीब सी कमजोरी का एहसास हो रहा था ,जिसके कारण बैठने पर उसका शरीर काँप रहा था और मन में विचारों का रेला था। अनेक प्रश्नों से जूझती, वह जो समझ रही थी, उसको सोच कर रोने लगी।उसके साथ धोखा हुआ है ,वह लेटे -लेटे सोच रही थी-'कल मैंने भोजन किया ,फिर क्या हुआ ?बहुत सोचा किन्तु कुछ भी स्मरण नहीं ,मेरे कपड़े किसने बदले होंगे ?ये तो किसी ''सुहागसेज'' की तरह सजा हुआ कमरा है,फिर से उठने का प्रयास किया ,शरीर के निचले हिस्से में दर्द का एहसास हो रहा था। रक्त से सना कपड़ा एक तरफ पड़ा हुआ था।
धीरे -धीरे चलते हुए ,आईने के सामने जाती है। उसके चेहरे और गर्दन पर निशान थे। रात्रि में मेरे साथ कौन था ? मैं यहां कैसे आई ? क्या यह सब पुनीत ने किया है ? मेरे साथ विश्वास घात हुआ है, मुझे भोजन में कुछ ऐसा दिया गया ,जिसके कारण मुझे कुछ भी स्मरण नहीं ,किन्तु ये कमरा ,ये बिस्तर ,ये मेरे तन पर निशान इस बात की गवाही दे रहे थे ,नशे में मेरे साथ 'बलात्कार 'हुआ है।यह सब देखकर वो चीख -चीखकर रोने लगती है ,आज उसका वो आत्मसम्मान भी चकनाचूर हो गया।
कल जो उसने आत्मसम्मान के साथ जीने का सपना देखा था, नरेंद्र को स्मरण करके, जो खुशी महसूस कर रही थी, वह सब क्षण भर में टूट गया। वह बाहर जाने के लिए दरवाजा खोजती है ,तभी उसे अपने कपड़ों का ख्याल आया ,उस कमरे में अपने कपड़े ढूंढती है ,जो एक कोने में स्टूल पर पड़े हुए थे। उसका पोर -पोर दर्द कर रहा था ,लगता है ,उसके शरीर का खूब इस्तेमाल किया है। कपड़े पहनते हुए रो रही थी, मेरी जिंदगी में क्या चल रहा है, कुछ समझ नहीं आ रहा है।
तभी दरवाजे पर आवाज आई, विवाह नहीं हुआ था विवाह अपूर्ण था, हम चाहते थे कि तुम्हारा विवाह पूर्ण हो जाए तुम आज भी ''अधूरी दुल्हन'' बनकर रह गईं। कल तुम्हारी ''सुहागरात'' थी, जो अच्छे से मनी है किंतु तुम्हारा विवाह नहीं हुआ आज भी तुम'' अधूरी दुल्हन'' ही हो।एक ऐसी दुल्हन जिसकी विवाह से पहले ''सुहागसेज ''सजी है उसकी ''सुहागरात ''मनी है। मैं पहले ही कह रही थी -तुम इनमें से किसी से भी विवाह कर लो !अंदर आते हुए दमयंती बोली।
मेरे साथ रात्रि में क्या हुआ ? मेरे साथ यह सब किसने किया ? मैं यहां कैसे आई ?
वो रात्रि भी तुम्हारे लिए'' रहस्यमई रात्रि ''बन गई, तुम जान भी नहीं पाईं , तुम्हारी इस रात्रि का स्वामी कौन था ? अब रोने से कोई लाभ नहीं है। हम तो चाहते थे कि तुम्हारा विवाह हो जाए, किंतु तुमने बहुत देर कर दी। अब तुम्हारी हर रात, सेज सजेगी, तुम दुल्हन बनोगी '' अधूरी दुल्हन '' सफेद चादर पर, रक्त के धब्बे, अपनी कहानी कह रहे थे। उसे कुछ भी याद क्यों नहीं आ रहा है ? उसने तो पहले ही निर्णय ले लिया था, कि मैं दरवाजा बंद करके सो जाऊंगी। मन ही मन सोच रही थी मैंने ऐसा क्या किया जो मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा है मैं खाना खाते ही कैसे सो गई थी ? इसका अर्थ है मुझे भोजन में कुछ दिया गया था , अभी भी उसी का असर लग रहा है। वह उसे बिस्तर को मुरझाई हुई पंखुड़ियां को टूटी चूड़ियों को, देख रही थी और रो रही थी।
