रुकैया जब यहां आई थी , वाहिद जानते थे , वो ज़ीनत के बारे में पूछताछ कर रही थी,जरूर कुछ तो बात हुई है ,जो वो इस तरह से पूछताछ कर रही थी। ख़ालिद ने उससे जो कहा ,वो नहीं चाहते थे कि ख़ालिद कुछ ऐसा -वैसा ज़ीनत के बारे में कुछ कहे, किन्तु जवान ख़ून है ,उसके रिश्ते की मनाही हुई है। गुस्सा आना तो लाज़मी है। वो बातें उनके ज़हन में उतर गयीं।
बाद में,ख़ालिद से कहा भी था - इस तरह 'ज़ीनत' की बुराई करना सही नहीं है ,इसमें उसकी क्या गलती है ? ये तो हमारी सुस्ती कहो या फिर रुकैया की तेजी ,वो हमसे पहले रिश्ता लेकर पहुंच गयी।
किन्तु अब ये रिश्ता नहीं होगा ,पूरे यक़ीन से ख़ालिद बोला।
वक़्त आने पर मालूम पड़ जायेगा ,कहते हुए ख़ालिद घर से बाहर निकल गया।
न जाने , अब ये कौन सा ग़ुल खिलाने वाला है ? परेशानी से वालिद साहब बुदबुदाए।
आज यूसुफ़ को अपने घर की ड्योढ़ी पर देखकर ,उन्हें वे सभी बातें याद आ गयीं। तब वो यूसुफ़ मियां से बोले - अब तो अहमद मियां आने ही वाले होंगे, उनकी डॉक्टरी की पढ़ाई तो पूरी होने ही वाली होगी। उनके यहाँ आते ही बस उनका निक़ाह कर देना , जवान बच्चा है ,हाथ से निकल गया तो ,अफसोस ही रह जायेगा। ज़ीनत भी अच्छी लड़की है उसका घर बस जायेगा।
हां, उनका रिश्ता होने वाला तो था , किंतु अब मुझे, उसमें कोई दिलचस्पी नहीं रही ।
अख़बार को एक तरफ रखकर उन्होंने यूसुफ के चेहरे की तरफ घूरते हुए पूछा - क्यों ,क्या हुआ ?
मुझे एक ज़नाब मिले थे, वो कह रहे थे -' जिस कॉलेज में 'अहमद मियां' पढ़ते हैं ,उसमें बहुत से काफ़िर भी पढ़ते हैं। कई काफिरों से तो उनकी दोस्ती भी हो गयी है। बस, यही बात मुझे पसंद नहीं आई। अब मैंने रुकैया से उस रिश्ते के लिए मना कर दिया है।
''लाहौल विला कुव्वत ''ये क्या बात हुई ?ज़नाब ! काफ़िरों से दोस्ती करना कोई जुर्म थोड़े ही न है। जब इंसान पढ़- लिख जाता है, उसकी अलग ही सोच हो जाती है। काफी लोगों के संग उठना- बैठना पड़ सकता हैं।उनका तो काम ही ऐसा होगा। कोई भी उनसे अपना इलाज़ कराने आ सकता है। ये तो सफ़ा का काम है ,इसमें बुराई क्या है ?
वाहिद की बातें सुनकर यूसुफ़ साहब को कुछ बहाना सूझ ही नहीं रहा था कि रिश्ते की बात कैसे की जाये ?तब बोले - वो अपने मजहब पर ध्यान नहीं देते हैं , अपनी कौम के लिए नहीं सोचते हैं ,न जाने वहां का रहन -सहन कैसा होगा ?उनकी सोच में भी अंतर आ गया होगा इसलिए मैंने रुकैया से इस रिश्ते के लिए मना कर दिया।
यह तो बहुत ही ग़लत हुआ ,रुकैया और अहमद मियां पर क्या बीत रही होगी ? ज़ीनत का तो दिल ही टूट जायेगा। एक बार किसी पर दिल आ गया ,फिर आसानी से उसे भुलाया नहीं जा सकता ?अपनी बेटी का तो सोचो ! आश्चर्य चकित होने का वाहिद मियां ने ड्रामा किया।मन ही मन सोच रहे थे -'अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। ''
ज़ीनत के लिए अब तुमने क्या सोचा है ?
भाईजान ! मैं अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हूं ,इसीलिए सोच रहा था अहमद मियां से बेहतर तो अपना खालिद ही है। उनकी जोड़ी बड़ी अच्छी रहेगी। बेटी भी घर के नजदीक ही रहेगी। मायका और ससुराल पास में रहेंगे तो सुख -दुःख साझा हो जायेंगे। आप क्या कहते हैं ?
