यह मन बड़ा ही'' शैतान'' है, यदि किसी के बहकावे में आ जाता है,तो फिर चाहे, अपने जीवन का सर्वनाश ही क्यों न कर ले ? और न ही समझ पाता है, तो कभी-कभी 'सच्चे प्यार' को भी नहीं समझ पाता है। अपने ही मन की करता है, और अपने ही मन की सुनता है। पारस अपने रिश्ते को संभालने का बहुत प्रयास कर रहा था किन्तु शिप्रा ने तो न जाने क्या सोच रखा था ? शिप्रा ने भी वह फिल्म देखी, जिसे पारस उसे दिखाकर लाया, किन्तु शिप्रा वो फ़िल्म देखकर आई और आकर चुपचाप लेट गई।
उस पर तो जैसे किसी बात का प्रभाव ही नहीं पड़ता था या उसने जो अपने मन में ठान लिया था, उसी को लिए बैठी थी। इस सब में पारस का जीवन ,उसके सपने टूटकर बिखर जाना चाहते थे,जिनको जबरन ही वो समेटने का प्रयास कर रहा था। अब तो उसे, घर पर आने की इच्छा भी नहीं होती। घरवालों से भी क्या कहे ? कि इस सौंदर्य की मूरत के कारण, मेरी ज़िंदगी' जहन्नुम' बन गयी है ,इसने मेरी ज़िंदगी को नर्क बना दिया है। प्रतिदिन एक उम्मीद एक आस लिए जागता है और ख़ामोश उदासियों में सो जाता है। इसी बहाने उसने अपनी ''नाइट ड्यूटी ''लगवा ली।
उसके सभी मित्र कहते - अभी तेरा नया-नया विवाह हुआ है, तुम्हें घूमने जाना चाहिए और तुम यहां'' नाइट ड्यूटी'' कर रहे हो।
तब वह सोचता है - शायद यह इसीलिए नाराज है, मैं इसे कहीं घुमाने के लिए नहीं ले गया,पर ले भी कैसे जाता ?दोनों आपस में मिल -बैठकर बातें करते ,तब मिलकर निर्णय लेते कहाँ जाना है ?अपने आप ही समस्या का हल सोचता और स्वयं ही उससे लड़ने लगता। यह सब सोचकर उसने शिमला वाली ट्रिप रखी थी।
शिमला पहुंचकर शिप्रा हतप्र्भ रह गई, और उसके क्रोध का बांध टूटकर, बाहर आ ही गया जिसे इतने दिनों से चुप्पी के माध्यम से थामे बैठी थी, तब वह बोली -तुम क्या चाहते हो ?या ये समझते हो, कि तुम मुझे इस तरह यहाँ लाकर हासिल कर पाओगे और मुझे ये सामान दिलवाकर ,यहाँ-वहां घुमाकर मेरे दिल में अपनी जगह बना लोगे,तो यह तुम्हारी बहुत बड़ी गलतफहमी है। मैं तुम्हारे मनसूबे कभी पूरे नहीं होने दूंगी।
उसकी बातें सुनकर ,तब हताश हुए पारस ने पूछा -आखिर तुम चाहती क्या हो ?
कुछ नहीं ,और तुमसे तो कतई उम्मीद नहीं रखती हूँ।
क्या, तुम्हें मैं पसंद नहीं हूँ ?तुम्हें मुझसे क्या उम्मींदें थीं ?जो मैं ख़रा नहीं उतरा ,क्या तुमने मेरे विषय में भी कभी सोचा है ,मैं किस तरह से इस रिश्ते को संभालने का प्रयास कर रहा हूँ ? तुमने अपनी तरफ से क्या किया।
मुझे कुछ करने की कोई जरूरत नहीं है।
क्यों ,क्या तुम इस रिश्ते में रहना नहीं चाहती थीं ?यदि मैं पसंद नहीं था, तो विवाह से तभी मना क्यों नहीं कर दिया ?मैंने क्या तुमसे कोई जबरदस्ती की थी। मैंने अपना नंबर भी दिया था ,फोन पर भी तो बता सकती थीं। मेरे फोन करने पर भी ,पता चलता तुम तो खरीददारी में व्यस्त हो ,ऐसे में दूसरा आदमी क्या समझेगा ?तुम अपनी इच्छा से विवाह कर रही हो।
मैं कहीं नहीं गयी ,न ही मैंने कोई खरीददारी की ,मुझे आवश्यकता ही नहीं थी।
तब तो तुम्हारे घरवालों ने मुझे धोखा दिया ,वही मुझे ये सब बताते थे ,आज पारस भी चुप नहीं रहा ,वो तो सोच रहा था ,माता -पिता कभी -कभी मजबूर हो जाते हैं ,जब अपनी ही औलाद नहीं सुनती है, किन्तु वह भी कब तक बर्दाश्त करे ? उसने विवाह किया था खुशहाल जीवन के लिए, किन्तु अब लगता है ,विवाह करके उसने मुसीबत मोल ले ली है। न खाते बनता है न निगलते।
मैंने पापा से पहले ही कह दिया था, किन्तु उन्होंने जबस्दस्ती ही मेरा विवाह तुमसे करवा दिया। मैं तो किसी और से प्यार करती हूं।
उसकी यह बात सुनकर पारस अचंभित रह गया और बोला -जब तुम मुझसे शादी करना ही नहीं चाहती थी तो तुमने मुझसे विवाह क्यों किया ?ये सब किया कराया तुम्हारे पापा का है तो इसमें मेरी क्या गलती है ?मैं क्यों ये सब झेल रहा हूँ ?
