शिवानी को जब पता चला कि उसके मौसेरे भाई नितिन के कारण, उसके पति 'पारस' का दिल दुखा है, तब वह नितिन से फोन पर बात करती है, और वह उसे समझाती है ,माना कि तुम मेरे भाई हो ,मेरी फ़िक्र करना तुम्हारा कर्त्तव्य बनता है ,अपनी बहन को कहीं कोई कष्ट तो नहीं, हर अच्छा भाई यही सोचेगा। किन्तु कई बार ,कभी -कभी हम इंसान को कुछ और ही समझ लेते हैं किन्तु वो ऐसा नहीं होता है ,तब वह नितिन को,पारस की संपूर्ण सच्चाई से अवगत कराती है और तब नितिन से कहती है -''किसी के जीवन पर, यूं ही व्यंग कर देना, गलत सोच रखना, यह आसान है किंतु किसी को समझ कर उसके साथ खड़े रहना, यह बहुत ही कठिन है।'
मैं जानती हूं, तुमने उस समय ,जो कुछ भी देखा और समझा, उसके आधार पर तुम्हें पारस गलत लगता है, तुम ही नहीं ,जो कोई भी उसे उन हालातों में देखता ,पारस को ही गलत समझता , किंतु अब मैंने, तुम्हें उसकी संपूर्ण कहानी सुना दी है इसीलिए अब मैं ये नहीं चाहती हूं, कि तुम्हारे कारण या किसी के भी कारण, पारस और मेरी जिंदगी में कोई व्यवधान आये। मैंने तुमसे कुछ भी छुपाया नहीं है ,पारस ने, विवाह से पहले मुझे सब कुछ बता दिया था इसलिए तुम्हें परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, मैं अपने तरीके से उसकी छानबीन कर चुकी थी ,अब मैं अपना जीवन अच्छे से जी रही हूं और तुम्हें भी, अपने जीवन को सँवारना चाहिए अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए, यह कहकर उसने फोन काट दिया।
शिवानी के मुंह से पारस की कहानी सुनकर, नितिन समझने का प्रयास करता है ,कई बार ऐसा हो जाता है, जो हम देखना और समझना चाहते हैं वही समझ पाते हैं समय और परिस्थिति के आधार पर क्या हो रहा है ?उसे ठीक से समझना भी नहीं चाहते। संपूर्ण जानकारी लेने से पूर्व ही मैंने पारस से अभद्र व्यवहार किया शिवानी को जब पता चला होगा तो उसने मेरे विषय में क्या सोचा होगा ? चलो !ये भी अच्छा है ,शीघ्र ही सम्पूर्ण गलतफ़हमियाँ दूर हो गयीं। वहीं खड़ा हुआ, वह अभी यही सब सोच रहा था तभी एक हवलदार उसके पास आकर खड़ा हो गया और बोला - चलो !इंस्पेक्टर साहब ! ने बुलाया है।
मुझे क्यों ?विचारों में खोये नितिन ने उसकी तरफ देखा और जैसे उसे हवलदार को देखकर अपनी गलती का एहसास हुआ ,तब वह बोला -अभी आता हूँ ,तुम चलो ! वैसे मुझे क्यों बुला रहे हैं ?
क्या तुम जानते नहीं हो ? इतने दिनों से कॉलेज में, पूछताछ चल रही है और तुम अभी तक नदारद हो, तुम्हें आना नहीं चाहिए था। उस सूची में तुम्हारा नाम सबसे ऊपर है, सभी बच्चे आए किंतु तुम बचते हुए घूम रहे हो।
मैं बच नहीं रहा हूं, मैं शादी में गया था, झल्लाये नितिन ने सफाई देते हुए कहा ।
हमें मालूम है, किंतु अब तो आ गए ,अब तुम मेरे साथ चलोगे ! हवलदार दृढ़ता से बोला
तुमसे कहा तो..... मैं आ रहा हूं।
किंतु साहब ने तो साथ लेकर ,आने के लिए कहा है, यदि तुम्हें आना होता तो अब तक आ गए होते। मैं अब तब तक तुम्हारे साथ यहीं रहूंगा, जब तक तुम मेरे साथ नहीं चलते हो ,तुम्हें जो भी कार्य करना हो, कर सकते हो !
उसकी इस बात पर नितिन को क्रोध आया और बोला- क्या जबरदस्ती है ?मैं कहीं भाग थोड़े ही जा रहा हूं। यहीं हॉस्टल में रहता हूं इसी कॉलेज में पढ़ता हूं।
तब भी तुम आए नहीं, सभी बच्चे दो-दो बार बातचीत करके चले गए और तुम एक बार भी नहीं आए। ऐसे कहां व्यस्त रहते हो ? होटल में घूमते हो, पार्टियां करते हो , वहां के लिए तुम्हें समय कैसे मिल जाता है ?
