Shaitani mann [part 104]

नितिन अभी तक पारस को लेकर परेशान था, क्योंकि पारस के विषय में उसने कुछ ऐसा देखा और सुना था जिसके कारण, वह अपनी बहन को बचाना चाहता था, उसे लग रहा था- कि मेरी बहन पारस  के चंगुल में फंस चुकी है इसीलिए पारस के प्रति नितिन का व्यवहार भी अच्छा नहीं था , नितिन के व्यवहार के कारण पारस का मन अत्यंत दुखी होता है। जब शिवानी ने यह सब देखा, तो उसे रहा नहीं गया और उसे लगा -कि मुझे नितिन की गलतफहमी दूर करनी चाहिए। वह जो भी पारस के विषय में सोच रहा है, वह अनुचित है, यही सोचकर वह एक दिन नितिन को फोन करती है और पारस के विषय में बताती है -

 तब शिवानी पारस और शिप्रा की कहानी उसको सुनाती है। अभी भी नितिन को पारस पर  विश्वास नहीं था कहानी के मध्य में उसके मन में कई प्रश्न आते हैं, तब नितिन के मन में एक प्रश्न और आता है , यदि शिप्रा को उससे विवाह ही नहीं करना था। तब वह चुपचाप, पारस से बता सकती थी।किसी भी तरह उस विवाह से इंकार कर सकती थी।  



हां, कह सकती थी किंतु उसके घर वाले भी सतर्क थे, कि कहीं ये लड़के से कुछ कह ना दे इसलिए उसे विवाह से पहले ,नितिन से अकेले में मिलने नहीं दिया। जब उन लोगों का विवाह हो गया तो पारस से उसने एक बार भी बात नहीं की। ''सुहागरात ''में भी,वह अपने गहने- कपड़े उतारकर ,अपना नाइट सूट पहने बैठी थी। खुश होते हुए ,जब पारस अपने कमरे में पहुंचा तो उसको देखकर अचम्भित रह गया। वो तो सोच रहा था, वो उसका घूंघट उठाएगा, वो शरमाएगी किन्तु वो पारस को देखते ही बोली -मेरी तबियत ठीक नहीं है। तुम उस तरफ सोफे पर सो जाओ ! कहते हुए ,उसने सोफे की तरफ इशारा किया ,जहाँ पहले से ही एक तकिया और चादर रखे हुए थे। 

पारस ने पहले उसकी तरफ देखा और उससे कहा -तुम्हारी तबियत को क्या हुआ ?क्या डॉक्टर को बुलवा लें ?तुमने पहले क्यों नहीं बताया ?

नहीं,डॉक्टर की आवश्यकता नहीं है ,आराम करूंगी तो ठीक हो जाउंगी। 

 क्या पति -पत्नी के मध्य' शारीरिक संबंध' ही होता है ?उनके बीच आपस में बातचीत ,परस्पर प्रेम ,विश्वास और भी तो बहुत कुछ होता है।आज की रात हम एक -दूसरे से बात कर सकते हैं ,एक -दूसरे को समझ सकते हैं ,क्या तुम्हारी कभी इच्छा नहीं हुई ? मुझसे बात करने की ,मुझसे मिलने की। मेरे फोन करने के बावजूद भी तुमने एक बार भी मुझे फोन नहीं किया वो शिकायत भरे लहज़े में बोला।   

तुमने कब फोन किया ? मैं,ये सब नहीं जानती ,मैं बहुत थक गयी हूँ ,मुझे बहुत नींद आ रही है कहते हुए ,उसने जम्हाई ली और करवट बदलकर लेट गयी , पारस उसे खड़ा देखता रहा ,तब वो उससे बोली -लाइट बंद करके तुम भी सो जाओ !

उसके इस व्यवहार से पारस बहुत आहत हुआ और उसे शिप्रा का व्यवहार भी खटका और उसके मन में एक प्रश्न उठा - क्या ये इस विवाह से प्रसन्न नहीं है ?

अगले दिन वो लोग,' पग़ फेरे' की रस्म करने के लिए ,उसके घर के लिए रवाना हुए , रास्ते भर शिप्रा ने,पारस से एक भी बात नहीं की , वह उससे उखड़ी -उखड़ी रही। जब वे लोग,उसके  घर पहुंचे। वहां पर उनका बहुत सम्मान हुआ, मन ही मन  शिप्रा के पिता, परेशान भी थे।शिप्रा ने , न जाने कैसा व्यवहार किया होगा ? घबरा भी रहे थे। घर पहुंचकर शिप्रा सीधे अपने कमरे में गयी ,उसने अपने घरवालों से भी बात नहीं की क्योंकि वह उनसे नाराज़ थी।  

लौटते समय, पारस ने उसके पापा से पूछा -यह इस विवाह से ख़ुश तो है न..... क्या यह विवाह  इसकी इच्छा से हुआ है ?

हां हां क्यों नहीं ? वह भला, खुश क्यों नहीं होगी ? क्या शिप्रा ने कुछ कहा ?अपने माथे का पसीना पोंछते हुए उसके पापा ने पूछा। 

नहीं ,कहा तो कुछ नहीं है पर..... 

