Mysterious nights [ part 51]

 शिखा आज मन में ढृढ़ निश्चय करके रात्रि के दूसरे पहर में,उन कमरों की तरफ आगे बढ़ती है ,एक कमरे से दूसरे कमरे की तरफ बढ़ने से पहले ही, उसे कई एहसास होते हैं ,उन एहसासों के चलते वो आगे बढ़ना चाहती है। मन ही मन परेशान भी है ,अपने कुछ प्रश्नों के हल ढूंढने चली थी ,यहां आकर तो और प्रश्न उठ खड़े हुए। वह आगे बढ़कर ,अन्य कमरे में प्रवेश करती है तो घबरा जाती है। उसे लगा ,यहां क्या चल रहा है ?सम्पूर्ण कमरे में हरियाली थी ,वो भी एक शयनकक्ष जैसा ही था। किन्तु उस स्थान को देखकर लग रहा था, जैसे किसी अलग ही दुनिया में पहुंच गयी है। उसको इस तरह से सजाया गया था, जिससे किसी बगीचे के होने का एहसास हो। पंछियों की तस्वीरें ,लगता जैसे सजीव हो उठी हैं। नाचता मयूर !एक विशेष पलंग के पीछे था। जब उस पंलग के सिरहाने की उस दिशा में उसकी दृष्टि गयी तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयीं। 


उस पलंग के सिरहाने ऐसे ही एक तस्वीर रखी थी ,जैसे पहले कमरे में थी ,वहां दमयंती और...... ये सब क्या हो रहा है ?वो बुरी तरह घबरा गयी और वहीं बिस्तर पर लुढ़क गयी। प्रातःकाल जब उसकी आँख खुली तो वो अपने बिस्तर पर थी। आखें खुलते ही, उसे रात्रि की सभी बातें स्मरण हो आईं। अपने आपको, अपने कमरे में देखकर सोचने लगी -मैं यहाँ कैसे पहुंची ,मुझे यहाँ लेकर कौन आया ? लग रहा था ,जैसे कोई सपना देखा है। उस अनुभूति को महसूस करना चाहती थी ,वो घटना सच ही थी। मैं वहां सच में ही गयी थी , यदि गयी थी तो मुझे यहाँ कौन लाया ?कुछ समझ नहीं आ रहा। 

तभी बंदिनी ने कमरे में प्रवेश किया और बोली -बहु जी !उठ गयीं ,लीजिये चाय पी लीजिये,आज तो देर तक सोती रहीं ,क्या रात्रि में ठीक से नींद नहीं आई ? 

कुछ सोचते हुए ,शिखा ने पूछा - मैं यहाँ कैसे आई ?

क्या मतलब ?आप तो यहीं थीं ,क्या कहीं गयीं थीं ?उसने शिखा की तरफ देखा। 

नहीं, कहीं नहीं गयी थीं ,किन्तु लगता है ,जैसे मैं यहाँ नहीं थी। 

उसकी बात सुनकर बंदिनी हंसने लगी ,और बोली -बहु जी ! आज कैसी बहकी -बहकी बातें कर रहीं हैं ?यहाँ नहीं थीं तो कहाँ गयीं थीं ? एक महीने से तो मैं आपको यहीं देख रही हूँ। आपने कोई सपना देखा होगा ,जवान हो ! खूबसूरत हो !सपने तो आते ही होंगे। आपके जीवन में ऐसा समय आया ,जो किसी भी नारी के जीवन में भी नहीं आना चाहिए,ये बात आप जानती हैं -''कि अब आप'' सुहागन ''नहीं रहीं  किन्तु  आपकी उम्र को थोड़े ही पता है कि आपके साथ क्या हादसा हो गया है ? नदी तो अपनी राह बहती ही है ,उसका कार्य तो बहना ही है ,आप जबरन ही, उस पर बांध रहीं हैं ,कभी तो ये बांध टूटेगा ही...... ''

शिखा को लगा- ये भी न जाने, क्या बकवास किये जा रही है ?बात का कुछ पता नहीं है ,अपनी -अपनी बोले जा रही है। तब झुंझलाकर उससे बोली -तुम क्या बोले जा रही हो ? बात का कुछ पता भी है। 

