टप से इक बारिश की बूँद, मेरे उन्नत मस्तक पर गिरी।
लगा जैसे,प्यासी, तप्त धरा को ,स्वांस आये,सुकून भरी।।
बरसात की बूंदें ,जलते धरातल सी' करतल' पर आ गिरें।
पत्तों पर गिरती ओस सी ,ठहरती, चमकती , सुकूँन भरें।।
धुलता है ,प्रकृति का हर अंग -अंग ,
संवर उठी, प्रकृति मन में उठे उमंग।
पेड़ -पौधों की प्यास बुझा ,झूम उठा ,हर मन।
तप्त धरा ,तपते जीवों की ''जीवनदायिनी ,
बैठ ,बादलों के पंखों पर आती ''वरदायिनी''।
बरसा अपना प्रगाढ़ प्रेम ,कृषकों की ''प्राणदायिनी''।
सौंधी -सौंधी महक माटी की ,प्रफुल्लित करती,
सबके ह्रदयों में भरती ,प्रेम की फुहार ,ऐसी' कामायनी' !
सहलाती हौले -हौले से रक्त कपोलों को ऐसी लुभावनी।।
