Mysterious nights [part 50]

शिखा के लिए, हवेली के वे कमरे रहस्यमयी बने हुए थे, वह जानना चाहती थी, कि आखिर इन कमरों का रहस्य क्या है ? उधर कोई भी नहीं जाता था ,हाँ, ये हो सकता है ,नौकर जाते हों किन्तु शिखा ने वहां किसी नौकर को भी जाते नहीं देखा।  उसने एक दो- बार दमयंती को, अपने पति और जेठ के साथ,उधर जाते हुए देखा है। वह जानना चाहती है, कि इस परिवार की अन्य महिलाएं कहां है ? क्या इस परिवार के अन्य सदस्यों का विवाह हुआ है या नहीं ? उसके सामने एक रहस्य और बना हुआ था, वह भी'साज -सज्जा' वाली आकर बात कर गई थी। आखिर इस परिवार में क्या चल रहा है ? उसे यहां आए हुए, एक माह  ही हुआ है किंतु यह परिवार उसके लिए एक रहस्य बना हुआ है। तब एक रात्रि में, जब सब सो जाते हैं और उसे लगता है ,कि कोई उसे देख नहीं पाएगा।तब  वह उस हवेली के ,उस हिस्से में जाती है। जिस हिस्से में, वह चार कमरों का रहस्य छुपा हुआ था। 


वह अपने कमरे से बाहर आई और पूर्व दिशा की तरफ उसके क़दम स्वतः ही बढ़ते चले गए ,आज जैसे उसके मन ने, ढृढ़ निश्चय कर लिया था ,वह आज सच्चाई का पता लगाकर ही रहेगी। एक कमरे में रौशनी नजर आ रही थी किन्तु कल दमयंती जिस कमरे से बाहर आई थी ,वो दूसरा था। उस खामोश रात्रि में, वह चुपचाप आगे बढ़ रही थी , उसके मन में एक डर समाया हुआ था, कहीं कोई उसे देख न ले , हालांकि उस परिवार में ज्यादा लोग नहीं थे किंतु कदम- कदम पर पहरा भी लगा हुआ था। आज अपने मन की सुन रही थी, तब वह सीढ़ियों नीचे उतरती है और हवेली के खम्बों  से छुपते -छुपाते हुए आगे बढ़ती है।

 मन में घबराहट थी, कहीं कोई देख न ले। वह चुपचाप आगे बढ़ रही थी। हवेली भी काफी बड़ी थी, वहां पहुंचने में उसे समय तो लग रहा था,ड़र के कारण उसका गला भी सूख गया था। उसे लगता रहा था जैसे वह ही, कोई गलत कार्य कर रही है। गला तो उनका सूखना चाहिए ,जिन्होंने कुछ गलत किया हो। मन ही मन सोच  रही थी - जासूसी करना भी आसान कार्य नहीं है , एक बार पहले भी प्रयास कर चुकी थी किंतु नाकामयाब रही।

 रात्रि  बढ़ने के साथ -साथ ,वह भी आगे बढ़ रही थी, इसीलिए ठीक से रास्ता भी नहीं नजर आ रहा था उसे किधर जाना चाहिए।जब छत से देखती है,तो लगता है ,सामने ही तो हैं किन्तु वहां पहुंचने में समय लग  रहा था।  छुप - छुप कर आगे बढ़ते हुए, उसे लगभग आधा घंटा से ज्यादा हो गया था। तभी एक आदमी का स्वर गूंजा, क्या वहां कोई है ? शिखा बुरी तरह घबरा गई, उसे लगा -आज वह पकड़ी गई , हालाँकि वह उस घर की बहु है ,कहीं भी आ जा सकती है किन्तु यहाँ उसकी सोच अलग है ,वह परिवार की हकीक़त से रूबरू होना चाहती है ,या फिर उस घर की कमजोरियां ढूंढ रही है ,वह स्वयं ही नहीं जानती किन्तु अपने मन की जिज्ञासा शांत करना चाहती है ,आँखों ने जो देखा ,उससे मन में उठ रहे सवालों का हल चाहती है। 

कुछ देर इसी तरह खम्बे से चिपकी खड़ी रही ,वह पसीने से तरबतर हो गई थी ,वह चुपचाप एक चौड़े स्तम्भ की तरफ बढ़ चली। वह आदमी आगे बढ़ रहा था, शायद उसे भ्र्म हुआ है , यह सोचकर वह वापस हो गया। तब शिखा आगे बढ़ी। जब वह कमरे के नजदीक पहुंची, तो उसकी धड़कने पहले ही, उसका साथ छोड़, वे  उससे आगे तेज बढ़ रही थीं । 