अब वालिद साहब समझ चुके थे , अब रिश्ता टूट गया है ,अब ये 'खींसे निपोरते हुए ''यहाँ आये हैं। अब उन्हें ख़ालिद की कही बातें याद आई' वक़्त आने पर मालूम पड़ जायेगा।' तब वो बोले - देखो ! यूसुफ़ घर की सी बात है ,तभी तो मैं रिश्ता लेकर गया था परन्तु तुमने मना कर दिया।
वो तो भाईजान ! हम अहमद मियां के लिए ही भरोसे से बैठे हुए थे ,हमें क्या मालूम था ? वे ऐसे निकलेंगे। अब तो हम इस रिश्ते के लिए तैयार हैं। आप क्या कहते हैं ?
उस समय तुम नहीं माने, परन्तु मैं तो अभी भी तैयार हूँ। अब मुझे घर में भी बात करनी होगी। ज़ोया और ख़ालिद से पूछकर बताता हूँ ,कहीं उसने तो किसी से बात की हुई है या नहीं।
यूसुफ़ को बेचेँनी सी होने लगी ,उनके तेवर देखकर उसे लग रहा था ,ये मुझे टरका रहे हैं ,तब बोला - जब अपने घर में लड़की है ,तो बाहर क्यों जाना ?'ख़ालिद 'की जोड़ी ज़ीनत के साथ अच्छी रहेगी। अपना ख़ालिद भी तो उसे पसंद करता है।
वक़्त के साथ पसंद ,नापसंद में भी बदल जाती है ,चचाजान !अंदर से बाहर आते हुए ख़ालिद ने जबाब दि या।
ये क्या बात हुई ,बरख़ुरदार ! न दुआ ,न सलाम !
अस्सलाम वलैकुम !चचाजान ! मैंने तो अपनी बात रखी ,वैसे आप लोग किसकी बात कर रहे हैं ?
वाहिद को डर था कहीं ये लड़का उल्टा - सीधा न बोल दे !तब वो बोले -तुम अपने काम पर जाओ !यहाँ बड़ों की बातें चल रही हैं।इशारों ही इशारों - बेटे में कुछ बात हुई और ख़ालिद चला गया।
बेटे के जाने के बाद, वाहिद साहब बोले - इसी के कहने पर तो मैं रिश्ता लेकर गया था , इसे अपनी ज़ीनत बहुत पसंद आई थी किंतु तुमने, बेचारे का दिल तोड़ दिया। बहुत मुश्किलों से इसे मनाया है। अभी मैं इसके सामने कुछ भी बात नहीं कहना चाहता। पहले इसकी अम्मी से बात करता हूं। तब देखते हैं, क्या करना है ? क्या रुकैया जानती है ? कि तुमने उसके बेटे से रिश्ता तोड़ दिया है ?
हां हां भाई जान ! मैं, इसमें कोई गलतफहमी की गुंजाइश नहीं रखता , पहले उनसे बात की है , तभी हम आगे बढे हैं।
रुकैया ,क्या कह रही थी ?
वह भी बेचारी परेशान है , अब बच्चा ही ऐसा है, वह भी क्या कर सकती है ? कह रही थी -भाई जान !जहां आपको अच्छा लगे वहां अपनी ज़ीनत का रिश्ता कर दीजिए। अब यह बात तो मुझे सलमा ने ही सुझाई वरना मैं तो भूल ही गया था कि अपना ख़ालिद ज़ीनत को पसंद करता है।
यह बात तो सही है , सलमा को अपने घर- परिवार का बहुत ही ख्याल रहता है। अच्छा !अब तुम जा सकते हो। जोया भी यहां नहीं है, वरना चाय -पानी तो पिला ही देता।
कोई बात नहीं, भाई जान ! अपना ही घर है, फिर कभी पी लेंगे , अभी चलता हूं, मुझे आगे भी कुछ काम है।
अब मैं भी उठकर अपनी तैयारी करता हूं, तभी अंदर से आवाज आई - खालिद के अब्बू ! तैयार हो जाइए ! खाना लग गया है। एक नजर यूसुफ ने, वाहिद की तरफ देखा , वाहिद को इसका इल्म ही नहीं था कि जोया इस तरह उसे आवाज लगा देगी। तब बोला -मुझे मालूम ही नहीं था कि वह आ गई है , आओ चलो !थोड़ी-थोड़ी चाय हो जाए।
नहीं, भाई जान ! अब मैं चलता हूं ,मुझे देरी हो रही है , सलमा ने तो मेरा खाना बना कर रखा हुआ होगा। कुछ जल्दी में था, इसलिए बिना खाए चला आया था। वह तो मेरे इंतजार में बैठी होगी, यह कहकर वह वहां से निकल गया। मन ही मन सोच रहा था , क्या मैं जानता नहीं हूं ? जोया घर में ही थी , वह तो भाई जान ने ही उसके जाने का बहाना बनाया , मुझे चाय भी नहीं पिलाना चाहते थे ,इसीलिए तो हम अलग हुए हैं किंतु क्या करें ?मजबूरी में आना ही पड़ा। ज़ीनत की जिंदगी का सवाल जो है। उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें बेइज्जत करके घर से निकाल दिया गया है। उन्होंने कहा भी कुछ नहीं और अपने व्यवहार से, बहुत कुछ बतला भी दिया।
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