Mysterious nights [part 48]

आज शिखा को उस घर की, हवेली की बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल हो रहीं थीं ,उसके कई सवालों के जबाब उसे मिल रहे थे। उसे तो ये भी नहीं पता था कि उस हवेली के मालिक और मालकिन यानि की ''ठाकुर अमर प्रताप सिंह जी ''जिन्दा भी हैं या नहीं अथवा उनकी मौत हुई तो कैसे ?जानती भी कैसे ,किससे पूछती ?थोड़ी बहुत बातें  बंदिनी से हो जाती थीं किन्तु अब वो भी शांत ही रहती है। तब वो पार्लर वाली लड़की,शिखा को बाथरूम में लेजाकर आगाह करते हुए ,चेतावनी भी देती है और शिखा से बताती है - तुम्हारी सास की सास जो गायब हुई थीं, वह भी बहुत ही रहस्यमयी तरीके से गायब हुई हैं।अपनी सास से बचकर रहना। उनके आने के पश्चात, इस घर में फिर कोई स्त्री, यहाँ नहीं आई।
 
ऐसा क्यों ?शिखा ने पूछा। 

वो सब तो मुझे नहीं मालूम !आओ !बाहर चलें ,हम ज्यादा देर यहां नहीं रह सकते ,उन्हें शक हो जाएगा, चलो, बाहर चलते हैं।

आज जब शिखा, सोकर उठती है ,बाहर चिड़ियों की चहचाहट ,उसका दिन बना देती है। अब तो शिखा उन्हें दाने भी डालती है और पानी भी रख देती है । इन चिड़ियों से शिखा ने जैसे दोस्ती कर ली थी अब वे ही ,उसके अकेलेपन की साथी थीं।  वह हवेली से दूर-दूर  तक देख सकती थी किंतु कोई उसे नहीं देख सकता था। उस हवेली में अकेली टहलती रहती थी। टहलती क्या? भटकती रहती थी। उसके अलावा घर में ,एक महिला और थी ,वो उसकी सास थी।  दमयंती जी भी, उससे इतनी बात नहीं करती थीं।


 शायद  सास के क्रोध के कारण, शिखा भी चुप रहती थी। वह खुश होगीं  भी तो किस लिए ?उससे एक दूरी बनाकर रखतीं हैं। अब शिखा को भी लगने लगा- अब उसकी खुशी का कारण ही नहीं रहा, एक विधवा की जिंदगी में क्या खुशियां होती हैं ? ये 'श्वेत वस्त्र 'अपने कपड़ों की तरफ देखती है ,उसके जीवन से तो जैसे रंग ही समाप्त हो गए  हैं किन्तु कभी -कभी उसका बालपन ,उसकी उम्र ,उसके मन की चंचलता का एहसास करा ही देती।शिखा का प्रयास तो यही रहता कि वह जितना हो सके शांत और मौन रहे। 'तेजस'से वह मिली ही कितना थी ? जो उसके प्रेम की गहराई में डूबी रहती ,बस एक मुलाक़ात और कुछ फोन कॉलस तक ही तो उनका साथ रहा है।  इतने दिनों में तो धीरे -धीरे तन के घाव भी भरने लगते हैं।

 शिखा के माता -पिता भी परेशान थे न जाने, हमारी बच्ची कैसी होगी ? उसे किसी न किसी बहाने घर बुलाना चाहते थे किन्तु ये लोग तो लड़की को भेजने का नाम ही नहीं ले रहे हैं।पता नहीं उसे ,इस तरह वहां रखकर कौन सी सज़ा देना चाहते हैं।   

आज भी जब शिखा कमरे से बाहर आई ,तो कोई दिख नहीं रहा था। तब वह हवेली के झरोखों से इधर -उधर झांककर देखती है। शिखा बहू होने के नाते, शुरू -शुरू में दमयंती के पैर छूने जाती थी किंतु दमयंती ने कभी उसे अपने पैर नहीं छूने दिए।

 शिखा को लगता था, कि वह मुझे पसंद नहीं करती हैं , न ही, आशीर्वाद देना चाहती हैं। बाद में बंदिनी ने ही बताया था -तुम विधवा हो, इस कारण, सुबह-सुबह तुम्हारा मुंह देखना नहीं चाहतीं। यह बात शिखा के  दिल में गहरे जाकर लगी। उसके पश्चात वह कभी भी दमयंती के पैर छूने नहीं गई। उसकी कोई रस्म भी नहीं हुई थी, वह अकेले में ऐसे ही पड़ी रहती थी। 


