शिखा ,जब अपनी ससुराल आई थी ,तो मन में दुःख तो था किन्तु अपनी ससुराल के लोगों के प्रति कर्त्तव्य परायणता थी। अपने पति' तेजस' के न रहने पर भी, वह अपने उत्तदायित्वों को निभाना चाहती थी। फेरों के समय दिए गए ,वचनों का पूरी तरह निर्वहन तो नहीं कर सकती थी किन्तु प्रयास अवश्य करती ,यही सोचकर यहाँ आई थी ,यदि उसे मौका दिया जाता किन्तु वहां का वातावरण उसकी सोच के बिल्कुल विपरीत था। उससे कोई बात ही नहीं करता था ,उस घर में ,महिलाओं के नाम पर एक बुआ और एक अपनी सास से उसका परिचय हुआ। बंदिनी उसके कार्यों के लिए ही आती थी। न ही कोई सुननेवाला ,न ही समझने वाला किसी से पूछें और कहे भी तो क्या ?
अभी तक परिवार के लोगों के विषय में ठीक से नहीं जान पाई है ,जबकि उसे दमयंती से सतर्क रहने की चेतावनी अवश्य मिल चुकी है। आज जब वह अपनी अलमारी से अपने लिए कपड़े निकाल रही थी ,तब उसकी दृष्टि उन रंगीन साड़ियों पर गयी ,जिन्हें वह लगभग भूल चुकी है। आज उन्हें देख वही बातें स्मरण हो आईं किन्तु उन्हें देख निराशा से भी भर गयी। अब ये रंग उसके लिए नहीं हैं ,उसके लिए तो सिर्फ यही ''श्वेत वर्ण'' रह गया है। इन्हें दूसरा रंग छू भी नहीं सकता। कितना पाक़ और साफ़ हैं ? मन को समझाती है। किन्तु ये रंग भी तो मुझे अपनी और आकर्षित कर रहे हैं। फिर सोचा -मां और पिताजी की याद में, यह साड़ियां यूं ही रखी रहेगीं , वे लोग तो मेरे पास नहीं हैं उनके दिए ये उपहार ही मुझे याद दिलाते रहेंगे ,वो मेरे पास है। उनके दिए ये उपहार,स्नेह भरी दृष्टि से देखते हुए बोली -मेरे पास ,उनकी अब यही धरोहर है।
मन में अजीब सी बेचैनी है।खूब देर तक पानी के नीचे खड़े होकर अपने मन की बेचैनी को शांत करने का प्रयास करती है। नहाने के पश्चात जब वह बाहर आई, तो गौरव वहां पहले से ही खड़ा हुआ था । उसे देखकर वह सहम गई ,वह पेटीकोट- ब्लाउज में ही थी। उसे कुछ नहीं सूझा ,पीछे की तरफ भागी और ग़ुसलख़ाने में चली गयी ,वहीं से बोली - आप इस तरह अंदर कैसे आए ? क्या आपको मालूम नहीं है ? यह मेरा कमरा है, किसी लड़की के कमरे में कदम रखने से पहले, दरवाजा खटखटाना चाहिए ,क्या ये बात नहीं जानते हैं ?
मैं तो ऐसे ही करता हूँ ,जब भी जहाँ भी जाता हूँ ,ऐसे ही चला जाता हूँ ,फिर तुम्हारा दरवाज़ा कैसे खटखटाता वो तो पहले से ही खुला हुआ था इसीलिए आ गया।
अच्छा ,जरा वो साड़ी मुझे उठाकर दो ! सोचकर बुदबुदाती है -हां, बंदिनी ने ही खुला छोड़ होगा।
गौरव ने शिखा को साड़ी उठाकर दे दी ,तब वह बोला -ऐसे हम किसी का कार्य नहीं करते किन्तु तुम कह रही हो तो, दे देता हूँ। उसे साड़ी देते हुए बोला - कोई बात नहीं, मैं चला जाता हूं, बाद में आ जाऊंगा ,ख़ैर आया हूँ तो अपनी बात कहकर चला जाउंगा - क्या तुमको मालूम है, मैं इसीलिए यहाँ आया हूं, तुम तो नीचे आती नहीं हो, मैंने सोचा - मैं ही तुमसे मिल कर आ जाता हूं।
ऐसे पूछकर कौन आता है ? ये कोई विद्यालय नहीं,अपने घर में भी आने से पहले पूछना पड़ेगा , कहते हुए हंसा।
मन ही मन शिखा ने सोचा -इसे इतनी अक़्ल कहाँ होगी ?घर में माँ के अलावा किसी अन्य महिला से पाला न पड़ा होगा ,इससे बहस करना व्यर्थ है ,यह सोचकर पूछा - क्या कोई कार्य था ?
