जो स्वयं घुटनों तक अपराध के दलदल में धंसा हुआ है, वह दूसरों से उम्मीद करता है कि वे सदमार्ग पर चलें , उसकी बहन के साथ कोई अपराध न हो जाए या दूसरा व्यक्ति ईमानदारी से वह रिश्ता निभाएं। हालांकि अपराध तो नितिन ने भी किये हैं किंतु जब उसकी बहन पर यह बात आई तो वह एक ज़िम्मेदार नागरिक बन गया और शिवानी के पति की जानकारी लेने में जुट गया और उसने उसके पति से बात करते हुए उसे अपमानित करने का एक मौका भी नहीं छोड़ा। जिसके कारण शिवानी के पति को दुख हुआ और शिवानी ने फिर इसी सिलसिले में उससे बात करनी चाही।
यह बात शिवानी को अच्छी नहीं लगी, वह नितिन को फोन करती है और वह उसे बताती है -विवाह से पूर्व' पारस' ने मुझे सब कुछ सच -सच बता दिया था। उनका पहले भी विवाह हो चुका है, उनकी एक पत्नी थी, जिसका नाम'' शिप्रा'' था। शिप्रा जितनी सुंदर थी ,उतनी ही बददिमाग़ और बद्तमीज़ ! पारस और शिप्रा जब मिले थे तो उसकी सुंदरता के कारण'' पारस''पहली ही नज़र में उसे दिल दे बैठा था । उसे वह देखते ही पसंद आ गई थी।
उसको लेकर,वह जीवन के सुंदर-सुंदर सपने सजाने लगा था किंतु वह यह नहीं जानता था कि इस रिश्ते में शिप्रा की सहमती है या नहीं ,वह किसी और से प्यार करती थी। पारस के मन में भी यह ख्याल नहीं आया कि वह किसी और से प्यार करती होगी या उससे यह पूछ ले ,वो उसे पसंद है या नहीं। जब मन में ऐसा विचार ही नहीं था तो उसने इस विषय पर बात ही नहीं की हालाँकि पारस उससे बात करना चाहता था।
तब शिप्रा के पिता बोले -जब लड़के को लड़की पसंद है और लड़की को लड़का,तो क्यों न विवाह की बातें ही की जाएँ। पारस छुट्टियों में अपने घर गया था ,रिश्ता तय होने के पश्चात वो वापस अपने काम पर चला गया।एक बार शिप्रा से मिलना चाहता था किन्तु ऐसा मौका हाथ नहीं लगा। तब भाई की परेशानी समझ पारस की बहन ने शिप्रा के पिता से शिप्रा का फोन नंबर माँगा।
फोन नंबर क्यों ?
अंकल जी !आप भी कैसी बातें करते हैं ? अब दोनों का रिश्ता तय हो गया है। दोनों आपस में बातें कर लेंगे।
ओह ! कहते हुए वो हँसे और बोले -तुम सही कह रही हो,कहते हुए उन्होंने एक पर्ची पर लिखकर फोन नंबर उसे दे दिया।
एक दिन पारस को समय मिला सोचा ,आज शिप्रा से बात कर लेता हूँ ,देखूं तो भला, मेरे विषय में क्या सोचती है ?पारस ने उस नंबर पर फोन लगाया, तुरंत ही उसके पापा ने, वो फोन उठाया।जैसे वो उसी के फोन की प्रतीक्षा में थे। पारस सकपका गया ,उसने पूछा -ये नंबर तो ''शिप्रा'' का है।
नहीं ,बेटे शिप्रा का कोई अलग से नंबर नहीं है ,सबका यही नंबर है।
ओह !अच्छा !कहकर वो अपनी झेंप उतार रहा था।
तभी वो बोले -और सुनाओ !तुम्हारी नौकरी कैसी चल रही है ?
बस, पापा जी! व्यस्त रहता हूँ। आज छुट्टी थी तो सोचा ,फोन कर लूँ। ये सोचकर कि शायद वो समझ जाएँ और शिप्रा को फोन दे दें।
ये तो तुमने बहुत अच्छा किया ,इतनी दूर रहकर ,अपनों की याद तो सताने ही लगती है।
तब विवश होकर पारस ने पूछा -क्या शिप्रा घर पर है ?
नहीं ,वो तो अपनी सहेली के घर गयी है ,उसे पता नहीं था कि तुम फोन करने वाले हो वरना रुक जाती।
कोई बात नहीं ,जब आ जाये तो बता दीजियेगा ,मैंने फोन किया था।
ये भी कोई कहने की बात है ,उसे समय मिला तो अवश्य फोन करेगी ,वैसे वो शादी की तैयारियों में व्यस्त है।उन्होंने पारस को यह जतला दिया कि वो बात नहीं कर पायेगी। पारस ने संतोष किया और विवाह के दिन गिनने लगा।
क्या शिप्रा ने उसे,तब भी फोन नहीं किया ?
नहीं ,क्योकि उसके पापा ने उसे बताया ही नहीं था ,वो तो घर में ही थी।
वो भला ऐसा क्यों कर रहे थे ?