बहु जी ! तब तुम ही बता दो !क्या बात है ? मैं तो इसीलिए कह रही थी ,आप बहुत दिनों से कहीं बाहर नहीं गयीं हैं ,एक जगह पड़े -पड़े मन अनेक विचारों में खो जाता होगा ,या कोई बुरा स्वप्न देख लिया होगा। कई बार मन में बहुत से विचार आते हैं और जब वे असल जीवन में पूर्ण नहीं होते तो हमारे स्वप्न या तो उन्हें पूर्ण करते हैं या फिर सपनों में आकर सताते हैं।

तुम्हें इतना सब सोचने की आवश्यकता नहीं है ,चाय का घूंट भरते हुए शिखा बोली -वैसे आज चाय बहुत अच्छी बनाई है।

चाय तो, रोज़ की तरह ही बनी है किन्तु कभी -कभी हमारे मूड़ के हिसाब से भी चाय का स्वाद बदल जाता है ,आज आपको इसकी सख़्त जरूरत महसूस हो रही होगी इसीलिए आज ये आपको अच्छी लग रही है। 

 तुम बातें तो ऐसी करती हो जैसे ,ज़िंदगी ने बहुत अनुभव किये हैं ,अब तुम अपने काम से काम रखो !अभी मैं ज्यादा ज्ञान सुनने के मूड़ में नहीं हूँ। हाथ में तौलिया लेते हुए बोली - अच्छा ! तुम अपना कार्य पूर्ण करो !मैं नहाकर आती हूँ ,कहते हुए फिर से उसी अलमारी की तरफ बढ़ती है। आज उन साड़ियों को देख उसे लग रहा था ,जैसे जिंदगी ने उसके साथ कोई बहुत बड़ा खिलवाड़ किया हो।

 बंदिनी सही तो कह रही है -'यह मेरी उम्र खेलने, और खुश रहने की थी और मैं यहां बेवा का जीवन जी  रही हूं किंतु अब तो, इस जीवन को देखकर लगता है, यह भी ढकोसला ही है।  मेरे इस जीवन का कोई अर्थ भी है या नहीं, मेरे जीवन की किसी की नजर में कोई कीमत है भी या नहीं। किसके लिए मैं त्याग कर रही हूं और क्यों कर रही हूं ? यह सब अपने' तेजस' के लिए ही तो कर रही हूं किंतु वह मुझे अपने पास और अपने साथ कभी महसूस ही नहीं होता। क्या यह मेरा जीवन इसी तरह व्यर्थ चला जाएगा ? यहां जो कुछ भी हो रहा है, क्या वह सही है ? जो मैं समझ रही हूं, उसके आधार पर तो लगता है। यहां बहुत कुछ गलत हो रहा है, क्या कोई भी नहीं जानता ? फिर मैं ऐसे  घर  में कैसे रह सकती  हूँ ?

 इन लोगों के मन में,मेरे जीवन का कोई महत्व है भी या नहीं। कल जो कुछ भी मैंने वहां देखा, वह झूठ तो नहीं हो सकता। सबसे बड़ी बात तो यह है कि मैं यहां कैसे आई ? कोई मुझे चुपचाप लिटा कर चला गया और मुझे पता भी नहीं चला। यदि यहां कुछ गलत हो रहा है, तो किसी ने मुझसे  कुछ कहा भी नहीं , सब इसी तरह खामोश ! अपने-अपने कार्यों में व्यस्त हैं  न ही, मुझे कोई पूछता है और न ही कोई मुझे बताता है। यह कैसा जीवन है ?

बहू जी ! नहाने चली गईं , उसके विचारों का तारतम्य  टूट गया , यह भी न... मेरे  पीछे पड़ी रहती है , हां यही तो पीछे रहती है बाकी तो इस घर में कोई पूछता ही नहीं है। पूछेगा भी कौन ? औरत का दर्द तो औरत ही जानती है , यहां एक ऐसी औरत है, जिसे शायद दर्द का एहसास होता ही नहीं या फिर दर्द को पाल रही है।मेरा दर्द !अपना दर्द ! ये कैसा दर्द है ? जो खामोश है ,बेपरवाह है !  

  

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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