Mysterious nights [part 57]

 अब शिखा ने, अपने विचारों को खुला छोड़ दिया था, स्वतंत्र रूप से वह अपने विचारों में खोई हुई थी। उसके विचार दौड़ते हुए उसके, विवाह से पूर्व, नरेंद्र की यादों में उलझ गए ,ये वे यादें थीं ,जो तेजस के आने पर धूमिल हो गयीं थीं। किन्तु आज अचानक ही जैसे ,उन यादों से धूल हटती नजर आ रही थी,एक सुखद एहसास उसके मन को तरोताज़ा कर गया। वे कुछ ऐसी स्मृतियाँ थीं जिनका स्मरण कर शिखा के चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान तैर गई।आज पानी में भीगने के साथ -साथ वो उन सुगंधित यादों में भी, खो जाना चाहती थी। यही सोचकर उसने अपनी आँखें मूँद लीं,अपने बदन को ढीला छोड़ उन यादों के पीछे जा रही थी। 


 गुलाब की पंखुड़ियों के जल में नहाते समय, वह उन यादों से खेल रही थी जो उसकी मुस्कान बढ़ा रहे थे , उसके दिल को ठंडक पहुंचा रहे थे। नरेंद्र कि वे चंचल, भेद भरी आंखें, उससे कुछ कहना चाहती थीं , आज उन आंखों को स्मरण कर, वह जैसे संपूर्ण दुनिया भूल गई थी,वह भूल गयी थी कि वह ठाकुर परिवार की हवेली में है। कभी -कभी उसे एहसास होता ,वो यहाँ बंधक बनकर रह रही है। तन को तो बाँध सकते हैं किन्तु कल्पना तो अपनी है ,विचार अपने हैं ,भला उन पर किसी का बंधन कैसे हो सकता है ?बीच -बीच में उसकी अंगुलियां उस जल को अपने में समा लेने का प्रयास करतीं किन्तु जल क्या किसी के रोके रुका है ?

 तभी उसे कुछ एहसास होता है जैसे कोई वहां है ,उस पर दृष्टि गड़ाए है , शिखा अपनी आंखें खोलती है , जैसे ही उसने अपनी आंखें खोलीं -उसकी स्मृतियां, उसके अधरों की मुस्कान ,न जाने कहां खो गईं और उसके मुंह से एक तेज चीख़ निकली, उसके सामने पुनीत बैठा हुआ था, उसे ललचाई नजरों से,पानी में अठखेलियां करते देखकर मुस्कुरा रहा था। शिखा को अपनी तरफ देखते देख ,अपने होठों पर जीभ फिराते हुए बोला -तुम बहुत खूबसूरत हो ,किसी जलपरी की तरह, इस पानी में नहाते हुए कितनी हसीन लग रही हो ?जी करता है ,तुम्हें ऐसे ही देखता रहूं। 

 पुनीत को, इस तरह अपने सामने देखकर, वह बुरी तरह घबरा गई थी, पुनीत उसे देखकर, होले -होले मुस्कुरा रहा था , वह अपने में ही सिमटकर रह गई, और पानी में थोड़ा और अंदर चली गई ताकि अपने आपको, उससे छुपा सके। वह कुछ भी कहना भूल गई, मुस्कुराते हुए वह आगे बढ़ा और उसके करीब आ गया। उसे अपने इतने करीब देखकर, शिखा चिल्लाई - तुम यहां कैसे ?तुम यहाँ से चले जाओ ! क्या तुम्हें इतनी भी तमीज नहीं है ? कि इस तरह बिना पूछे किसी के कमरे में नहीं आते हैं। 

इसमें पूछना कैसा ? वह लगातार उसे देखे जा रहा था, घर अपना है, तुम अपनी हो। अपने ही सिर हाथ मारते हुए कहता है -तुम इतने दिनों से यहाँ थीं और......  घर में ही फूल खिला था और मैं बाहर ढूंढ़ रहा था। ये तो वही बात हो गयी ,''बग़ल में छोरा गांव में ढिंढोरा ''कहते हुए जोर -जोर से हंसने लगा 

 तभी शिखा ने अपना हाथ लंबा किया और अपना तौलिया खींचकर , उससे अपने को तन को छुपाने का प्रयास कर रही थी।

 पुनित बोला -तुम कितनी खूबसूरत हो ?जवान हो !क्यों, इसे व्यर्थ गंवा रही हो ?आओ !साथ में नहाते हैं। 

तुम्हें ऐसी बातें कहते हुए शर्म नहीं आती ,मैं तुम्हारे भाई की' बेवा' हूँ, तुम यहाँ से जाओ ! वरना मैं शोर मचा दूंगी। 