 बहुत धीरे से शिखा ने एक कमरे का दरवाजा खोला, और कमरे के अंदर आ गई , उसे घबराहट भी थी, कहीं कोई हुआ तो वह उससे क्या कहेगी ?वह यहां क्यों आई है ? अंधेरे में कुछ दिखलाई भी नहीं दे रहा था। वह लाइट जलाना नहीं चाहती थी, एक कमरे में पहले से ही लाइट जली हुई थी। वह अपने साथ एक मोमबत्ती और माचिस लेकर आई थी। वह मोमबत्ती जलाती है। उस प्रकाश में ,उसने देखा - वह  एक सुसज्जित कमरा था। जिसमें बहुत खूबसूरत शानदार पलंग सजा हुआ था।देखा जाये तो वो एक शयनकक्ष था।  उसके सिरहाने की एक तरफ दमयंती और जगत सिंह की तस्वीर थी। ओह ! तो यह, पापा जी और मम्मी जी का कमरा है , मन ही मन बहुत बुदबुदाई। यदि यह इनका कमरा है, तो फिर अन्य कमरों में क्या है ? उस कमरे की अलग ही पहचान थी।उसकी सभी दीवारें हल्के और गहरे नीले रंगों से सजी थीं। 

व्यर्थ में ही इतना परिश्रम किया ,''खोदा पहाड़ ,निकली चुहिया ''सोचकर वह बाहर आ रही थी। तभी उसे मम्मी जी के  हंसने के स्वर के साथ कुछ शब्द भी सुनाई दिए -ओह !ज्वाला !अब दुनिया कुछ भी समझे या कहे ,मैं हमेशा से ही तुम्हारी रही हूँ और तुम्हें ही चाहती रहूंगी।

शिखा के पांव वहीं के वहीँ ठिठक गए और सोचने लगी -ये क्या हो रहा है ? ज्वाला सिंह जी, तो सबसे छोटे हैं ,उनके साथ मम्मी जी के अनैतिक संबंध है ,तो क्या पापा जी को पता नहीं होगा ?पता होता, तो घर में ये अनर्थ न हो रहा होता। मुझे तो लगता है -इनके इन्हीं संबंधों के कारण इनकी पत्नी इन्हें छोड़कर चली गयी होगी।इसीलिए गांव के लोगों से भी ये लोग, ज्यादा संबंध नहीं रखते हैं। ये भी तो हो सकता है ,उन लोगों ने ही इनका बहिष्कार किया होगा। मैं भी तो इस घर से बाहर नहीं जा सकती क्योंकि इस ख़ानदान  की बहु जो हूँ। उसका मन कसैला हो गया और कड़वाहट से भर गया।

 जो घर स्वयं ऐसे रिश्तों की नींव पर खड़ा है ,उस घर के लिए मैं इतना बड़ा त्याग कर  रही थी,ये लोग ,ऐसे त्याग के क़ाबिल नहीं हैं। मैं व्यर्थ में ही महान बन रही थी ,ऐसे परिवार के लिए त्याग करना मूर्खता है और कुछ नहीं। तभी उसे जैसे कुछ स्मरण हुआ ,अपना अधूरा काम पूरा करना है ,सोचकर वह अपने विचारों से बाहर आई और धीरे से उसके क़दम दरवाजे की तरफ बढ़ चले। 

शिखा आज तो जैसे सम्पूर्ण रहस्य जानकर रहेगी। उसके कानों  में दमयंती के वही शब्द गूंज रहे थे। वह उस कमरे से धीरे से बाहर आई और दूसरे कमरे की तरफ बढ़ चली ,आज तो उसे लग रहा था ,जैसे ये समय और यहाँ का वातावरण भी, उसका साथ दे रहा है ,उसे ड़र था, कहीं दरवाजा आवाज न करे किन्तु पहले दरवाजे की आवाज नहीं आई थी ,तब दूसरे की ओर बढ़ती है और दरवाज़ा खोलकर जैसे ही वो रौशनी करती है उसका सिर घूमने लगता है,उसे लगा जैसे -वो यहीं खड़े -खड़े गिर जाएगी।      

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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