नहीं कार्य तो कुछ नहीं था, बस यही पूछने आया था तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं। मन ही मन शिखा सोच रही थी ,आजकल इन लोगों को मेरी बड़ी याद आ रही है। तब वह बोला -अब भाई तो नहीं है ,हमें ही तुम्हारा ख़्याल रखना होगा। उसकी तरफ देखता है ,उसके धुले, खुले ,गीले बाल ,सफेद साड़ी में भी भीगी हुई मोरनी सी लग रही थी ,तभी अचानक बोल उठा - तुमने ये सफेद साड़ी क्यों पहनी है ? तुम कितनी सुंदर हो ? यदि रंगीन साड़ी पहनतीं तो और भी सुंदर नजर आतीं।
जानती हूँ ,किन्तु तुम्हारे भाई के लिए ही तो सजती ,अब वो नहीं रहे तो, किसके लिए सजना है ?
मेरे लिए सजो ! मैं तुम्हें देखूंगा अचानक गौरव बोल उठा।
शिखा ने उसकी तरफ देखा ,उसे बुरा नहीं लगा ,उसके चेहरे पर उसे मासूमियत नजर आई गर्वित की तरह उसे घूर नहीं रहा था। लोगों की सोच और नजर में कितना अंतर् होता है ?इसने भी कुछ ऐसी बात कही जिसको सुनना एक विधवा के लिए ठीक नहीं है किन्तु इसकी नजरों में वो खोट नजर नहीं आ रहा। क्या सोच रही हो ?
कुछ नहीं ,
तुम कहीं घूमना चाहोगी।
कहाँ घूमने जाना है ?अभी तक तो ये हवेली ही ठीक से नहीं देखी।
तो फिर देर किस बात की ?आज ही तुम्हें इस हवेली में घूमाते हैं,क्या तुम जानती हो ? हमारी एक हवेली और भी है ,वो भी बहुत अच्छी और बड़ी है।
अच्छा !मुझे तो किसी ने नहीं बताया ,तभी गौरव उठा और शिखा के बिस्तर पर पड़ी साड़ी उठाई और उसके ऊपर डाल दी ,देखो ! कितनी खूबसूरत लग रही हो ? बिल्कुल चाँद जैसी।
ये आप क्या कर रहे हैं ?आपको ये सब शोभा नहीं देता ,क्या आप जानते नहीं हैं ?मैं आपके भाई की बेवा हूँ ,अचानक ही शिखा गुस्से से गौरव को डांटते हुए बोली।
शायद गौरव, शिखा के इस व्यवहार के लिए तैयार नहीं था ,वो एकदम से उठा और बाहर आ गया। बंदिनी भी तभी उधर आई ,गौरव को इस तरह बाहर जाते देखकर शिखा से पूछा -क्या कुछ हुआ है ?
ये देखो !ये साड़ी मुझे ओढ़ा रहे थे ,मुझे लगता है ,इन लोगों को लड़कियों से कैसे व्यवहार करते हैं ?इसका तनिक भी ज्ञान नहीं है।
बहु जी ! वो तो ठीक है किन्तु इन्होंने किसी बुरी नियत से ऐसा नहीं किया होगा ,ये अपने अन्य भाइयों में सबसे सरल और अच्छे हैं। हाँ ,ठाकुरों वाली हेकड़ी तो है ,वैसे ये सबसे समझदार हैं ,बंदिनी कहना तो बहुत कुछ चाहती थी किन्तु दमयंती के ड़र से कुछ कह न सकी।