कितनी बचकानी हरक़त है ?तुम्हें क्या लगता है ? हमारे लिए लड़कियों की कमी है , किंतु तुम्हें सम्मान के साथ इस घर में रखना चाहते हैं और तुम समझना ही नहीं चाहतीं , तुम कब तक हमारी परीक्षा लेती रहोगी ? हम ठाकुर हैं, जो चीज हमें पसंद आती है,वो समझो हमारी ही हो जाती है, उसकी खुशामद नहीं करते। वास्तव में ही तुम बहुत सुंदर हो, कहते हुए वह उसके करीब आने लगा। गीले बदन में खड़ी शिखा काँप रही थी ,उसका गला सूख गया ,थूक सटकते हुए उसने अपने गले को तर करने का प्रयास कर रही थी। 

शिखा की नजर पुनीत के एक -एक कदम पर थी ,वह उसके करीब आया ,उसके बालों को सूंघा और एक गहरी स्वांस ली ,शिखा ने अपने तौलिये को कसकर पकड़ लिया। तब पुनीत ने उसके कंधों को पकड़ा और शिखा को कोई भी मौका दिए बग़ैर उसकी गर्दन को चूम लिया। शिखा, ऊपर से नीचे तक काँप गई, उसका हलक सूख गया उसके मुंह से बोल ही नहीं निकले , तब वह बोला -अब और नहीं कहकर वह वहां से चला गया।

 उसके अधरों का स्पर्श वह महसूस कर पा रही थी,उसके ठंडे और गीले गले पर उसके गर्म होंठ अपनी छुअन छोड़ गए थे। उसे लग रहा था,जैसे अभी कुछ देर पहले शीतल पवन का आनंद ले रही थी ,और तभी एक गर्म हवा का झोंका, उसके उस आनंद को तहस -नहस कर गया। उसके अधर जैसे अभी भी वह उसके गले पर चिपक गए हैं,उसके हाथ स्वतः ही अपनी गर्दन पर जाते हैं और उस स्थान से ,उस एहसास को हटाने का प्रयास करते हैं। उसका सारा बदन काँप रहा था। वह स्वयं ही नहीं समझ पा रही थी कि वह डर डर से कांप रही है या फिर उसके उस एहसास से। वह दोबारा पानी के अंदर जाती है और अपने बदन को अच्छे से धोती है, ताकि वो स्पर्श समाप्त हो जाए और उसका वो ख़ुशनुमा एहसास फिर से लौट सके। 

उस हिस्से को पानी से धोते -धोते जब वो थक गयी ,अपना तौलिया लपेटकर बाहर आती है और कपड़े पहनती है।आईने में देखती है ,गर्दन के उस स्थान को बार -बार रगड़ने से वह लाल हो गया था।  मन ही मन सोच रही थी अब यहां रहना खतरे से खाली नहीं होगा। पहले तो ये लोग नहीं आते थे किंतु समय बीतने के साथ ,धीरे-धीरे, कभी भी मुँह उठाकर  चले आते हैं। अब मुझे यहां रहना नहीं है। सोचते हुए रोने लगती है , पानी पीती है कपड़े पहनती है, उसके मन में अजीब सा डर समा गया था। 

अभी तक तो ये  लोग, विवाह करना चाहते थे, किंतु अब लगता है-ये अपनी सीमा लाँघ सकते हैं , मुझे यह बात दमयंती जी से बतानी होगी, इन हालातों में, मैं यहां नहीं रह सकती, उसने निर्णय किया कि वह यहां से चली जाएगी हालांकि वह अब नीचे जाकर स्वयं सबके साथ भोजन करती है किंतु आज पुनीत के इस व्यवहार के कारण ,उसका ड़र बढ़ गया था, उसकी इच्छा भी नहीं हुई कि वह नीचे जाए ,उसकी भूख ही मर गई थी।

 कुछ देर पश्चात, चलिए ! छोटी मालकिन !भोजन कर लीजिये ,के स्वर ने उसको चौंका दिया। 

मेरा मन ठीक नहीं है,आज मैं भोजन नहीं करूंगी ,अंदर से ही शिखा ने जबाब दिया। 

कुछ देर पश्चात ,फिर से उसके कमरे का दरवाजा घर के ही किसी नौकर ने खटखटाया ,इस समय तक बंदिनी अपने घर चली जाती थी, कौन है ? उदास स्वर से शिखा ने पूछा।

क्या पुनीत दुबारा आ गया ? शिखा को उसने इस हालत में देखा उसका मन उस पर डोल गया है ,क्या शिखा इस हवेली से चली जाएगी ?अनेक प्रश्नों के जबाब लिए इस कहानी को पढ़ते रहिये और आगे बढ़ते रहिये !

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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