वह नीचे जाना तो चाहती थी, किंतु उनके व्यवहार उन लोगों की बातें सुनकर, उसकी इच्छा नहीं होती थी कि इतनी  सुबह-सुबह, उन लोगों को देखकर, वह अपना मूड खराब कर ले। कुछ समझ नहीं आ रहा था, उन लोगों ने शिखा को यहां क्यों रखा हुआ है ? अब तो शिखा को भी लगने लगा और एक दिन कहने लगी -जब इन लोगों को मैं पसंद ही नहीं हूं तो मुझे मेरे घर क्यों नहीं भेज देते ? मेरे माता-पिता मुझसे नफरत नहीं करते , मेरे विषय में सोचते हैं -अब उसे लग रहा है कि उसने यहां आने में बहुत जल्दबाजी कर दी।उसे अपने घरवालों का कहना मानना चाहिए था।  उसका यहां कोई काम नहीं है, क्या ये  लोग, मुझे यहां रखकर कोई सजा दे रहे हैं। न ही कोई बात करता है, न ही कोई मिलने आता है। तब भी वह अपने में मग्न में रहती।हाँ ,कभी -कभी उस पूर्व दिशा के कमरों का रहस्य उसे अपनी ओर खींचता।  

आज जब वह उठी ,नीचे भी कोई आहट नहीं हो रही थी,तब वह अपनी उत्सुकता को शांत करने के लिए उस तरफ दौड़ी ,उसने देखा -दमयंती ! आज ज्वालासिंह जी के साथ, कमरे से बाहर आ रही थी। उसका सर उनके काँधे पर रखा हुआ था और वो बौराई सी उनकी तरफ देखते हुए ,लड़खड़ाते क़दमों से आगे बढ़ रहीं थीं ,देखने से तो लग रहा था ,जैसे वो नशे में हो। वो मुस्कुराते हुए आगे बढ़ रहे थे। उन्हें साथ देखकर ,शिखा को बड़ा अज़ीब लगा ,उसके कदम उसकी सोच वहीं ठहर गए। उसे तो जैसे होश ही नहीं रहा।

तुम ये सब क्यों कर रही हो ?ज्वाला ने उससे पूछा। 

मैं जानती हूँ ,वो हमें देख रही है ,उसके मन में बहुत जिज्ञासा है ,मैं उसकी जिज्ञासा को बढ़ा रही हूँ ,उसे तैयार कर रही हूँ कहते हुए दमयंती ज्वाला से किसी बेल की तरह लिपट गयी।  

उसे ढूंढते हुए , कुछ देर पश्चात बंदिनी आई और पूछा -बहूजी !उठ गयीं ,आप यहाँ क्या कर रहीं हैं ? 


शिखा ने अपने आपको संभाला ,जैसे सोते से जागी हो ,हड़बड़ाकर बोली -हाँ ,उठ गयी,वैसे ही टहल रही थी।  बंदिनी साफ -सफाई  में व्यस्त हो गयी और शिखा अपने दैनिक कार्यों में ,जब वह नहाने के लिए जा रही थी। तब सफेद साड़ियों के दूसरी तरफ कुछ और भी साड़ियां दूसरी तरफ रखीं थीं ,कुछ कढ़ी हुई ,शीशे और मोतियों से जड़ी साड़ियां भी रखीं थीं। आज शिखा की दृष्टि उन पर ठहर गयी,उसने एक नजर उन साड़ियों को देखा ,वो गुलाबी साड़ी देख !अपनी माँ की उसे वो बातें स्मरण हो आई ,जब वे लोग उसके विवाह की तैयारियाँ कर रहे थे।  

शिखा ,देख वो गुलाबी साड़ी कितनी सुंदर लग रही है ,तेरे गोरे रंग पर ये साड़ी खूब फबेगी,इसे ले ले !मेरी बेटी जब इसे पहनकर बाहर निकलेगी। शिखा के पापा देखो तो सही ,होने वाली ठकुराइन के लिए ये साड़ी कैसी रहेगी ?

हाँ साड़ी तो खूब सुंदर और जब इसे हमारी बेटी पहनेगी तो इसमें [साड़ी में ]'' चार चाँद लग जायेंगे। '' वो तो कहकर चले गये ,अन्य सामान भी तो लेने थे। तब मम्मी ने बड़े प्रेम से साड़ी खरीदवाई थी ,कह रहीं थीं -हमारे दामाद तो लट्टू की तरह ही घूमते नजर आएंगे और ये शीशों से जड़ी पीली साड़ी ,क्या ये अब जीवनभर ऐसे ही रखी रहेंगी। मेरा मुँह चिढ़ाती रहेंगी। तब मन में ख्याल आया, क्यों न, इन साड़ियों को बंदिनी को दे दूँ , अब तो जीवन भर मुझे ये  सफेद साड़ियां ही पहननी होंगी। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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