ये तो ज़ाहिर सी बात है ,वो नहीं चाहते थे कि शिप्रा और पारस आपस में बातचीत करें।
ये क्या मूर्खता है ? विवाह के बाद भी तो बात करेंगे।
उनका सोचना था ,जब विवाह हो जायेगा ,तब उनकी लड़की पारस से मिलेगी तो धीरे -धीरे उनमें प्यार हो जायेगा। पहले समय में भी, लड़के -लड़की विवाह से पहले कहाँ मिलते थे ?विवाह होने के पश्चात ,लड़का हो या लड़की परिस्थितियों से समझौता कर ही लेते थे। शायद,उन्होंने भी यही सोचा होगा किन्तु उन्होंने ये नहीं सोचा कि उनकी लड़की समझौता करेगी भी ,या...... नहीं , तो उन्होंने सोचा ही नहीं होगा। यदि उसके विपरीत सोच लेते और लड़की को विश्वास में लेकर उससे बात करते तो शायद दो ज़िंदगियाँ बर्बाद होने से बच जातीं।
अपनी सोच के आधार पर ,पारस से परिस्थितियों को छुपाते हुए ,उन्होंने शिप्रा का विवाह पारस से करवा ही दिया। पारस मन ही मन बहुत प्रसन्न था।उसे एक खूबसूरत पढ़ी -लिखी बीवी मिल रही थी और क्या चाहिए ? किंतु शिप्रा नाराज थी,अपने पिता और अपने घरवालों से क्योंकि उसकी नजर में उसका यह विवाह उसकी बिना इच्छा के जबरदस्ती हो रहा था। शिप्रा, पारस से विवाह करना ही नहीं चाहती थी क्योंकि वह किसी अन्य लड़के से प्यार करती थी।
क्या उसने अपने घरवालों को अपने प्यार के विषय में नहीं बताया था ?बताती तो शायद इतनी बात ही न बढ़ती।
बताया था ,उसने सबके सामने खुलकर कहा था ,कि वह' सुंदर' से प्यार करती है किंतु वह लड़का शराब पीता था और काम भी नहीं करता था।हाँ ,इतना जरूर था ,वो पारस से ज्यादा जंचता था। पार्टियां करना ,सिगरेट पीना ,महंगी मोटरसाइकिल पर घूमना ,वो बस यही करता था। शिप्रा को उसके रहने -सहने का ये तरीक़ा बहुत पसंद था। उसे हीरो समझती थी किन्तु पिता ने शिप्रा के भविष्य को सोचकर सीधे -साधे पारस को चुना ,जो बड़ों का आदर करता था ,अपने परिवार से जुड़ा था और सबसे बड़ी बात वो एक ज़िम्मेदार अफ़सर था। अब तुम ही सोचो !जो व्यक्ति पढ़ता -लिखता है ,अपने ''पैरों पर खड़ा है। ''वो ऐसी मस्तियाँ कैसे कर सकता है ,उसके पास समय ही कहाँ होता है ?
किन्तु कुछ दिनों के लिए पारस के जीवन में भी बहार आई ,उसे भी हवा के झोंके महसूस होने लगे,रातों को शिप्रा के सपने आने लगे। ज़िम्मेदारियों से परे भी एक हसीन जिंदगी नजर आने लगी ,वह मन में उमंगें महसूस करने लगा। उसकी खुशबू महसूस करने लगा ,उसके संग जीने के सपने सजाने लगा। उसके लिए घर में हर एक सुविधा के लिए सामान जुटा रहा था ताकि उनका वैवाहिक जीवन एक सुंदर यादगार बनकर रह जाये।
शिप्रा के पिता ने उसे समझाया था -''तुम क्यों जानबूझकर अपने को ''अंधे कुएं में धकेल रही हो।'' क्या तुम नहीं जानती हो कि वह लड़का कुछ भी नहीं करता है,बाप के पैसे पर ऐश कर रहा है। तुम्हें क्या खिलाएगा ?
तब शिप्रा ने जवाब दिया, मैं नौकरी कर लूंगी , मैं उसे बिठाकर खिला सकती हूं।
वह तुम्हारे वेतन को शराब में उड़ा देगा, तब तुम क्या करोगी ?
शिप्रा कहने लगी- कि'' मैं प्यार से उसे समझाऊंगी और उसकी शराब छुड़वा दूंगी अपने प्यार के लिए वो इतना तो कर ही सकता है। उसे अपने आप पर यकीन था कि मैं काम करके उस घर को चला सकती हूं और अपने प्यार से, उस लड़के की शराब भी छुड़वा सकती हूं। किंतु उसके पिता ने उसका 'बालपन' समझ कर उसका विवाह पारस से तय कर दिया और उसको इन बातों की तनिक भी भनक नहीं होने दी ।
उसका पिता जबरदस्ती उसका विवाह करवा रहा था, तब वह चुपचाप पारस से भी तो कह सकती थी।
