Baarish ki pahali bunden

टप से इक बारिश की बूँद, मेरे उन्नत मस्तक पर गिरी। 

लगा जैसे,प्यासी, तप्त धरा को ,स्वांस आये,सुकून भरी।।


बरसात की बूंदें ,जलते धरातल सी' करतल' पर आ गिरें। 

पत्तों पर गिरती ओस सी ,ठहरती, चमकती , सुकूँन भरें।।



धुलता है ,प्रकृति का हर अंग -अंग ,

संवर उठी, प्रकृति मन में उठे उमंग। 

पेड़ -पौधों की प्यास बुझा ,झूम उठा ,हर मन। 

तप्त धरा ,तपते जीवों की  ''जीवनदायिनी ,

बैठ ,बादलों के पंखों पर आती ''वरदायिनी''। 

बरसा अपना प्रगाढ़ प्रेम ,कृषकों की ''प्राणदायिनी''। 

सौंधी -सौंधी महक माटी की ,प्रफुल्लित करती,

सबके ह्रदयों में भरती ,प्रेम की फुहार ,ऐसी' कामायनी' ! 

सहलाती हौले -हौले से रक्त कपोलों को ऐसी लुभावनी।।  



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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