अभी बताया तो... पापा ने जबरदस्ती विवाह करवाया है किंतु मैं किसी और को चाहती हूं। वे समझते थे , लड़की जब अपनी ससुराल चली जाएगी ,पति का प्यार देखेगी तो सब कुछ भूल जाएंगी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है।
हताश ,निराश, पारस ! उम्मीदों के सभी दिए बुझ चुके थे ,अब वापस ऐसे जायेंगें ? उसके दोस्तों को तो पता है ,वह एक सप्ताह के लिए बाहर जा रहा है ,कैसे वापस लौट जायें ?पूछेंगे तो क्या जबाब दूंगा ?उन्हें एहसास तो है कि कुछ बात तो है किन्तु इतनी बड़ी बात है ,कैसे बता दूँ ? सम्पूर्ण रात्रि नींद नहीं आई ,अब तो उसकी तरफ देखने का मन भी नहीं कर रहा। इस रूप में कितना बड़ा छल छुपा है ?क्यों न हो ?माता -पिता भी तो ऐसे ही धोखेबाज़ हैं ,उसका उनके लिए सोचने को मन तो नहीं मान रहा था किन्तु क्या करे ?बार -बार यही बातें सोचने पर वो विवश हो रहा था।कमरे से बाहर आ ,अपने मन की बेचैनी को शांत करने का प्रयास करने लगा।
उसने तो अपने नए जीवन की शुरुआत में ही, इतना बड़ा धोखा खाया है ,वह कैसे इस धोखे को भुला सकेगा ? दो दिनों से दोनों ही होटल में बंद पड़े हुए थे ,एक ही छत के नीचे एक -दूसरे से अपरिचित ! पारस का मन किया ,ये सभी बातें घरवालों से कहूं किन्तु यह सोचकर ज़ब्र कर गया ,मेरा जीवन तो बर्बाद हुआ ही है क्यों उसकी शांति में ख़लल डालना ? देर -सवेर तो उन्हें पता चल ही जायेगा ,जब तक बात छुपती है ,छुपी रहने देता हूँ।
शिप्रा अभी भी ऐसी ही थी ,पारस की परेशानियों के पश्चात भी, उसके मन में, उसके प्रति सहानुभूति भी नहीं थी। तब पारस बोला -हम लोग जब तक यहां हैं ,दिखाने के लिए ही सही ,कम से कम दोस्त बनकर तो रह सकते हैं। पारस ने, प्यार से उसे समझाना चाहा और उसे घूमाने के लिए, बाहर ले गया।अपने मन को समझा रहा था या फिर दूसरों को दिखाने के लिए ले जा रहा था। वह स्वयं ही नहीं जानता था।
जैसे ही वे लोग बाहर निकल रहे थे तभी, और उसने उसे जो कुछ भी बताया उसके कारण शिप्रा एकदम से, पारस के साथ जाने के लिए तैयार हो गई। न जाने, उसके मन में क्या चल रहा था ? बल्कि अब अपने को हल्का महसूस कर रही थी। वो अपने मन की भड़ास निकाल चुकी थी किन्तु अब पारस को ज़िंदगी का बोझ उठाना कठिन लग रहा था।
किसी को ये कह देना ,उसने तलाक ले लिया, कितना आसान है ?किन्तु जिस पर बीतती है ,जिन परिस्थितियों से वह गुजरता है ये तो बस वही जानता है। कितनी खरोंचे ,कितने गहरे घाव उसके दिल को लहूलुहान कर देते हैं। यह एक पारस की ही स्थिति नहीं थी ,हर उस आदमी या औरत की स्थिति होती है ,जो जीवन की कड़वी सच्चाई से अपरिचित होते हैं।