उसकी बातों से नितिन झल्लाते हुए बोला - इस सबका , आपके केस से क्या मतलब ?अच्छा, चलो चलता हूं , कहते हुए आगे बढ़ने लगा।
इंस्पेक्टर साहब ! को लगता है , यह हमारी पूछताछ से बचने के लिए इधर-उधर घूम रहा है इसलिए उन्होंने हवलदार को सख्त हिदायत दी थी ,उसे लेकर ही आना है इसीलिए वो नितिन के साथ ही रहा। उसे कोई बहाना बनाने नहीं दिया। नितिन आगे बढ़ता है और पूछता है -क्या उनको अब तक हत्यारा नहीं मिला ?
हत्यारा तो लगभग मिल ही गया करीब- करीब ही है किंतु किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले,सब कुछ समझ लेना आवश्यक है। कई बार, ऐसा होता है, अपराधी हमारे, सामने घूमता रहता है और हमें उस तक पहुंचने में समय लग जाता है। यह सब मैं तुमसे क्यों बता रहा हूं , अब तुम चलो ! जो भी कुछ पूछना है, इंस्पेक्टर साहब से ही पूछ लेना।
इंस्पेक्टर साहब के सामने पहुंचने पर, नितिन को देखकर सुधांशु व्यंग्य से कहते हैं - आइये !आइये ! आपके तो ,दर्शन ही दुर्लभ हो गए, आप बहुत व्यस्त रहते हैं। क्यों ?विकास सही कह रहा हूँ न..... मैं ! मुस्कुराते हुए इंस्पेक्टर सुधांशु ने विकास से कहा। तब नितिन को वो सामने रखी, कुर्सीं की तरफ इशारा करते हुए बोले -अब तो तुम्हें कोई काम नहीं है, क्या हम तुमसे कुछ प्रश्न पूछ सकते हैं ?
जी पूछिए !
अब हम सीधे -सीधे मुद्दे पर आते हैं ,बहुत हो चुकी छानबीन , महीनों से यही कार्य हो रहा है क़ातिल है कि सरेआम घूम रहा है और हम उसका पता लगाने में जुटे हुए हैं।
जी ,मैं समझ सकता हूँ ,इसमें मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ ,पूरे आत्मविश्वास के साथ नितिन बोला।
बहुत खूब ,हमें यही आत्मविश्वास तो चाहिए ,अब तुम हमें ये बताओ ! तुमने' ग्यारह तारीख़' की रात को जो पार्टी रखी थी ,उसका क्या उद्देश्य था ?
सर जी ! यह आप कैसी बातें कर रहे हैं, पार्टी रखने का भी, क्या कोई उद्देश्य होता है ?वो तो मौज -मस्ती के लिए की जाती है ,जब जी चाहे, पार्टी कर सकते हैं।
अच्छा !तुम क्या बहुत बड़े व्यापारी या बहुत बड़े आदमी हो,जो आये दिन पार्टियां कर रहे हो ,तुम यहाँ पढ़ने आये हो या पार्टियां करने , उसकी कुर्सी के समीप आकर इंस्पेक्टर बोला -तुम एक छात्र हो ,तुम्हारे पास पार्टी के लिए पैसा कहाँ से आता है ? नितिन की आँखों में झांकते हुए सुधांशु ने पूछा।
उनके सवाल पर, नितिन थोड़ा चुप हो गया और सोचने लगा -कि क्या जवाब दिया जाए ?
तभी इंस्पेक्टर ने दूसरा प्रश्न किया, तुम्हारे पिता क्या कार्य करते हैं ?
जी, वह एक व्यापारी हैं ,हमारा अच्छा -खासा पैतृक व्यापार है ,अकड़ते हुए नितिन ने जबाब दिया।
वो व्यापार, तुम करते हो,उसने पूछा ,वो तुम्हारे पुरखों का काम है ,क्रोधित होते हुए सुधांशु बोला - तब तो उनका व्यापार बहुत अच्छा चलता होगा, जो तुम्हें पार्टियां करने के लिए पैसे देते हैं। यहाँ लोगों को इंजीनियरिंग कॉलिज की फीस भरना भी मुश्किल हो जाता है और तुम्हारे परिवारवाले तुम्हें खर्चे के लिए बहुत पैसा दे रहे हैं, वैसे तुम्हारे परिवार में कितने सदस्य और हैं ?
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