इससे पहले की वह कुछ और कहता वे आश्वस्त होकर बोले -बीवी ,जितनी चुप रहे, उतना ही ठीक है,जबरन ही मुस्कुराने का प्रयास करते हैं ,कोई और मौका होता तो शायद पारस भी मुस्कुरा देता किन्तु  उसके मन में कुछ चल रहा था ,वह अंदर ही अंदर घुटने लगा था। पारस को शांत देखकर ,वे उसका मन रखने के लिए बोले - विवाह के दौरान थोड़ा थक गई होगी। वैसे हमने अपनी जिम्मेदारी पूरी की है , अब तुम्हें ही इसे संभालना होगा। अभी तुम दोनों एक दूसरे के लिए अजनबी ही हो, इसलिए थोड़ा झिझक रही होगी। जब एक -दूसरे को जानने लगोगे ,तब सब ठीक हो जायेगा। 

लौटते समय ,शिप्रा की मम्मी बोलीं - इससे कुछ गलतियां हो जाए, तो क्षमा कर देना ! कहते हुए उनकी आंखें नम हो आई , इसके पश्चात पारस उनसे कुछ न कह सका और न ही सुन सका। 

जब वे लोग, अपनी नौकरी पर आने के लिए निकल गए,पूरे रास्ते शिप्रा ने पारस से कोई बात नहीं की और ना ही,उससे पैसे मांगे ,स्वयं  ही सामान खरीदती और खा लेती ,न पारस से पूछती।पारस के घरवालों को तो इन बातों की भनक भी नहीं थी। 

शिप्रा के घर वाले सोच रहे थे -जब दोनों, अकेले रहेंगे, एक- दूसरे को समझेंगे तो दोनों में प्यार पनप ही जाएगा। किंतु उनकी सोच के विपरीत, शिप्रा ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, वह पारस से कोई बात नहीं करती थी। उसके इस व्यवहार से पारस बहुत क्षुब्ध था । वह समझ नहीं पा रहा था कि यह इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही है ? पारस भी, उससे कोई जबरदस्ती संबंध नहीं बनाना चाहता था । तब पारस ने सोचा - क्यों ना इसे बाहर घूमने के लिए ले जाया  जाए ,तब वह उसे बाजार घूमाने के लिए ले गया , ताकि वह कुछ कहे ,उससे बात करे,उन्होंने नारियल पानी पिया ,गोल -गप्पे खाये ताकि किसी बहाने से बातचीत का सिलसिला शुरू हो किन्तु वो हाँ, हूँ में जबाब  देती रही। 

वह मुस्कुराकर उससे बातचीत करता रहा ,ताकि अन्य लोगों को यह न लगे कि इनके रिश्ते के मध्य कुछ तो गड़बड़ है। वह अपने को सामान्य रखने का प्रयास  करता रहा। उसके दफ्तर में उसके दोस्त विवाह की पार्टी मांगते। भाभीजी से, मिलना चाहते किन्तु पारस उनसे कैसे कहता ?कि हम दोनों के बीच कुछ भी ठीक नहीं है। 

एक दिन पारस ने ,शिप्रा से कहा -मेरे कुछ दोस्त घर पर आना चाहते हैं ,तुमसे मिलना चाहते हैं। 

क्यों ?यहां क्या नुमाईश लगी है ?कहकर उसने पारस का मुँह बंद कर दिया। 

कुछ बाद ,पारस बोला -बाहर वाले क्या जाने ?कि हम कैसे रह रहे हैं ?उन्हें तो लगता है ,हम नवदम्पत्ति हैं ,इसीलिए आना चाहते हैं ,तुम कहो तो , उन्हें खाने पर बुला लेते हैं ,बहुत ज़िद कर रहे हैं। 

क्यों ?यहाँ क्या तुमने खाना पकानेवाली रख छोड़ी है ?मैं किसी की नौकर नहीं। 

तब पारस ने अपने दफ्तर के दोस्तों से बहाना बनाया ,वो अपने मायके गयी हुई  है। 

मन ही मन पारस सोचता ,क्या ऐसे ही जिंदगी कटने वाली है ?कभी -कभी झुंझलाहट भी होती ,मैं ही ये सब क्यों कर रहा हूँ ?क्या सोचा था ?जिंदगी कितनी खूबसूरत होगी ?किन्तु ये तो जहन्नुम लग रही है। इस तरह रहते उन्हें लगभग एक माह हो गया। पारस का हर प्रयास विफल रहा। धीरे -धीरे दोस्तों ने भी कहना बंद कर दिया। वह घर आता ,उसे रोटी बनी मिलती ,जब भी शिप्रा अपने लिए भोजन बनाती उसके लिए भी बनाकर रख देती। कभी उसने यह भी नहीं पूछा -तुम्हें खाने में क्या पसंद है ,या तुम्हारे लिए क्या सब्जी बनाऊं ? कई  बार कह चुकी थी -एक नौकर रख लो !खाना बना दिया करेगा। कई बार पारस को स्वयं ही भोजन बनाकर खाना पड़ता। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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